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दुनिया मेरे आगे: पूर्वाग्रह की परतें

कुछ समय पहले उत्तर प्रदेश की एक घटना ने मेरी तरह शायद किसी भी संवेदनशील इंसान को झकझोर दिया होगा, जिसमें एक बारह साल के बच्चे को उसी की उम्र के पांच अन्य बच्चों ने इस तरह मारा-पीटा कि उसकी मौत हो गई।

Author October 5, 2018 2:59 AM
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतिकात्मक तौर पर किया गया है।

कुमारी रितु

बहुत सारे लोगों की तरह मैं भी यह मानती हूं कि भविष्य में बराबरी और प्रेम पर आधारित किसी दुनिया का निर्माण होना है तो उसके लिए हमारी उम्मीद बच्चे ही हो सकते हैं। ऐसा इसलिए भी कि आमतौर पर छल-कपट और भेदभाव की मानसिकता वाले समाज में रहने के बावजूद बच्चे उन दायरों को मानने से इनकार कर देते हैं जो समाज या उसकी परंपराओं से निर्धारित हुए होते हैं। एक सुंदर दुनिया की उम्मीद ऐसे ही बच्चों से की जा सकती है। लेकिन यह तकलीफदेह है कि सामाजिक भेदभाव और विभाजन की मानसिकता से आजाद दुनिया की कल्पना हमें जिन बच्चों से साकार होती दिखाई देती रही है, उन्हें भी नफरत की राजनीति नहीं बख्शती है। कुछ समय पहले उत्तर प्रदेश की एक घटना ने मेरी तरह शायद किसी भी संवेदनशील इंसान को झकझोर दिया होगा, जिसमें एक बारह साल के बच्चे को उसी की उम्र के पांच अन्य बच्चों ने इस तरह मारा-पीटा कि उसकी मौत हो गई। कारण सिर्फ यह था कि उसने एक उत्सव के मौके पर मंदिर में टंगे गुब्बारे को छू लिया था। गुजरात से आई खबरों के मुताबिक भी जिन्होंने अपने ही हमउम्र को कहीं मूंछ रखने या एक खास तरह का जूता पहनने के लिए बुरी तरह मारा-पीटा, वे भी किशोरावस्था के आसपास ही थे। सवाल है कि इन बच्चों या किशोरों के भीतर समाज को देखने का कौन-सा नजरिया विकसित हो गया था कि वे अपनी ही तरह के बच्चों के खिलाफ इस हद तक चले गए? क्या इसके पीछे वर्ग, जाति, आपसी द्वेष या फिर महज तात्कालिक प्रतिक्रिया वजह बनी?

यों हिंसा कहीं प्रत्यक्ष होती है, कहीं परोक्ष। जाति, नस्ल या लिंग के आधार पर किसी को कमतर मानने की मानसिकता एक तरह की परोक्ष हिंसा ही है, जो कई बार प्रत्यक्ष हिंसा की शक्ल भी अख्तियार कर लेती है। इस तरह के सवालों पर विचार करना इसलिए भी जरूरी है कि जो बच्चे हमारे भविष्य के समाज की उम्मीद हैं, वे भी अब हिंसक भीड़ में तब्दील हो रहे हैं! ऐसा लगता है कि हमारे बच्चों का सामाजिक प्रशिक्षण उनके भीतर बसी मासूमियत को छीन लेता है और उन्हें विभाजित मानसिकता का शिकार बना देता है। विडंबना यह है कि हम अपनी जिस शिक्षा व्यवस्था से प्रगतिशील मूल्यों की वाहक होने की उम्मीद करते हैं, वह भी शायद बच्चों की दृष्टि में संवेदनशीलता और इंसानियत का विकास करने में कामयाब नहीं हो पा रही है। कुछ समय पहले मैं इतिहास की कक्षा में छात्राओं के साथ सामाजिक ढांचे पर आधारित एक पाठ के तहत भारत में जाति और वर्ग के बीच संबंधों पर चर्चा कर रही थी। लेकिन इस बीच कुछ ऐसा हुआ, जिसने मुझे न केवल स्तब्ध कर दिया, बल्कि जेहन में कई तरह के सवाल छोड़ दिए।

दरअसल, हमारी बातचीत जब वर्तमान समाज में मौजूद जातीय भेदभाव और जातीय दंभ के मानस को समझने के बिंदु पर पहुंची, तभी एक छात्रा ने उत्साह के साथ अपना हाथ दिखाया। वहां मेहंदी से कलाई से ऊपर और कोहनी से नीचे आगे वाले हिस्से पर बड़े अक्षरों में एक उच्च कही जाने वाली जाति का नाम लिखा था। जाहिर है, छात्रा को सामाजिक पदनुक्रम में उस खास जाति से आने का बोध था। लेकिन कम से कम एक शिक्षिका के नाते मेरे लिए वह असहज कर देने वाला क्षण था। कक्षा में सार्वजनिक रूप से उस बच्ची ने जब गर्व-भाव के साथ यह बताया तो आखिर उसे इस बात का जरा-सा भी अहसास क्यों नहीं था कि उसके ऐसा करने से उसकी कई वैसी सहपाठिनों को कैसा महसूस होगा, जिन्हें इस समाज में निम्नतर माना जाता है!

हालांकि जब मैंने विषय को उसी के हाथ पर लिखे शब्द के समाज मनोविज्ञान से संबद्ध करके आगे चर्चा की, उसके बाद उस बच्ची ने मुझे अलग से कहा कि वह इसे मिटा देगी। लेकिन इतना साफ था कि इस तरह के मसलों पर बच्ची से अब तक शायद किसी ने चर्चा नहीं की थी, इसलिए उसका ध्यान कभी इस ओर नहीं गया था। मेरा मानना है कि अगर उस बच्ची का मस्तिष्क इस भाव के साथ आकार ग्रहण कर रहा था तो इसके लिए वह नहीं, बल्कि उसका सामाजिक प्रशिक्षण जिम्मेदार है। उसके इस प्रशिक्षण में हमारी वह शिक्षा व्यवस्था भी चाहे-अनचाहे शामिल है, जिसने उसे कभी इस तरह के सवालों पर सोचने और समझने का मौका नहीं दिया। जो जैसा है, बस पाठ्यक्रम के रूप में उसे ही रटवा दिया जाए। अगर हमारी शिक्षा पद्धति इस सिद्धांत पर चलती है तो वह सिर्फ कक्षाएं पार कर ऊंची डिग्रियां हासिल करने वाला नागरिक तैयार करेगी, उसे मानवीय सोच से लैस नहीं कर सकती। बच्चों के भीतर जातिगत श्रेष्ठता और दंभ अगर आक्रामक शक्ल अख्तियार कर रहा है तो इसमें सामाजिक प्रशिक्षण के साथ-साथ हमारी शिक्षा पद्धति की भी भूमिका है। बच्चे तो मासूम होते हैं, लेकिन उन्हें यहां का समाजीकरण श्रेष्ठता या हीनता की ग्रंथि से लैस कर देता है। परिवार और समाज से मिले जातीय, लैंगिक, नस्लीय और भेदभाव को बढ़ावा देने वाले तमाम तरह के पूर्वाग्रहों से लैस मानस पर सवाल उठाए बिना क्या हम इन ग्रंथियों से अपने बच्चों को आजाद करके एक बेहतर इंसान और समाज बना पाएंगे?

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