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दुनिया मेरे आगे: बाधित सपने

जल्दबाजी में होने वाले इन बदलावों के प्रति सचेत रहने और यह सोचने की जरूरत है कि मुक्ति और समानता का जो संघर्ष ज्योतिबा फुले, सावित्रीबाई फुले और बाबा साहेब आंबेडकर ने शुरू किया था, कहीं उसे कमजोर करते हुए खत्म तो नहीं किया जा रहा है!

Author May 8, 2018 4:38 AM
अब उच्च शिक्षा संस्थाओं में स्वायत्तता के नाम पर विश्वविद्यालय अपने विद्यार्थियों से तीस प्रतिशत अधिक फीस का भुगतान करने को कहेंगे। (File Photo)

रोजाना घर से निकल कर काम की जगहों पर जाने के लिए जब हम सार्वजनिक वाहनों का प्रयोग करते हैं तो अलग-अलग समुदायों की भिन्न छवियों को देख पाते हैं। मेरे घर और काम करने के तकरीबन पंद्रह किलोमीटर के दायरे में अक्सर कई समूहों या तबकों के लोगों से मेरा सामना होता है। कुछ रोज पहले वे दो चेहरे दिखे जो हजारों जैसे ही लगते हैं। धक्का-मुक्की में खुद को खींचती और भीड़ भरी बस में जगह बनाती हुई वे बिल्कुल ऐसी लग रहीं थीं, जैसे समाज की अलग-अलग संस्थाओं में जगह बना रही हों। भीड़ में एक अधेड़ उम्र की महिला ने उनसे पूछा कि क्या करती हो, तो दुपट्टा संभालते हुए एक ने कहा- ‘हम लोग अभी कंप्यूटर सीख रहे हैं और दस हजार रुपए तनख्वाह पर एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करते हैं।’ महिला ने कहा कि दस हजार तो बहुत कम है! लड़की ने जवाब दिया- ‘प्राइवेट में इतना ही मिलता है आंटी!’ इसके बाद वे उस बस से उतर गर्इं, दूसरी बस पकड़ने के लिए। सड़क, बस और मेट्रो में रोज सैकड़ों लड़कियों को देखती हूं जो घरों से निकल कर पढ़ने या नौकरी करने जा रही हैं। लगता है कि जैसे अपने लिए नए अवसर तलाशने और खुद को रूढ़ छवियों से बाहर निकालने का लड़कियों को मौका मिल रहा है। मेरी एक मित्र एक उच्च शिक्षण संस्थान में साक्षात्कार के लिए गई, जहां उसकी फर्राटेदार अंग्रेजी और विषय पर पकड़ को देखते हुए उसे अंतिम चक्र में भेजा गया। वहां कुछ औपचारिकता पूरी करते हुए उसे कहा गया कि क्या आपके परिवार में ऐसे लोग हैं, जिनका व्यवस्था में शक्तिसंपन्न लोगों से संपर्क है! आशय शायद नेता और उच्च पदों पर आसीन अधिकारियों से था। मित्र ने कहा- ‘नहीं।’

मित्र से यह बात अनौपचारिक और सहज भाव में भी कही गई हो सकती है। लेकिन जब उसने मुझसे यह साझा किया, तब से यह बात मेरे मन-मस्तिष्क में कौंध रही है कि क्या हम बदल रहे हैं और आधुनिक हो रहे हैं? क्या यह समाज समता, समानता और समान अवसर जैसे संवैधानिक मूल्यों को सुनिश्चित कर पा रहा है? या फिर पुराने हथियारों पर आधुनिकता की परत चढ़ा कर बहुत कुछ वैसे ही हो रहा है, जैसे 1848 में सावित्रीबाई फुले के समय में हो रहा था। तब लड़कियों के लिए पहला स्कूल भारत में खुला था। यह वह दौर था जब लड़कियों के लिए पढ़ना-लिखना अपने आप में एक संघर्ष था। यों इस पुरुष प्रधान व्यवस्था में लड़कियों के लिए खुद को व्यक्ति के रूप में जानने और दुनिया को वैज्ञानिक ज्ञान के साथ तर्क के आधार पर समझने के रास्ते हमेशा से संकरे रहे हैं। यह कहना भी अतिश्योक्ति नहीं होगी कि ज्ञान और चेतना की ओर जाने वाले रास्ते उनके लिए बंद ही थे। लंबे संघर्षों के बाद वह जगह बन पाई जो लड़कियों को शिक्षा और ज्ञान से जोड़ सकी। लेकिन अब फिर बहुत कुछ उलझता और जटिल होता हुआ दिख रहा है। कुछ समय पहले विश्वविद्यालयों में उच्च शिक्षा को महंगा करने के लिए मानक तय किए गए। अब उच्च शिक्षा संस्थाओं में स्वायत्तता के नाम पर विश्वविद्यालय अपने विद्यार्थियों से तीस प्रतिशत अधिक फीस का भुगतान करने को कहेंगे।

यहां क्या यह सोचना जरूरी नहीं हो जाता कि एक ऐसे समाज में इसका असर क्या पड़ेगा, जहां आज भी लड़कियों को आमतौर पर सिर्फ इसलिए सरकारी स्कूलों में भेजा जाता है कि वहां की पढ़ाई महंगी नहीं है? किसी तरह से सरकारी स्कूलों से निकली लड़कियां जब उच्च शिक्षा की ओर रुख करेंगी तो क्या यह बढ़ा हुआ आर्थिक दवाब उनके रास्ते का रोड़ा नहीं बनेगा? सच यह है कि कहीं न कहीं वे मजबूर हो जाएंगी अपने सपनों को मार कर वापस उन्हीं भूमिकाओं में जाने के लिए जो ऐतिहासिक रूप से संस्कृति के नाम पर उन पर थोपी गई हैं। शिक्षा का यह निजी स्वरूप उन सभी वर्गों और खासतौर पर महिलाओं को शिक्षा के दायरे से बाहर कर देगा, जो सामाजिक और आर्थिक रूप से हाशिये पर हैं। उच्च शिक्षा हासिल करने के संस्थान जब महंगे होंगे तो उनमें वंचित जातियों और आर्थिक रूप से कमजोर तबकों के बच्चे बमुश्किल ही पहुंच पाएंगे।

इसके अलावा, इन तबकों के उच्च शिक्षा प्राप्त कर चुके लोगों के लिए निजी संस्थानों में शायद ही कोई रोजगार होगा, क्योंकि आमतौर पर इनके पास एक खास प्रकार की ‘सांस्कृतिक पूंजी’ नहीं होती है और न ही सत्ता संपन्न वर्गों से संपर्क। शिक्षा और शिक्षा संस्थानों का यह निजी स्वरूप कई मायनों में भयानक और विभेदकारी है। साथ ही नागरिक के रूप में हमारे समानता और समता के संवैधानिक मूल्यों का हनन भी। इसलिए जल्दबाजी में होने वाले इन बदलावों के प्रति सचेत रहने और यह सोचने की जरूरत है कि मुक्ति और समानता का जो संघर्ष ज्योतिबा फुले, सावित्रीबाई फुले और बाबा साहेब आंबेडकर ने शुरू किया था, कहीं उसे कमजोर करते हुए खत्म तो नहीं किया जा रहा है!

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