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दुनिया मेरे आगे: पारदर्शिता का तकाजा

हजारी प्रसाद द्विवेदी ने निबंध ‘देवदार’ में कहा है कि ‘जरूरी नहीं है, जो लगे वह हो भी। लगने और होने में फर्क होता है।’ लेकिन कभी-कभी जो लगता है, वह होता भी है। यह सच है कि हमेशा सब कुछ दर्शाया नहीं जा सकता।

Author May 1, 2018 04:11 am
प्रश्न पूछना या उठाना आधुनिक बोध का सबसे जरूरी लक्षण है।

प्रश्न पूछना या उठाना आधुनिक बोध का सबसे जरूरी लक्षण है। भारतीय दर्शन में प्रश्नाकुल जिज्ञासा को सदा महत्त्व दिया गया है। सवाल यह भी है कि किस तरह का प्रश्न हो और वह प्रश्न पूछने से नाराजगी किसे होती है! कुछ घटनाओं को प्रतिनिधि मामलों के तौर पर देखा जा सकता है। मसलन, हाल में मिल-जुल कर किए जा रहे एक काम के बीच एक व्यक्ति से सिर्फ उसकी भूमिका के बारे में पूछ लिया गया और उसके अहं को चोट लग गई। उसने सीधा जवाब दिया- ‘मुझसे कोई सवाल क्यों करे!’ इस जवाब के बाद मन बहुत देर तक कचोटता रहा। क्या यह तानाशाही का ही एक और रूप नहीं, जहां प्रश्न उठाने को दूसरे की हिमाकत समझा जाए? मांग सिर्फ इतनी हो कि सामूहिक रूप से किए जा रहे किसी काम में पारदर्शिता होनी चाहिए, तो उससे किसी को भी आपत्ति क्यों होनी चाहिए! वास्तविक स्थिति को सामने रखने से किसी के मन में कोई दुविधा नहीं पैदा होती और बेवजह के टकराव नहीं खड़े होते।

यह किसी छोटे-मोटे काम के दौरान उपजी असहज स्थिति हो सकती है। लेकिन इसी तरह की पारदर्शिता के अभाव में पर्दे के पीछे हक मारने की एक व्यवस्था-सी बन जाती है। इसमें उच्च स्तर पर बनने वाली नीतियों से लेकर निचले स्तर पर काम कराने वाले मालिकों का व्यवहार शामिल होता है। मजदूरों से कोई काम कराने वाले व्यक्ति की ऐसी टिप्पणियां हैरान करती हैं कि मजदूर कहीं बीच में काम छोड़ कर भाग गए तो क्या होगा; इसलिए बिना बताए किसी बहाने से उनका कुछ पैसा बाकी रखना चाहिए। मजदूरों का पैसा दबाने का कोई कारण नहीं हो, लेकिन सिर्फ इस तरह के पूर्वग्रह की वजह से मजदूरों के हक का हनन हो रहा हो तो यह बड़ा सवाल है। पारदर्शिता के अभाव में किसी निर्माण के मद में तय रकम, उस पर होने वाले खर्च, मजदूरों के हाथ में आने वाली मजदूरी और ठेकेदार को किए जाने वाले भुगतान की हकीकत व्यवहार में क्या शक्ल ले चुकी है, यह अब जगजाहिर है। एक व्यापक तंत्र बन गया है, जिसमें मजदूरों और उनके लिए उठी आवाजें दफ्न हो जा रही हैं।

हजारी प्रसाद द्विवेदी ने निबंध ‘देवदार’ में कहा है कि ‘जरूरी नहीं है, जो लगे वह हो भी। लगने और होने में फर्क होता है।’ लेकिन कभी-कभी जो लगता है, वह होता भी है। यह सच है कि हमेशा सब कुछ दर्शाया नहीं जा सकता। वास्तविक जिंदगी में कुछ ऐसी भी बातें होती हैं जो प्रकट रूप में नहीं कही जा सकतीं। उनका समझ भर लेना काफी होता है। लेकिन यहीं कुछ ऐसा भी होता है जो प्रकट रूप में कुछ और होता है और प्रच्छन्न रूप में कुछ और। कुल मिला कर पारदर्शिता का नहीं होना कहीं न कहीं ऐसा माहौल पैदा करता है जहां पर्दे के पीछे खेल खेले जाते हैं। यों यह व्यक्ति के अपने स्वभाव पर निर्भर करता है कि वह मुखर है या मौन। इसे हम मनोविज्ञान में अंतर्मुखी और बहिर्मुखी व्यक्तित्व कहते हैं। दूसरे अनावश्यक आवरण रखना नागरी समाज की देन मानी जाती है। आज के बदलते माहौल और शहरीकरण ने हमसे बहुत कुछ छीन लिया है। एक खास तरह की आत्मीयता, एक दूसरे पर विश्वास और पारदर्शिता। हमेशा अविश्वास का एक माहौल इस वातावरण की देन है। लेकिन सवाल शहरी या ग्रामीण से कहीं ज्यादा उस व्यक्तित्व का है जो हमने आनुवंशिकता, समाज और अपने स्वभाव से पाया है। आत्मीयता का माहौल आज दुर्लभ है।

कहने को प्रजातंत्र में समानता का अधिकार बहुत बड़ा है, लेकिन जाति, वर्ग और काम के आधार पर असमानता सब जगह मौजूद है। बचपन से ही घर पर पूरी तरह से प्रजातांत्रिक माहौल देखने के कारण किसी तरह की अहमन्यता से कभी वास्ता नहीं पड़ा। मेरी कई छात्राएं आत्मीयता के क्षणों में अपनी समस्याएं बताते हुए कहती हैं कि उनके पिता, यानी घर के मुखिया कई मुद्दों पर उनकी बात नहीं सुनते और उनका एक ही उत्तर होता है- ‘कोई तर्क नहीं!’ यहां तक कि बच्चे अपना पक्ष भी सामने नहीं रख पाते। यह ठीक है कि कोई भी अपना दिल हथेली पर रख कर नहीं चलता। लेकिन अनावश्यक आवरण की जरूरत क्या है? शायद यह व्यक्तित्व ही होता है कि कई लोग कभी सीधी बात नहीं कर सकते। पारदर्शिता उनके व्यक्तित्व में नहीं होती। वे छोटे-छोटे मुद्दों पर भी आवरण चढ़ाए रखते हैं। शायद उनकी जिंदगी जीने की कूटनीति भी कहना कुछ, करना कुछ, बोलना कुछ और सोचना कुछ होती है। आज एक बड़ा तबका इसी तरह धुंधलके में जिंदगी जीता है। प्रश्न पूछना दुस्साहस हो गया है। यह अनायास नहीं है कि सूचना का अधिकार कानून बनने के बाद कई प्रश्न पूछने वालों को जान से हाथ धोना पड़ा। राजनीति के ऊपरी स्तर से लेकर आम आदमी भी इसका शिकार है। अगर सिर्फ पारदर्शिता या बेबाकी चरित्र का एक हिस्सा बन जाए तब न धोखा होगा, न एक दूसरे पर शक और अविश्वास का माहौल।

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