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दुनिया मेरे आगे: रुचियों का पाठ

स्कूल या कक्षा में जब तक पहला हक शिक्षक का होगा, तब तक बच्चे स्कूल आने को एक बोझ की तरह ही निभाएंगे। जब तक स्कूल या कक्षा के सभी फैसलों में बच्चों को शामिल नहीं किया जाएगा, बच्चों में स्कूल के प्रति आकर्षण को स्थिर नहीं बनाए रखा जा सकेगा।

Author September 29, 2018 2:53 AM
(File Photo)

मौअज्जम अली

उत्तर प्रदेश के फैजाबाद जिले के किसी स्कूल की कक्षाओं को रेल के डिब्बे का रूप दे दिया गया है। मकसद यह है कि इससे बच्चों और अभिभावकों में सरकारी स्कूल में आने को लेकर आकर्षण बढ़ेगा। बहुत से लोग देखने आ भी रहे हैं और शुरुआती स्तर पर इससे बच्चों का नामांकन भी बढ़ा है। ऐसे और भी बहुत से उदाहरण मिल जाएंगे जहां बच्चों को आकर्षित करने के लिए स्कूल को आकर्षक रंगों से रंगा गया। निश्चित रूप से यह अच्छी पहल है। इससे कम से कम ऐसा तो आभास होता है कि लोग या सरकार बच्चों की शिक्षा के बारे में सोच रही है। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या इस तरह के कदम कारगर साबित हुए हैं या होते हैं? अगर ऐसा ‘तोतोचान’ की तर्ज पर किया गया है तो इस बारे में सोचना होगा कि वहां बच्चे उस रेल के डिब्बे के लिए स्कूल आते थे या इसके पीछे कोई और वजह थी। इस दूसरी वजह को समझना सबसे जरूरी है।

शुरुआत में इस तरह की चीजें सच में लोगों को बहुत आकर्षित करती हैं। खासकर बच्चों को। बिल्कुल वैसे ही जैसे किसी भी बच्चे को अपना नया खिलौना बहुत अच्छा लगता है। लेकिन कुछ दिनों के बाद वह खिलौना कहां पड़ा होता है, उस बच्चे को भी नहीं मालूम होता। कुछ ही दिनों में बच्चे का उस खिलौने के प्रति आकर्षण समाप्त हो जाता है और वह किसी दूसरे खिलौने की तरफ देखने लगता है। ऐसा केवल बच्चों के साथ नहीं होता, बल्कि बड़ों के साथ भी होता है। असल में इस तरह की चीजें कुछ दिनों तक तो ठीक लगती हैं, लेकिन फिर इनका आकर्षण खोने लगता है। जैसे ताजमहल के बगल में रहने वाले लोगों का ताजमहल के प्रति होता है। पता नहीं इस तरह की शुरुआत करना एक समझदारी भरा कदम माना जाए या नहीं। मुझे समझ नहीं आता कि इस तरह की लुभावनी कोशिशों से क्या होगा। हां, मैं यह विश्वास जरूर करता हूं कि इस तरह की शुरुआत करने वाले लोगों की नीयत अच्छी होती होगी और वे कक्षा में बच्चों के साथ पढ़ाने काम भी ठीक से करते होंगे। लेकिन बच्चे के सीखने को लेकर सरकारी प्राथमिक स्कूलों के सभी आंकड़ों पर नजर डालने से तो ऐसा बिल्कुल दिखाई नहीं देता।

मेरा आशय यह नहीं है कि बच्चों के लिए इस तरह की शुरुआत नहीं करनी चाहिए, स्कूलों में बेहतर सुविधा नहीं होनी चाहिए या बच्चों को आकर्षित करने के लिए पहल नहीं करनी चाहिए। बल्कि मेरा मानना है कि बच्चों के लिए स्कूल में बेहतरीन सुविधाएं होनी चाहिए, लेकिन साथ ही इस बात को भी समझना होगा कि यह केवल गुणात्मक शिक्षा का एक पहलू भर है। केवल इस तरह की शुरुआत की वजह से लोग अपने बच्चों का सरकारी स्कूलों में दाखिला कराना शुरू कर देंगे और बच्चे भी रोज खुशी-खुशी आना शुरू कर देंगे। लेकिन यह टिकाऊ भी हो, जरूरी नहीं है। अपने अनुभवों के आधार पर मैं कह सकता हूं कि बच्चे अपने शिक्षक के लिए या शिक्षक की वजह से स्कूल आते हैं। ऐसा शिक्षक जो बच्चों को यकीन दिला दे कि यह स्कूल या कक्षा उनकी है। जहां शिक्षक बच्चों से बातें करता है और बच्चे अपनी बात कह सकते हैं, सवाल कर सकते हैं, जब तक कुछ समझ में न आए तो पूछ सकते हैं, अपने नियम खुद बना सकते हैं, अपनी समस्याओं का हल खुद कर सकते हैं, अपने निर्णय खुद ले सकते हैं, अपनी-अपनी कल्पनाएं कर सकते हैं, सपने देख सकते हैं। बच्चों के पास गलतियां करने के भरपूर मौके हों और शिक्षक बच्चों को अपनी गलतियों को सुधारने में सहयोग करे, न कि इसमें अड़चन पैदा करे।

स्कूल को चाहे कितना ही सुंदर क्यों न बना दिया जाए, हीरे-जवाहरात से जड़ दिया जाए या डिज्नीलैंड को ही बच्चों का स्कूल बना दिया जाए, बच्चे तब तक अपने मन से स्कूल आना पसंद नहीं करेंगे, जब तक उन्हें वह स्कूल अपना नहीं लगेगा। लेकिन कोई भी शिक्षक ऐसा तभी कर पाएगा, जब उसका शैक्षिक नजरिया बेहतर होगा और वह बाल मनोविज्ञान को समझता होगा। ऐसा भी हो सकता है कि कोई रोज बच्चों को स्कूल में मिठाई या खिलौने बांटे, केवल नए-नए खेल खेलने के मौके दे और यह दिखाने का प्रयास करे कि यह भी एक तरीका है बच्चों को स्कूल की तरफ आकर्षित करने का, तो यह खेल भी ज्यादा दिन नहीं चलेगा, क्योंकि स्कूल को अपना उद्देश्य तो पूरा करना ही होगा। यानी राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा- 2005 में इंगित शिक्षा के उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए बच्चों को शिक्षा देनी होगी। स्कूल या कक्षा में जब तक पहला हक शिक्षक का होगा, तब तक बच्चे स्कूल आने को एक बोझ की तरह ही निभाएंगे। जब तक स्कूल या कक्षा के सभी फैसलों में बच्चों को शामिल नहीं किया जाएगा, बच्चों में स्कूल के प्रति आकर्षण को स्थिर नहीं बनाए रखा जा सकेगा।

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