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दुनिया मेरे आगे: कुदरत से दूर

कुछ समय पहले बच्चों के लिए कहानी की एक कार्यशाला थी। उसमें जब उनसे पूछा गया कि उन्हें कौन-सी कहानियां अच्छी लगती हैं- पक्षियों, जानवरों की या फिर किसी अन्य विषय की, तो साठ बच्चों में से अधिकतर बच्चों ने कहा कि उन्हें जासूसी कहानियां अच्छी लगती हैं।

Author June 28, 2019 1:27 AM
प्रतिकात्मक चित्र।

वीणा शर्मा

कितनी बेचारगी से भरा दृश्य है! फलों से लदा हुआ पेड़ और अपने-अपने मोबाइल में सिर घुसाए बेखबर युवा। शहर के हरे-भरे इलाके में आंखें पहचानती हैं। फलों से लदे बहुत सुंदर पेड़, एकाकी, अनछुए, उदास और परेशान खड़े हैं। न चिड़िया की चहचहाहटें हैं और न ही तोतों का शोर सुनाई देता है। ऐसा नहीं है कि वे आते नहीं, लेकिन चोंच भर कर खाने वाले भला कितना कौर काटेंगे? खदबदाते वातावरण से भला वे कैसे अछूते रह पाएं? जहां पानी होता होगा, वहीं से चुग्गा भी चुन लेते होंगे। दूसरे शहर की हवा और तारों के जंजाल उनकी प्रवेश निषिद्धि के प्रमाण हैं। यहां आम, अमरूद और पास ही बेरों से लदे पेड़ राहगीरों को तकते हैं, अपने लहराते झोंकों से पास बुलाते हैं। लेकिन प्रगति का जहर सब कुछ नष्ट करता जा रहा है। गगनचुंबी इमारतें पेड़ों के सौंदर्य को निरखना क्या जानें, जो कुओं, तालाबों की जगह को हथिया कर खड़ी हों। रुंड-मुंड से पार्कों के चारों ओर चक्कर लगाने वाले तथाकथित आधुनिक मनुष्य नपे-तुले समय में अपने शरीर को साधने की नाकाम-सी कोशिश करते रहते हैं। पेड़ों की जरूरत को दरकिनार किए अपने छज्जे पर लटकाए गए गमलों से सराबोर उसी में एक आनंद की पूर्ति करते रहते हैं। पानी के लिए चीख-पुकार अभी दूर से सुनाई दे रही है।

कुछ समय पहले बच्चों के लिए कहानी की एक कार्यशाला थी। उसमें जब उनसे पूछा गया कि उन्हें कौन-सी कहानियां अच्छी लगती हैं- पक्षियों, जानवरों की या फिर किसी अन्य विषय की, तो साठ बच्चों में से अधिकतर बच्चों ने कहा कि उन्हें जासूसी कहानियां अच्छी लगती हैं। उनसे पूछा गया कि दूध कहां से आता है तो जवाब मिला- ‘मदर डेयरी से’। इसमें हैरानी की बात नहीं थी, क्योंकि बच्चों के सामने जो दिखाया जाता है या जो उपलब्ध होता है, वे उतना ही जान पाते हैं। वास्तविक या बाहरी दुनिया से उनका वास्ता कम पड़ता है। पिछली पीढ़ी में फिर भी बाग-बगीचे वाले घर होते थे। तब चिड़िया, कौवा, तोता, हाथी, भालू की तरह ही पेड़-पौधों के बारे में वे भली-भांति जानते थे। लेकिन आज छोटे-छोटे फ्लैटों में रहने के कारण गमले के पौधों का ज्ञान लेने वाली पीढ़ी भला पेड़ों के नाम क्या जानेगी। किसी पेड़ के पास थोड़ी देर रुक कर वे देखते होंगे, इसमें संदेह है। कब कौन-से पेड़ पर फूल खिलते हैं या किन पेड़ों पर कब फल लगते हैं, इसकी जानकारी हमारे आज के बच्चों को नहीं है।

मार्च के महीने में पलाश फूलता है और पलाश के फूलों से ही होली के रंग भी बनते हैं। फिर गुलमोहर, मौलश्री। अमलतास तीखी धूप में अपने घुंघराले बालों की अनोखी सजावट में सबका ध्यान खींचता है। छांव नहीं, धूप के ताप को जज्ब करता, नित निखरता, पिघले सोने-सा, धूप का मुंतजिर- अमलतास। सांची के स्तूप के चारों ओर खिरनी के अनगिणत पेड़ फलों से लद जाते हैं। कुछ ऐसे सघन छाया वाले पेड़ हैं, जिनके नाम हममें से भी कोई नहीं जानता। हर शहर हर देश में भिन्न-भिन्न प्रजातियों के पेड़ हैं। सैकड़ों जड़ी-बूटियों, औषधीय गुणों को अपने अंदर छिपाए हुए पेड़ पर्यावरण का मूलाधार हैं।

पेड़ खत्म हो रहे हैं। चिड़िया दिखाई नहीं देती। मन कुछ साल पीछे जाकर बरगद की चौपालों में झांकने लगता है, जहां बरगद जैसे ही अनुभवों के पके वृद्ध किस्से-कथाओं से उस जगह को गुलजार किए रहते थे। बीच में बैठे वृद्ध-जन और उनके चारों ओर बरगद की जटाओं के साथ खेलते बच्चे साथ-साथ उस अनुभव को भी अपने अंदर उतार लेते थे। कभी कहानियां, कभी पहेलियां। अब तो कहानियां भी खत्म हो रही हैं, पहेलियां कहां बची होंगी! बरगद की शाम अगर बुजुर्गियत के ज्ञान से संवर्धित होती थी तो घरों के कामकाज निपटा कर गांव की बड़ी-बुजुर्ग महिलाएं और नवोढ़ाएं अपने-अपने कसीदों वाले सामान के साथ आ बैठती थीं। तब कौवा और कोयल भी पास की डाली या बनेरे पर ही बैठा करते थे। ऐसे में कई लोकगीतों की रचना हुई होगी। उस समय कच्ची दीवारें गोबर-मिट्टी की लिपाई से भी ठंडक का अहसास देती थीं। तब एयरकंडीशनर नहीं होते थे।

वे दिन कितने बढ़िया थे। तब पानी भी इफरात में था। कोई घर किसी से अनजाना नहीं था। उन कच्चे घरों में लगाए गए पेड़ ही उनके पालनहार बन जाते थे। लोगों के जमावड़े में शहतूत के फल, जामुन के भरे कटोरे दिए-लिए जाते थे। लेकिन एक-एक करके वे सारे पेड़ ‘स्मार्ट सिटी’ की भेंट चढ़ते चले गए। लोग विकास की चमक में खोते चले गए और हम पेड़ों से दूर होते गए। विकास और विनाश साथ-साथ चलते हैं। पुराने को अपदस्थ करके नया स्थापित होता है। आज की पीढ़ी आम और अमरूद के अलावा शायद ही किसी अन्य पेड़ के बारे में बता पाएं। दूसरी ओर, नित नए फैशन की तरह पर्यावरण दिवस पर पेड़ लगाने के संदेश खूब प्रसारित होते हैं, लेकिन वास्तव में कितने सही प्रयास होते हैं, यह सब जानते हैं। सच यह है कि आज हम प्रकृति से दूर हो चुके हैं। यह आज की विडंबना है।

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