jansatta column duniya mere aage artical Journey to risk about Delhi Cluster Bus Service - दुनिया मेरे आगे : जोखिम का सफर - Jansatta
ताज़ा खबर
 

दुनिया मेरे आगे : जोखिम का सफर

लोकतंत्र की खास बात यह है कि आप शिकायत कर सकते हैं। लेकिन सच यह है कि जिसकी शिकायत कीजिए, वह नाराज हो जाता है। आम लोग इस कदर अव्यवस्था के अभ्यस्त हो चुके हैं कि कई बार जायज सवाल उठाने वालों के साथ होने वाली हिंसा में वे भी शामिल हो जाते हैं। यह किस तरह की मानसिकता है? किस प्रकार का माहौल हम देख रहे हैं। किसी भी दुर्घटना के बाद हमारी पहली शिकायत यह होती है कि किसी ने आगाह क्यों नहीं किया!

Author June 1, 2018 3:33 AM
(File Photo)

मोहम्मद आसिफ

हाल ही में दिल्ली क्लस्टर बस सेवा का एक चालक किसी बेलगाम मोटरसाइकिल सवार की तरह बस को लहराते हुए चला रहा था। गलत तरीके से किसी वाहन से आगे निकलते हुए अनियमित रूप से ब्रेक लगा कर वह यात्रियों की जान जोखिम में डाल रहा था। बल्कि शुरू में ही बस में चढ़ते समय अगर मैं अपनी सहयात्री का हाथ पकड़ कर ऊपर नहीं खींचता तो वह बस से नीचे गिर जाती। बस चालक के इस जोखिम भरे अंदाज को देखते हुए मैंने कंडक्टर से आग्रह किया कि वह चालक से सही और सुरक्षित तरीके से चलाने को कहे। बस कंडक्टर की जिम्मेदारी केवल यात्रियों से टिकट के पैसे वसूल करना नहीं होती है। चालक और यात्रियों के बीच सामंजस्य स्थापित करना भी उसी की जिम्मेदारी होती है। यात्रियों की जरूरत और सुविधा के मुताबिक बस को चलने, रुकने आदि का आदेश देना उसके कार्य में शामिल है। लेकिन उसके रूखे जवाब के बाद मैंने बस चालक से बस को सुरक्षित चलाने का अनुरोध किया। ड्राइवर ने ज्यादा खराब तरीके से मुझे डांट दिया। फिर मैंने कंडक्टर से शिकायत पुस्तिका मांगी तो उसके साथ बैठे एक व्यक्ति ने मुझे ही गलत ठहराया और एक-दो बात के बाद ही मुझ पर हाथ चला बैठा। कंडक्टर चुप देखता रहा और चालक ने बस का विकल्प चुनने का सुझाव दे दिया। बस सेवा का कोई विकल्प नहीं है, बल्कि बस सेवा अपने आप में एक विकल्प है। अगर किसी उपक्रम के कर्मचारी ही अपने उपभोक्ताओं को विकल्प चुनने के लिए उकसाने लगें तो वे सेवा किसको देंगे? यानी आपको किसी का काम पसंद नहीं है तो विकल्प चुन लीजिए, नहीं तो आप हिंसा के शिकार हो सकते हैं।

लोकतंत्र की खास बात यह है कि आप शिकायत कर सकते हैं। लेकिन सच यह है कि जिसकी शिकायत कीजिए, वह नाराज हो जाता है। आम लोग इस कदर अव्यवस्था के अभ्यस्त हो चुके हैं कि कई बार जायज सवाल उठाने वालों के साथ होने वाली हिंसा में वे भी शामिल हो जाते हैं। यह किस तरह की मानसिकता है? किस प्रकार का माहौल हम देख रहे हैं। किसी भी दुर्घटना के बाद हमारी पहली शिकायत यह होती है कि किसी ने आगाह क्यों नहीं किया! लेकिन जब कोई आगाह करता है तो हमारी प्रतिक्रिया क्या होती है? हम दुर्घटना होने का इंतजार करते रहते हैं। सन 2016 में दिल्ली सरकार ने सार्वजनिक परिवहन में बसों की भूमिका को ध्यान में रखते हुए जनता से अधिकतम संख्या में यातायात के सार्वजनिक साधनों का इस्तेमाल करने की अपील की थी। उनमें बसें प्रमुख थीं। लेकिन अगर आम यात्रियों को ऐसे व्यवहार का सामना करना पड़े तो वह बस से यात्रा करने का दुस्साहस कैसे करेगा? 2009 में दिल्ली में ब्लू लाइन बसों के परमिट रद्द किए गए और उनकी जगह क्लस्टर बस सेवा को शुरू किया गया। ब्लू लाइन सेवा को समाप्त करने के पीछे यात्रियों की सुरक्षा को तर्क बनाया गया था। ब्लू लाइन बसों को हादसों की सवारी के रूप में देखा जाने लगा था। लेकिन एक दशक से भी कम समय में क्लस्टर बसों की हालत ब्लू लाइन सेवा की तरह होने लगी है। कुछ समय पहले महिला सीट पर बैठा एक पुरुष महिला को दिखा कर अश्लील हरकत करने लगा था। महिला की शिकायत के बावजूद कंडक्टर या बाकी यात्री मूकदर्शक बने रहे। यानी एक बात है कि बसों का रंग बदल गया, लेकिन बदलाव कुछ नहीं हुआ।

किसी भी उपक्रम को चलाने की जिम्मेदारी केवल उसके प्रशासन पर नहीं होती है। हर उपक्रम की सफलता उसमें ऊपर से लेकर निचले स्तर तक कार्यरत कर्मचारियों की व्यवहार कुशलता पर निर्भर करती है। सार्वजनिक बस सेवा के चालक और बस कंडक्टरों को यह समझना होगा कि वे केवल एक बस नहीं चला रहे हैं, बल्कि वे नागरिकों के सेवक हैं और उनका काम बड़ी जिम्मेदारी से भरा हुआ है। चालक की एक मामूली गलती से न जाने कितनी जिंदगियां उजड़ सकती हैं। सरकार और प्रशासन को ऐसे शिकायत केंद्र खोलने की जरूरत है जहां यात्रियों की शिकायतें दर्ज की जा सकें। चालकों और सह-चालकों के व्यवहार में सुधार की जरूरत है। यात्रियों को भी यह बात समझनी होगी कि चुप रहने से ऐसी गलती करने वालों को न केवल बल मिलता है, बल्कि हम दुर्घटनाओं को अप्रत्यक्ष रूप से आमंत्रण देते हैं। नागरिक सेवाओं के प्रति जिम्मेदारी-बोध के अभाव में एक कर्मचारी अपने उपभोक्ताओं के प्रति दुर्व्यवहार करता है। अपनी नैतिक जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ता है और ऐसे काम को अंजाम दे बैठता है, जिसकी उम्मीद भी नहीं की जा सकती है। ऐसी प्रवृत्तियां एक सभ्य समाज की ओर बढ़ते कदमों में बाधा डालने का काम करती हैं। एक समाज का सांस्कृतिक विकास उसके नागरिकों की चेतना के स्तर से तय होता है। एक मामूली-सी शिकायत पर अगर हम अपना आपा खो देते हैं तो हमें सोचना होगा कि हमारी चेतना का स्तर क्या है!

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App