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दुनिया मेरे आगे: बरसात का राग

निराला की ‘बादल राग’ कविता से कौन परिचित नहीं होगा! बादल के माध्यम से नए क्रांति के स्वर फूंकने और किसान की पीड़ा को उन्होंने अद्भुत अमर स्वर दिए हैं। दिनकर ने तो वर्षा को ऋतुओं की रानी कहा है।

Author August 3, 2019 2:02 AM
निराला की ‘बादल राग’ कविता से कौन परिचित नहीं होगा!

अतुल चतुर्वेदी

कभी कालिदास ने एक पूरा काव्य ‘मेघदूत’ प्रकृति को आलंबन बना कर समर्पित कर दिया था और उनकी पीड़ा को स्वर देते हुए मोहन राकेश ने ‘आषाढ़ का एक दिन’ जैसे कालजयी नाटक की रचना की। लेकिन क्या आज हमारे साहित्य और दैनिक जीवन में प्रकृति की यह मौजूदगी उतनी ही शिद्दत से महसूस की जा रही है? क्या हमारे आज के जीवन और प्रकृति का यह रिश्ता उतना ही मजबूत रह गया है? रीतिकालीन कविता को लेकर हम कितना भी नाक-भौं सिकोड़ लें, लेकिन सेनापति, देव और यहां तक कि मतिराम में भी प्रकृति के दर्शन सुलभ हो ही जाते हैं। छायावादी कवियों की रचनाओं में जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत, महादेवी वर्मा और सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की रचनाओं में भी वर्षा ऋतु, सावन के मेघ आदि का वर्णन प्रचुरता में मिलता है। पंत की कविता- ‘झम-झम झम-झम मेघ बरसते हैं सावन के, छम-छम छम गिरती बूंदें तरुओं से छन के’ न केवल ध्वनि बिंब खड़े करती है, बल्कि चाक्षुष बिंबों के माध्यम से मन में सावन का आनंद और ताजगी उत्पन्न कर देती है।

निराला की ‘बादल राग’ कविता से कौन परिचित नहीं होगा! बादल के माध्यम से नए क्रांति के स्वर फूंकने और किसान की पीड़ा को उन्होंने अद्भुत अमर स्वर दिए हैं। दिनकर ने तो वर्षा को ऋतुओं की रानी कहा है। केदारनाथ अग्रवाल और नागार्जुन आदि कवियों के यहां भी प्रकृति लुप्त नहीं हुई है, भले ही उसकी व्यंजना और संदर्भ बदल गए हों। लेकिन आज हमारा रिश्ता प्रकृति से लगातार टूटता चला जा रहा है। खासकर उत्तर भारत में ज्यादा उदासीनता दिखती है। घर के आंगन में तुलसी और आंवले जैसे उपयोगी पौधों के लिए भी जगह हम नहीं छोड़ना चाहते। क्यारियों का स्थान अब गमलों के स्टैंड ने ले लिया है। अव्वल तो फ्लैट संस्कृति ने घरों में सामान के लिए ही जगह नहीं छोड़ी है, उस पर हमारी मानसिकता भी अर्थोन्मुख अधिक हो गई है। हम घर की क्यारी तोड़ कर दुकान या एक कमरा बनवाना पसंद करते हैं, लेकिन पेड़ लगाना नहीं। हमारी पाठ्य-पुस्तकों से प्रकृति प्रेम की कविताएं भी लुप्त-सी हो गई हैं।

आज पाठ्यक्रम सरकारों के राजनीतिक एजेंडों की पूर्ति के साधन अधिक हो गए हैं। विद्यार्थियों के व्यक्तित्व के चहुंमुखी विकास से उनका कोई सरोकार नहीं। नतीजतन, विद्यार्थियों में पेड़-पौधों और जीव जंतुओं के प्रति संवेदनाओं और दायित्वों का अभाव हो गया है जबकि दक्षिण भारत में आज भी प्रकृति लोगों के जीवन का अंग है। यही कारण है कि कम तापमान और पर्याप्त वर्षा आदि पारिस्थितिकी संकटों से उन्हें कम गुजरना पड़ रहा है। पेड़-पौधों से भावनात्मक लगाव रखने वाले आदिवासियों को हमने अंधविश्वासी और पिछड़ा कह कर उनकी जमीन पर अपनी औद्योगिक लिप्साओं के महल खड़े कर दिए। जंगल सिकुड़ रहे हैं और हमारे मन के अंदर का जंगल फल-फूल रहा है। हिंसक प्रवृत्तियां पनप रही हैं और भाई भाई के खून का प्यासा हो रहा है। सावन हमारे अंदर के हरेपन के जीवित रखने का मौसम है जो न केवल हमें आनंदित करता है, बल्कि हममें एक नई किस्म का आलोड़न, प्रसन्नता और स्फूर्ति भरता है।

मेघों की गर्जना के मिट्टी की उर्वरा शक्ति के विषय में जो भी वैज्ञानिक सत्य हैं, उनके अतिरिक्त सबसे बड़ा सत्य है प्रकृति के नव रूप और नव अभिनंदन का। सावन के साथ हमारी सामूहिकता की भावना और साहचर्य का सुख भी परस्पर जुड़ा हुआ है। साथ-साथ झूला झूलने और कजरी के गीतों को गाने का आनंद ही कुछ और है। लेकिन न आज वैसा कजरी गायन दिखता है, न आल्हा गाने वाले वैसे लोक गायक। झूला अतीत से भविष्य तक की यात्रा का द्योतक ही नहीं, हमारी गतिशीलता का भी परिचायक है।

बरसात के दिनों में बनने वाले पकवान भी ऋतु का आनंद दुगुना कर देते हैं। पकौड़ी अलबत्ता जरूर अपनी जगह बनाए हुए है और राजस्थान के गोट में होने वाली दाल-बाटी-कत्त की दावतें भी अभी दौड़ में हैं। जठराग्नि मंद के इन दिनों में खाद्य-अखाद्य पर विचार करके भी बहुत से पकवान हमारी संस्कृति में विद्यमान हैं, चाहे वह कोंकणी का पंथोली हो या उत्तर भारत के भुने हुए भुट्ठे और उसका कीसा। वर्षा की टिप-टिप की ध्वनि का आनंद ही कुछ और है। सूर की गोपियां कहती हैं- ‘सदा रहत पावस रितु इन पे, जब ते स्याम सिधारे…’! विरहिणी नायिकाओं का दर्द इन दिनों और बढ़ जाता है। कभी गीतकार लिखते थे कि ‘तुझे गीतों में ढालूंगा… सावन को आने दो…’ या ‘सावन के झूले पड़े’। आज के फिल्मी गीतों से भी सावन की यह उपस्थिति गायब-सी है।
न तो लेखकों का प्रकृति से वास्ता रहा, न उनके पास अवकाश। प्रकृति निरंतर हमारे दोहन और बढ़ती महत्त्वाकांक्षाओं का शिकार हो रही है, जिसका परिणाम कुछ वर्ष पहले हमने केदारनाथ त्रासदी के रूप में देखा। सावन केवल एक ऋतु नहीं है, यह हमारे भीतर का सुप्त राग है जो हमें झंकृत करता है और हमारे भीतर की सृजनात्मकता को नए आयाम देता है। जरूरत है उसके सुरों को पहचान कर उसमें अपना सुर मिलाने की। वर्षा की बूंदों के साथ-साथ शीतलता परोसने और सबको जीवन देने का दर्शन समझने की।

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