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दुनिया मेरे आगे: विविधता का पाठ

बहुत सारे बच्चों के घर की भाषा हिंदी नहीं है। इस कारण बच्चों को अपने घर और स्कूल की भाषा में तालमेल बैठाने में कुछ समय लगता है। अन्य राज्यों से काम की तलाश में आए या दिहाड़ी मजदूर के रूप में काम करते कई माता-पिता पढ़-लिख नहीं सके।

Author April 26, 2018 5:05 AM
इस तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

प्रेरणा मालवीया

कुछ समय पहले एक सरकारी स्कूल में गई, जो अपेक्षया बड़ा और सुंदर था। शिक्षकों से बातचीत के दौरान पता चला कि कुछ शिक्षक छुट्टी पर या किसी अन्य ड्यूटी पर प्रतिनियुक्त हैं। स्कूल में करीब दो सौ बच्चे थे। मैंने कहा कि यह खुशी की बात है कि यहां इतने बच्चे हैं, वरना कुछ स्कूल लगातार कम होते बच्चों की संख्या से जूझ रहे हैं। इस बात पर उन्होंने कुछ नजदीकी स्कूलों के नाम लेते हुए बताया कि वहां तो बच्चे ही नहीं हैं। जबकि हमारे स्कूल में जगह की कमी है, जिसकी वजह से कई बच्चों को दाखिला देने से मना करना पड़ा। मैंने कहा कि इसका मतलब यहां पढ़ाई अच्छी होती है। इस पर एक शिक्षक ने एक सांस में कुछ बातें कह डालीं- ‘हम तो अपनी तरफ से पूरी कोशिश करते हैं, मगर आजकल सरकारी स्कूल में वही बच्चे आते हैं, जिन्हें कहीं दाखिला नहीं मिलता। ज्यादातर झुग्गी-झोपड़ी के होते हैं, जो दाखिले के बाद नियमित स्कूल नहीं आते। उनके अभिभावकों को होश ही नहीं होता कि बच्चे किस क्लास में पढ़ रहे हैं। दिन में काम करते हैं, शाम को शराब पीते हैं, लड़ाई-झगड़ा करते हैं और सो जाते हैं। बस यही है उनकी दिनचर्या। खुद ही पढ़े-लिखे नहीं हैं तो बच्चों को क्या बताएंगे! इस कारण ये बच्चे घर जाकर कुछ नहीं पढ़ते हैं। एक अन्य शिक्षक ने चेहरे पर खुशी के भाव के साथ बताया कि मेरा बेटा तो अभी पहली कक्षा में है और उसे दस तक का पहाड़ा आता है। मगर इन बच्चों के पीछे बहुत मेहनत करनी पड़ती है।

मैंने कहा कि आपकी बात सही है, लेकिन आप लोगों की बात में ही इसके कारण भी छिपे हैं। जो बच्चे यहां आ रहे हैं, वे शिक्षा से सर्वशिक्षा की यात्रा के तहत स्कूल में आए हैं। इसमें आदिवासी, दलित और समाज के उस वर्ग ने भी स्कूल की दहलीज पर कदम रखा है जो अभी तक इससे बाहर थे। जब इस वर्ग के बच्चे पहली बार स्कूल आए हैं तो इनके साथ कई तरह की चुनौतियां भी हैं। सबसे पहले भाषा की मुश्किल है। बहुत सारे बच्चों के घर की भाषा हिंदी नहीं है। इस कारण बच्चों को अपने घर और स्कूल की भाषा में तालमेल बैठाने में कुछ समय लगता है। अन्य राज्यों से काम की तलाश में आए या दिहाड़ी मजदूर के रूप में काम करते कई माता-पिता पढ़-लिख नहीं सके। अभाव की हालत से उपजी हताशा-निराशा कई बार उन्हें शराब में खींच कर ले जाती है। उनके पास पर्याप्त समय नहीं होता बच्चों से बात करने के लिए। इस कारण ऐसे बच्चे भावनात्मक रूप से कमजोर होते हैं। आर्थिक स्थिति भी मजबूत नहीं है। इसलिए रोजी-रोटी प्राथमिकता है। आर्थिक तंगी के कारण बच्चों को पर्याप्त और पौष्टिक भोजन नहीं मिल पाता है।

इस सबका असर उनके शारीरिक-मानसिक विकास और सीखने पर भी पड़ता है। घर पर पानी, शौचालय जैसी मूलभूत सुविधाओं से भी वंचित रहते हैं। पढ़ाई का कोई माहौल नहीं होता। इस कारण स्कूल में इन बच्चों को सीखने में थोड़ा समय लगता है और हमें लगता है कि वे कमजोर हैं। शहरों में गरीब तबके के कई बच्चे तो बहुत कम उम्र में ही कूड़ा बीनने के काम में लग जाते हैं। सुबह जल्दी उठ कर वे अपना काम करते हैं और इसके बाद स्कूल जाते हैं। हो सकता है कि वे साफ-सफाई का उतना ध्यान नहीं रख पाते। मेरे कहने का आशय यह है कि अभाव का सामना कर रहे बच्चे इतनी विषम परिस्थिति से और इतनी चुनौतियों के साथ आ रहे हैं। फिर भी वे अगर स्कूल आ रहे हैं तो इसका मतलब यह है कि वे पढ़ना और कुछ सीखना चाहते हैं।

सवाल है कि एक संवेदनशील इंसान और खासतौर पर शिक्षक होने के नाते हमारा क्या फर्ज बनता है। उनकी इस स्थिति को समझना शायद हम सबको ही एक बेहतर शिक्षक बनाएगा। बच्चे देरी से आते हैं, अपनी सफाई का खयाल नहीं रखते, डरते हैं या अपनी बात कहने में झिझकते हैं, घर में उन्हें कोई नहीं पढ़ाता है तो हमें थोड़ा रुक कर इसके कारणों पर सोचना चाहिए। उन पर दया भाव दिखाने के बजाय हमें इसके रास्ते निकालने की जरूरत है कि हम उनके साथ कैसा व्यवहार करें कि उनके व्यक्तित्व में गुणात्मक सुधार हो सके। मेरा खयाल है कि अभाव के मारे बच्चों की तुलना सुविधाओं में पले हमारे घर के बच्चों से करना ठीक नहीं है। कोशिश यह हो कि कक्षा में बच्चों को सबसे पहले अपने घर की भाषा को बोलने का पूरा अवसर दिया जाए और ऐसा करते हुए बच्चे जरा भी शर्म या झिझक महसूस नहीं करें। उनके परिवेश और संस्कृति के ज्ञान को कक्षा की शिक्षण विधियों में शामिल करने की जरूरत है, ताकि वे बच्चे सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में सक्रिय रूप से हिस्सा ले सकें और सीखना इनके लिए भी सार्थक और रुचिपूर्ण बन सके। सामाजिक विविधता को हमें संसाधन के रूप में देखना चाहिए, न कि झंझट के रूप में।

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