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दुनिया मेरे आगे: अधिकार की गरिमा

दरअसल, समाज और इसकी परंपरा से जुड़े किसी एक ही मसले को देखने का नजरिया आमतौर पर व्यक्ति के आग्रहों से संचालित होता है। ये आग्रह उसके समाजीकरण से निर्मित हुए होते हैं।

Author October 23, 2018 2:54 AM
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है। (एक्सप्रेस फाइल फोटो)

प्रतीक्षा पांडेय

ऐसे तमाम सामाजिक मामले सामने आते हैं, जिन पर सोचती हूं तो लगता है कि किसी समाज की दृष्टि इस कदर दोहरी या बंटी हुई कैसे हो सकती है। मसलन, अगर मान लिया जाए कि स्त्री के सामाजिक जीवन को निर्धारित करने वाला कोई सवाल है तो उस पर पुरुष-दृष्टि अलग होगी और स्त्री-दृष्टि अलग। यह स्त्री के रोजमर्रा की दिनचर्या में देखा जा सकता है कि जिन बातों पर कोई जागरूक महिला सवाल उठाती है, पुरुष उन्हीं बातों को समाज के सहज रूप से चलने के लिए स्वाभाविक और सामान्य मानता है। यहां पुरुष को यह देखने की जरूरत नहीं पड़ती कि किसी खास परंपरा या चलन से स्त्री के व्यक्तित्व, निजता और अधिकार का हनन हो रहा है, जबकि इसी संदर्भ में पुरुष की स्थिति को लेकर समाज अतिरिक्त सावधान होता है।

दरअसल, समाज और इसकी परंपरा से जुड़े किसी एक ही मसले को देखने का नजरिया आमतौर पर व्यक्ति के आग्रहों से संचालित होता है। ये आग्रह उसके समाजीकरण से निर्मित हुए होते हैं। स्त्री-पुरुष के बीच विवाह के दायरे से बाहर संबंध पर विचारों से लेकर व्यवहार के स्तर पर टकराव शायद समाज के मौजूदा रूप ग्रहण करने के साथ ही शुरू हो गया होगा। इसी मुताबिक समाज ने अपने नियम-कायदे बनाए होंगे, फिर आधुनिक व्यवस्थाओं में इससे संबंधित कानूनी प्रावधान भी तय हुए होंगे। भारत में करीब एक सौ सत्तावन साल पुराना कानून विवाह से बाहर बनाए गए संबंधों में स्त्री की सामाजिक हैसियत तय करता था और एक तरह से उसे पति के अधीन संपत्ति बनाता था। इस लिहाज से देखें तो यह वक्त का तकाजा भी था और कुछ समय पहले यही सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में तय किया कि इस मसले पर पुरुष और स्त्री की असमान स्थिति स्वीकार्य नहीं है।

इस फैसले के बाद हुआ सिर्फ यही है कि ऐसे संबंध अब अपराध की श्रेणी और सजा के दायरे से बाहर माने जाएंगे। लेकिन इसके बाद जिस तरह की शंकाएं और प्रतिक्रियाएं सामने आर्इं, उसने मुझे थोड़ा हैरान इसलिए किया कि एक स्तर पर मैं यह मानती हूं कि वक्त के साथ हमारा समाज आधुनिक और लोकतांत्रिक हुआ है और हमारे बीच मानवाधिकारों का सम्मान करने की सलाहियत पैदा हुई है। लेकिन शायद यह मेरा भ्रम है। अचानक ही समाज से लेकर सोशल मीडिया तक पर ऐसी राय व्यापक पैमाने पर जाहिर की गई कि अब विवाह संस्था खत्म हो जाएगी और शादी में होने के बावजूद पुरुषों और स्त्रियों के बीच अनैतिक संबंधों की बाढ़ आ जाएगी। हालांकि महिला अधिकारों की लड़ाई लड़ने वालों ने इन शंकाओं को महिलाओं को मिलने वाले अधिकारों और समानता से उपजा पुरुषों के पेट का मरोड़ बताया, लेकिन संस्कृति की रक्षा के पैरोकारों ने इसे समाज की नैतिकता से जोड़ा। आखिर इस डर का स्रोत क्या है? जबकि सच यह है कि अदालत के नए फैसले से समाज के अस्तित्व पर ऐसा कोई संकट नहीं आने जा रहा है, जिससे इस कदर परेशान हुआ जाए।

मेरा मानना है कि इतना आसान नहीं होता किसी शादी और परिवार का टूट जाना। लेकिन अगर संबंध इस स्तर तक पहुंच चुके हों कि संभालना संभव नहीं रह गया हो तो यों भी अलग हो जाने में कोई बुराई नहीं है। जो लोग अदालत के फैसले पर चिंतित हैं, उन लोगों को यह बताने की जरूरत नहीं है कि इस देश की ज्यादातर महिलाएं पारंपरिक अधीनता के मानस में जीती हैं और किसी कानून की वजह से रातोंरात यह स्थिति बदलने वाली नहीं है। यह चिंता पूरी तरह बेमानी है कि नई कानूनी व्यवस्था के बाद महिलाएं स्वच्छंद हो जाएंगी। संविधान में दर्ज समानता के प्रावधान को लागू करने से समाज खत्म होने नहीं जा रहा। कहा जाता है कि रिश्ते जोड़े रखने का हुनर प्राकृतिक रूप से स्त्री के हिस्से ज्यादा होता है। लेकिन इसकी बाध्यता नहीं होनी चाहिए कि स्त्री की गरिमा पर बन आए तब भी वह मानव निर्मित संस्था के अधीन खुशी ही महसूस करे और अपनी निजता को कुचलती रहे। नैतिकता की दुहाई पर किसी की भी स्वतंत्रता के हनन को सही नहीं कहा जा सकता। विवाह और परिवार जैसी संस्था की चिंता करने वालों को यह समझना चाहिए कि कोई भी महिला अपनी शादी या अपने रिश्ते को तब तक नहीं तोड़ना चाहती, जब तक वह रिश्ता उसकी गरिमा को चोटिल न करता हो। मनमानी उम्मीदों को पूरा करने का बोझ स्त्री पर डाल कर उसकी स्वतंत्रता का हनन करना सही नहीं हो सकता। मुझे लगता है कि यह बहस इसलिए भी छिड़ी कि कोर्ट ने इस मसले पर महिलाओं की सामाजिक स्थिति तय किए जाने के इतिहास और उसमें अधिकार और गरिमा के बिंदु पर महिलाओं की स्वतंत्रता बाधित किए जाने के मद्देनजर विचार किया। इतना हंगामा शायद पैदा नहीं हुआ होता, अगर यह फैसला महिलाओं की स्वतंत्रता से न जुड़ा होता। यों भी, विवाह निजी अधिकारों को बाधित करने की व्यवस्था नहीं होनी चाहिए। हो सकता है कि यह मेरी निजी राय हो, लेकिन इंसान को इंसान के अधीन संपत्ति बनाने की व्यवस्था का समर्थन कोई भी सभ्य समाज नहीं करेगा।

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