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दुनिया मेरे आगे: रिश्तों के धागे

विडंबना यह है कि ऐसी खबरों को पढ़ कर शायद अब हमारे रोंगटे भी नहीं खड़े होते, क्योंकि अब यह रोजमर्रा की बात हो गई है। हर रिश्ते पर ‘विश्वास का संकट’ मंडराता नजर आने लगा है। ऐसे लोगों की तादाद भी कम नहीं है जो सिर्फ अपने लिए जीने की राह पर हैं।

Author August 25, 2018 1:44 AM
इस बार 26 अगस्त को मनाया जाएगा रक्षाबंधन।फोटो सोर्स- इंडियन एक्सप्रेस)

ऐसा कहा जाता है कि किसी भी त्योहार को मनाने के पीछे कोई न कोई इतिहास या कारण जरूर होता है। लेकिन त्योहार मनाते हुए हमें शायद ही कभी इस बात का खयाल आता है। इस संदर्भ में अगर भारत को त्योहारों का देश कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। यहां के त्योहारों का संदर्भ चाहे जो हो, लेकिन क्या आज किसी भी त्योहार को उसी जज्बे से मनाया जाता है, जिससे हमारे पूर्वज उसे मनाते थे? शायद ऐसा नहीं है। तमाम त्योहारों के बीच में एक है रक्षा बंधन, जिसमें भाई अपनी बहन की, बच्चे अपने वृद्ध माता-पिता की और गुरु शिष्य की रक्षा का वचन देता है। लेकिन आज के इस अनिश्चितता भरे दौर में यह त्योहार भी बेमानी लगने लगा है। चारों तरफ तेजी से बदलती दुनिया में आए दिन ऐसे भी समाचार आते रहते हैं जिनमें यह बताया जाता है कि महिलाओं से बलात्कार के अपराधियों में किसी अनजान व्यक्ति से लेकर बेहद नजदीक के संबंधी तक शामिल थे। यहां तक कि कुछ घटनाओं में पिता ने अपनी पुत्री और भाई ने अपनी बहन या फिर गुरु ने अपनी शिष्या तक को नहीं बख्शा। सवाल है कि हमारा समाज यहां तक कैसे पहुंचा कि बलात्कार करने वाले पुरुषों ने अपने सबसे पवित्र माने जाने वाले संबंधों का भी लिहाज रखना छोड़ दिया? हालांकि मन में जब अपराधी बैठ जाता है तो वह संबंधों की हर परिभाषा को ताक पर रख देता है।

विडंबना यह है कि ऐसी खबरों को पढ़ कर शायद अब हमारे रोंगटे भी नहीं खड़े होते, क्योंकि अब यह रोजमर्रा की बात हो गई है। हर रिश्ते पर ‘विश्वास का संकट’ मंडराता नजर आने लगा है। ऐसे लोगों की तादाद भी कम नहीं है जो सिर्फ अपने लिए जीने की राह पर हैं। न पति, न पत्नी, न मां-बाप, न भाई-बहन और न ही बच्चों के लिए, वे सिर्फ अपने लिए ही जीते हैं। आज हालत यह होती जा रही है कि भाई अपने भाई या फिर बहन से अपना हाल नहीं बांटते। अपने काम या अपनी दुनिया की व्यस्तताएं ऐसी होती जा रही हैं कि कभी फोन करके बहनों की खैरियत पूछना जरूरी नहीं समझा जाता।

ऐसे में रक्षाबंधन का भावनात्मक त्योहार एक औपचारिकता की शक्ल लेता जा रहा है। मां-पिता को केवल संपत्ति के लिए ही पूछा जाने लगा है। जैसे ही संपत्ति का बंटवारा हुआ, मां-बाप या तो घर में ही उपेक्षित की तरह जिंदगी जीने के लिए विवश हो जाते हैं या फिर वृद्धाश्रम पहुंचा दिए जाते हैं। ऐसे बच्चे कम हैं, जो मां-पिता को उनकी गरिमा और हक के साथ परिवार में जगह और भावनाएं-संवेदनाएं दे पाते हैं। ऐसे भाइयों की कहानी कोई छिपी बात नहीं है जो बहनों को उनकी शादी के बाद पराए घर का सदस्य मान कर उनके साथ औपचारिक संबंध निबाहते हैं। कुछ ही दिनों के बीच रिश्तों का अपनापन पता नहीं, कहां और कैसे चला जाता है! अब परिवार का मतलब पति-पत्नी और उनके बच्चों तक सिमटता जा रहा है, जिसमें और किसी रिश्ते की कोई जगह नहीं होती। टीवी धारावाहिकों की तरह ही परिवार के सदस्य भी कई बार दूसरे के प्रति षड्यंत्र करते नजर आते हैं। क्या इसी तरह के समाज की कल्पना हमारे पूर्वजों ने की थी और परिवार संस्था की नींव रखी थी, जहां न रिश्तों में भावनाएं है, न विश्वास और न एक दूसरे की फिक्र है, सिर्फ स्वार्थ है। यह सही है कि समूचा समाज ऐसा नहीं हो गया है, लेकिन यह प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है, लोग मशीनी होते जा रहे हैं।

परिवार को बच्चे की प्रथम पाठशाला या प्राथमिक समूह कहा जाता है। वहां उसके अस्तित्व को एक पहचान मिलती है, जीवन जीने के लिए तैयार किया जाता है, संघर्षों से लड़ने की शिक्षा दी जाती है और एक अच्छा इंसान बनाने का प्रयास किया जाता है। वही परिवार एक समय के बाद उसे अपने विकास और तरक्की में बाधक लगने लगता है। जो भाई बहन की हर मुश्किल में उसकी ढाल बनते थे, वे अब पराए या अनजान नजर आने लगते हैं। कितना अफसोसजनक है यह सब! आज के इस भौतिकतावादी समाज में परिवार, विवाह, नातेदारी, धर्म, विश्वास, समाज और यहां तक कि राज्य भी किसी न किसी प्रकार के जोखिम का सामना कर रहे हैं। ऐसे में एक आदर्श या सभ्य समाज की स्थापना के लिए गहन चिंतन करना जरूरी हो गया है। अगर अभी भी समाज नहीं चेता तो बहुत देर हो जाएगी। इसलिए जरूरी है कि समय रहते शिक्षक, बुद्धिजीवी वर्ग, राज्य और विषयों के विशेषज्ञ अपनी सक्रिय सहभागिता द्वारा इस समाज को अविकसित अवस्था की उस असभ्यता की तरफ जाने से रोक लें, जहां मनुष्य और पशु के बीच का अंतर समाप्त हो जाता है। अन्यथा इस आधुनिक दौर में ‘सभ्य समाज’ एक इतिहास बन कर रह जाएगा और भावी पीढ़ी इसे केवल किताबों के पन्नों में देखेगी।

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