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दुनिया मेरे आगे: शिल्पकारी के दुख

नई आर्थिकी के फायदे का दावा हमचाहे जितना करें, लेकिन ‘ब्रांड वैल्यू’ यानी नामी कंपनियों के सामानों की प्रचारित चकाचौंध के दौर ने स्थानीय कलाकारों की रोजी पर बड़ा संकट पैदा किया है। मिथिला पेंटिंग के लिए विख्यात मधुबनी में इसका दुष्प्रभाव साफ दिखता है।

Author May 3, 2018 3:56 AM
हस्तशिल्प कठपुतली (फाइल फोटो)

उमेश चतुर्वेदी

भोजपुरी के मशहूर गायक बलेसर ने अपने गीतों में गोरखपुर की बिंदी की खासियत का काफी बखान किया है। लेकिन क्या अब भी गोरखपुर की बिंदी की वैसी ही साख है? गोरखपुर की बिंदी यानी टिकुली ही क्यों, लखनऊ की रेवड़ी, मेरठ की गजक, आगरा का जूता, बलिया की पालकी, मोकामा टाल की दाल आदि की गुणवत्ता और इज्जत आज किस हालत में बची है? यह सवाल तब कौंध उठता है, जब चौराहों पर, बस या रेल में कोई स्थानीय शिल्पकार या विक्रेता स्थानीय स्तर की चीजें बेचते दिखते हैं। ब्रांड के बढ़ते शोर और कारपोरेट के बढ़ते दबदबे के दौर में स्थानीय स्तर पर बनी चीजें अब लोगों की पसंद नहीं रहीं। बलिया में एक जगह है सिकंदरपुर। पूर्वी उत्तर प्रदेश और उससे सटे हुए बिहार में एक समय स्थानीय स्तर पर तैयार इत्र, सुगंधित तेल और गुलाब जल की भारी मांग थी। बचपन में देखे शादी-ब्याह के मौके की कई बातें अब तक जेहन में ताजा हैं। उनमें इस्तेमाल के लिए गुलाब जल, इत्र या सुगंधित तेल खासतौर पर खरीदा जाता था। होली के आसपास सिकंदरपुर के कारोबारी कांवर में सुगंधित तेल, इत्र और गुलाब जल की बोतलें सजा कर गांव-देहात के लिए निकल पड़ते। अपने घर तभी लौटते, जब वह खेप बिक जाती। इसी तरह गाजीपुर का केवड़ा मशहूर था। विवाह के मौके पर मेहमानों के लिए पीने के पानी में केवड़ा जल मिलाया जाता था। वह सुगंधित होता था और ठंडा भी। उसकी काफी मांग होती थी।

लेकिन आज स्थानीय आबोहवा, माटी की उपज और शिल्पकारी के बेजोड़ नमूनों की मांग नहीं के बराबर रह गई है। ब्रांडिंग की दुनिया में अब उस सामान को पसंद किया जाता है, जिसके ब्रांड का बड़ा नाम हो या जिसकी मार्केटिंग धुआंधार तरीके से की जा रही हो। यह मार्केटिंग और ब्रांडिंग का बोलबाला ही है कि अब भारतीय कपड़ा और ऊन की मिलें नामी विदेशी ब्रांडों के लिए कपड़े-कंबल तैयार करती हैं और उन्हें हम गर्व के भाव से भर कर खरीदते हैं। लेकिन उसी गुणवत्ता की चीज स्थानीय कारीगर तैयार करके बिना किसी ब्रांड के किसी चौराहे, सड़क किनारे या बस-ट्रेन में बेचने की कोशिश करते हैं तो हम उन्हें कमतर मान कर टाल देते हैं। अगर किसी ने उनसे सामान खरीद भी लिया तो आसपास की नजरों में उस खरीदार की हैसियत घट जाती है। नई आर्थिकी के फायदे का दावा हमचाहे जितना करें, लेकिन ‘ब्रांड वैल्यू’ यानी नामी कंपनियों के सामानों की प्रचारित चकाचौंध के दौर ने स्थानीय कलाकारों की रोजी पर बड़ा संकट पैदा किया है। मिथिला पेंटिंग के लिए विख्यात मधुबनी में इसका दुष्प्रभाव साफ दिखता है। मिथिला पेंटिंग के कलाकार अपनी मेहनत से बनाए चित्रों को महज कुछ सौ रुपए में बेचने पर मजबूर हैं। जबकि बाजार में कलाकृति के नाम पर इनकी कीमतें काफी ऊंची होती हैं। इसी तरह स्थानीय स्तर पर जूते बनाने वाले हों या कपड़े सीने वाले, सबके रोजगार के सामने संकट खड़ा हो गया है। उन्होंने कितना भी अच्छा सामान क्यों न बनाया हो, उनके खरीदार नहीं रहे। यही हालत गोरखपुर की बिंदी की है तो खुर्जा के बर्तन (पॉटरी) उद्योग की भी। अब सड़कों के किनारे कुटीर उद्योग की तरह बिकने वाले सामानों की तरफ कोई देखना भी नहीं चाहता। अगर किसी ने देख भी लिया तो उसे बहुत कम कीमत पर खरीदना चाहता है। अगर वही सामान किसी नामी ब्रांड का स्टिकर लगा कर महंगी दुकान में मिले तो हम न केवल उसे शौक से खरीदते हैं, बल्कि दंभ से भर जाते हैं।

करीब चार दशक पहले पांचवीं कक्षा की हिंदी की किताब में इस तरह के कलाकारों-शिल्पकारों के दर्द की कहानी पढ़ी थी… जुम्मन मियां का दर्द। चार दशक पहले पेशे से दर्जी जुम्मन का दर्द यह था कि उनके सिले वस्त्रों की मांग घट रही थी। आज के जुम्मन का दर्द उससे भी आगे का है। अब वे किसी बड़ी फैक्ट्री में लगातार हाड़तोड़ मेहनत करके नौकरी करते हैं, आंखें थकने तक काम करते हैं, किसी बड़े ब्रांड के नाम का कपड़ा सिलते हैं। पैसा तो उन्हें इस काम के बदले मिल जाता है, लेकिन उनके हुनर की निजी पहचान खत्म हो गई।

गुप्त काल में भारत को अगर सोने की चिड़िया कहा जाता था तो उसकी बड़ी वजह कुटीर उद्योग और शिल्पकारों के सधे हाथों का कमाल था। लेकिन अब शिल्पकार पीछे छूट रहे हैं। स्थानीय स्तर पर उद्योगों का जो जनतंत्र विकसित हो सकता था, उसे केंद्रीकरण वाली ‘ब्रांड-व्यवस्था’ ने निगल लिया है। ऐसे में स्थानीय हुनर की पहचान लगातार खोती जा रही है। शहरों-महानगरों में नौकरियों के तौर पर एक तरह से गुलामी बढ़ रही है और स्थानीय स्तर पर रोजगार की गुंजाइशें कम होती जा रही हैं।

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