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दुनिया मेरे आगे : सभ्यता के पैमाने

अपने अनुभव से कहती हूं कि हमारा समाज उस दलदल की तरह है, जिस पर कमल का खिलना मात्र एक वहम है। अगर कमल के लालच में आप दलदल में उतरेंगे तो धंसते चले जाएंगे। एक किताब है- ‘यह भी कोई देश है महाराज!’ एक दोस्त ने उसमें लिखा बताया कि दुनिया भर का समाज एक जैसा नहीं होता। आदिवासी क्षेत्रों में हमसे अलग मूल्य, मान्यता, बिम्ब, प्रतीक, मान-सम्मान होते हैं।

Author June 2, 2018 3:47 AM
प्रतीकात्म तस्वीर।

जीनत

सब रंग, सारे सुर, युग, जन्म, महाद्वीप, दुनिया के तमाम बड़े हथियार, अतीत हो चुकी सल्तनतें, बड़ी-बड़ी शख्सियतें, लाखों शब्द और घबराई-सी कुछ मुस्कानें, कुछ फुसफुसाहट, कुछ कमजोरियां, कुछ इच्छाएं, मजबूरियां सब मेरे साथ हैं। हवा में तैरती मेट्रो, बुलेट ट्रेन की पटरियां, बड़ी-बड़ी इमारतें और हवा को चीरते हवाई जहाज… सब मेरे सामने कागज पर एक पल में उकेर कर रख देती है मेरी कलम। बस मुझे यह नहीं दे पाती है तो एक बेफिक्र मुस्कान, बेसरहदी जमीन और आजाद खयाल जिंदगी। कहीं कोई बच्ची जंगल में तितलियों के पीछे भागने घर की दहलीज के पार निकलती है और कुछ वहशी उसे दबोच लेते हैं। जिस बच्ची ने अभी जिंदगी के फलसफे को ठीक से समझा भी नहीं होता है, उसकी मासूम आवाज और सिसकियों को उसके ही गले में दफ्न कर दिया जाता है। मैं समझ नहीं पाती हूं कि लोग ऐसा क्यों कहते हैं कि बेटी पढ़ेगी तो समाज पढ़ेगा। मैं किताबों में पाती हूं कि बेटे को पढ़ाने की रिवायत शुरू से ही रही है। फिर भी हमारे समाज में बहुत सारे लोग इतने क्रूर और बलात्कारी क्यों हैं? मैं जानना चाहती हूं समाज के ठेकेदारों से कि एक लड़की पढ़ भी ले तो क्या वाकई समाज बदल सकता है? उसकी अस्मिता को तो फिर भी तार-तार कर ही दिया जाता है! एक रोज जब मैं तसलीमा को पढ़ रही थी तो समझ नहीं पाई कि उन्हें अपने देश से जान बचा कर क्यों भागना पड़ा। ऐसा क्या लिख दिया था उन्होंने कि उन्हें जिबह करने का फरमान सुना दिया गया था। उन्होंने तो बस वही लिखा जो मैं रोज देखती हूं। अपने आसपास… टीवी के परदे पर!

अपने अनुभव से कहती हूं कि हमारा समाज उस दलदल की तरह है, जिस पर कमल का खिलना मात्र एक वहम है। अगर कमल के लालच में आप दलदल में उतरेंगे तो धंसते चले जाएंगे। एक किताब है- ‘यह भी कोई देश है महाराज!’ एक दोस्त ने उसमें लिखा बताया कि दुनिया भर का समाज एक जैसा नहीं होता। आदिवासी क्षेत्रों में हमसे अलग मूल्य, मान्यता, बिम्ब, प्रतीक, मान-सम्मान होते हैं। उनके यहां लड़की को लड़का ब्याह कर नहीं ले जाता है, बल्कि लड़की ब्याह कर लाती है। घर की मालकिन, संपत्ति का प्रतीक लड़की होती है। यह बात गौर करने वाली है कि खासी जनजाति में सूरज का प्रतीक लड़की होती है तो लड़का चांद का प्रतीक होता है। लेकिन आदिवासियों से इतर हमारे समाज में लड़कों को पढ़ाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। उसके बाद भी हमारे यहां लड़का किसका प्रतीक है- इंसान का, जानवर का, भगवान का, मुझे यह समझ में नहीं आता! अतीत में गढ़ी गई कथाओं में एक स्त्री को छले या त्याग दिए जाने के जिन रूपकों के जरिए जो बोया गया था, आज उसका हासिल हम भोग रहे हैं। देश के अलग-अलग हिस्सों में। अगर देह धारण का दंड हमारी देह और मन पर बड़े और गहरे घाव खोदा जाना है तो मैं समझती हूं कि जो लोग कन्या की भ्रूणहत्या कर देते हैं, उनसे बदतर वे हैं जो रोज हमें जीते-जी तड़पा-तड़पा के मार रहे हैं! इसमें क्या और कहां झूठ है कि कल्पना की कोरी उड़ान पर खड़ी धर्म की इमारतों में रहना और तमाम सड़कों पर औरतों का चलना कितना मुश्किल और तकलीफदेह है? उन सड़कों पर दरारें पड़ गई हैं और नुकीले पत्थर के टुकड़े उखड़ कर बाहर आ गए हैं, जिन पर हमें चलना है अपना तन छिपा कर, ताकि मौलाना, पंडित और चाचा न देख रहे हों! कोई अपना ही या रिश्तेदार अकेले पाकर मुझे नहीं नोच डालेगा, इसकी गारंटी कैसे तय हो!

वह लड़की मेरे घर के पास ही रहती है। उस गली में जिसे सब लोग चाचा कहते थे, उसके पास वह ट्यूशन पढ़ने जाती थी। एक रोज मुझे एक खबर मिली कि उस चाचा ने उसके साथ जबर्दस्ती करने की कोशिश की। जब लड़की ने विरोध किया और बात फूटी तो तमाम मर्द उसके बचाव की कोशिश में लग गए। लड़की अकेले खड़ी थी! और उसके बाद गली के तमाम चाचा मुझे नाली में बजबजाते कीड़ों की तरह लगने लगे। इसमें उस लड़की का या मेरा क्या कसूर है! हर बार लड़की को ही क्यों भागना पड़ता है? बलात्कार करने वाला गलत क्यों नहीं माना जाता? जिसके खिलाफ अपराध होता है, उसी को सवालों के कठघरे में क्यों खड़ा किया जाता है? सभ्य समाज में लड़की की मर्जी की कद्र क्यों नहीं होती। समाज अपराधियों के हक में चुप्पी साधे क्यों खड़ा हो जाता है? असम की मेरी एक दोस्त बताती हैं कि आदिवासियों में परंपरा है कि लड़की और लड़के शादी से पहले महीना भर साथ रह कर यह निश्चय करते हैं कि उन्हें जीवन साथ बिताना है या नहीं। उनके बीच लड़की की मर्जी का सम्मान किया जाता है। जबकि सभ्य कहे जाने वाले समाज में जो मिल जाए, लोग सबको नोच खाने को तैयार बैठे हैं!

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