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दुनिया मेरे आगे: यथार्थ के पर्दे में

नब्बे के दशक का सिनेमा रोमांस और मारधाड़ से भरी फिल्मों के बीच कहीं अपनी राह तलाश रहा था। ऐसे में फूलन पर बनी फिल्म में अलग-अलग पात्रों के संवाद दर्शकों को हतप्रभ कर रहे थे। ज्यादा समय नहीं हुआ था जब ‘चक्र’ फिल्म में स्मिता पाटिल का महज कुछ सेकेंड का स्नान दृश्य एक तरह से राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बन गया था।

Author October 19, 2018 2:05 AM
प्रतीकात्मक चित्र

रजनीश जैन

लोग अपशब्दों का इस्तेमाल क्यों करते हैं? सभ्य और सुसंस्कृत दिखने वाले लोग भी गाहे-बगाहे बातचीत में गालियों का उपयोग क्यों कर बैठते हैं, यह प्रश्न आमजन के साथ भाषाविदों और मनोवैज्ञानिकों को भी विचलित करता रहा है। अमूमन अधिकतर लोग अपने मनोभावों को व्यक्त करते समय अपशब्दों को अलंकारों की तरह उपयोग करने की भूल कर बैठते हैं। ब्रिस्टल विश्वविद्यालय के जेफ बॉवेर ने इस समस्या की तह में जाकर अपने शोध में कुछ निष्कर्षों का खुलासा किया है। उनके अनुसार ज्यों-ज्यों उम्र बढ़ती जाती है, त्यों-त्यों हमारे मनोभावों में अपशब्दों के स्वर जुड़ते चले जाते हैं। अपशब्दों के साथ मनुष्य के सोचने और दुनिया के प्रति उसके नजरिए में बदलाव भी होने लगता है। अन्य सर्वमान्य कारणों में बोलने वालों के पास सीमित शब्द भंडार, बचपन की परवरिश, कुंठा, निराशा, आत्मविश्वास की कमी, तर्कों के अभाव में अपशब्दों का प्रयोग प्रमुख वजह माना गया है।

इस शोध में एक दिलचस्प तथ्य यह भी सामने आया कि व्यक्ति अगर एक से अधिक भाषा का जानकार है तो भी अपशब्द वह अपनी मातृभाषा में ही प्रयोग करता है। मशहूर शायर निदा फाजली ने कभी अपनी नज्म में भी इस सामाजिक समस्या पर कुछ इस तरह से कटाक्ष किया था कि ‘मेरे शहर की तालीम कहां तक पहुंची, जो भी गालियां थीं बच्चों की जुबां तक पहुंचीं।’ फाजली साहब की बातों की पुष्टि यथार्थ के निरूपण के नाम पर फिल्मों में गालियों के बढ़ते प्रयोग से भी होती है। दो दशक पूर्व लेखिका माला सेन की किताब ‘इंडियाज बैंडिट क्वीन : द ट्रू स्टोरी ऑफ फूलन देवी’ पर आधारित 1994 में आई फिल्म ‘बैंडिट क्वीन’ को एक समय असफल रहे अभिनेता शेखर कपूर ने निर्देशित किया था। चंबल के पिछड़े इलाकों में ऊंची और निचली कही जाने वाली जातियों के संघर्ष की परिणति ने फूलन देवी को डाकू बना दिया था। कठोर वास्तविकता दर्शाने के लिए इस फिल्म में गालियों और बलात्कार के दृश्यों की भरमार थी।

नब्बे के दशक का सिनेमा रोमांस और मारधाड़ से भरी फिल्मों के बीच कहीं अपनी राह तलाश रहा था। ऐसे में फूलन पर बनी फिल्म में अलग-अलग पात्रों के संवाद दर्शकों को हतप्रभ कर रहे थे। ज्यादा समय नहीं हुआ था जब ‘चक्र’ फिल्म में स्मिता पाटिल का महज कुछ सेकेंड का स्नान दृश्य एक तरह से राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बन गया था। उस समय किसी को अंदाजा नहीं था कि ‘बैंडिट क्वीन’ के संवादों में आई गालियां फिल्मों में यथार्थ दर्शाने के बहाने का सबब बनने वाली हैं। हालांकि बाद की फिल्मों में गालियों का जिस तरह प्रयोग किया, उसे ‘बैंडिट क्वीन’ का विस्तार कहा जाता है, लेकिन उनमें से ज्यादातर फिल्मों की तुलना इस फिल्म से करना शायद न्यायपूर्ण नहीं होगा। यों किसी शख्सियत के जीवन पर आधारित बायोपिक फिल्मों में भी काल्पनिक घटनाक्रम जोड़ देने वाले चतुर फिल्मकार काल्पनिक फिल्मों में वास्तविकता का बघार लगाने के लिए गालियों की पगडंडिया तलाश ही लेते हैं। रामगोपाल वर्मा की आपराधिक पृष्ठभूमि पर बनी ‘सत्या’ को एक ‘कल्ट’ फिल्म के तौर पर देखा गया। वह फिल्म हिंसा के अलावा शाब्दिक हिंसा का भी पड़ाव रही। शेक्सपियर के नाटकों को भाषा का मर्म और उसकी अलंकृत सुंदरता की ऊंचाई के लिए सराहा जाता है। चार सौ वर्षों तक कोई साहित्य समसामयिक बना रहे तो यह निश्चित रूप से भाषा का ही कमाल है। लेकिन उनके ही नाटक ‘ओथेलो’ पर आधारित 2006 में आई ‘ओंकारा’ फिल्म अभिनेता सैफ अली खान के गालीमय संवादों के लिए ज्यादा याद की जाती है।

ताज्जुब की बात है कि सेंसर बोर्ड की चाक-चौबंद घेराबंदी के बाद भी गालीयुक्त संवादों से लबरेज फिल्में बागड़ फलांग कर दर्शकों तक पहुंचती रही हैं। इस सदी में आई ‘इश्किया’, ‘देहली बेली’, ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’, ‘शूटआउट एट वडाला’, ‘एनएच-10’, ‘उड़ता पंजाब’ जैसी कुछ फिल्में अच्छे कथानक के बावजूद अपने संवादों के कारण अधिक चर्चित रही हैं। ‘टाइटेनिक’ फिल्म से बुलंदियों पर पहुंचे लेनार्डो डी केप्रिया के प्रशंसकों को उनकी जेक निकल्सन के साथ आई ‘द डिपार्टेड’ और ‘वुल्फ ऑफ वाल स्ट्रीट’ बेहतर याद होगी। ये दोनों फिल्में गालियों से इतनी भरी हुई थीं कि फिल्म के अंत में दर्शक के जेहन में कहानी नहीं, सिर्फ गालियां गूंजती रहती हैं। ‘नेटफ्लिक्स’ पर हाल ही संपन्न हुई वेब सीरीज ‘सेक्रेड गेम्स’ का कथानक दर्शक में रोमांच और उत्सुकता का संचार तो नहीं करता, जैसा कि 2003 में अनिल कपूर की ‘24’ टीवी शृंखला ने किया था, लेकिन गालियों की भरमार से वितृष्णा का भाव जरूर जगा देता है। दरअसल, इसके पीछे सिनेमा बनाने वालों की मुख्य दलील यथार्थ को उसी रूप में दर्शाने की जरूरत और दर्शकों की पसंद रही है। इसलिए इस समस्या का हल दर्शकों को ही तलाशना होगा। उन्हें ऐसी फिल्मों और टीवी शृंखला को सिरे से नकारना होगा, अन्यथा घर की दहलीज के बाहर गली में गूंजती गालियों को सिनेमा के पर्दे से चल कर घर की बैठक में आने में ज्यादा समय नहीं लगेगा।

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