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दुनिया मेरे आगे: फूल और कांटे

एक स्वस्थ समाज के निर्माण के लिए हमें प्रेम जैसे विषयों पर गंभीरता से सोचने की जरूरत है। सिर्फ कविता और कहानियों में नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर भी कुछ ठोस काम होना चाहिए।

Author September 25, 2018 3:34 AM
चित्र का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है

सुनीता

हाल ही में घर से भागे एक प्रेमी जोड़े का वीडियो काफी प्रचारित हुआ। उसमें लड़की ने साहस के साथ कहा कि वे दोनों एक-दूसरे से प्यार करते हैं, वे किसी भी तरह अपने बलबूते रह लेंगे, चाहे उन्हें ‘नून-रोटी’ खानी पड़े या ‘माड़-भात’! …उन्हें अलग करने की कोशिश की तो वे अपनी जान दे देंगे। दूसरी घटना में परिवार की इच्छा के विरुद्ध एक प्रेमी जोड़े ने शादी कर ली। दोनों एक-दूसरे के साथ खुश थे। लेकिन लड़की के सामने ही उसके पति की हत्या कर दी गई। सिर्फ इसलिए कि लड़की के परिवार को लगता था कि उसकी मर्जी के खिलाफ जाति से बाहर प्रेम और शादी करके लड़की ने उनकी इज्जत को खत्म कर दिया है। आए दिन ऐसी घटनाएं सामने आ रही हैं। हम आधुनिक दौर की इस त्रासदी के गवाह बन रहे हैं, जिसमें क्रूरतापूर्वक प्रेमी जोड़ों को अलग कर दिया जाता है या मार डाला जाता है।

मैंने सोशल मीडिया पर जिस खूब प्रचारित हुए प्रेमी जोड़े के वीडियो की बात की, उसे ज्यादातर लोगों ने मनोरंजन के लिहाज से देखा और खूब हंसे। लड़की ने जिस बिहारी लहजे में कहा था कि ‘ठीक है’ तो उसे भी लोगों ने हास्यास्पद तरीके से बिना संदर्भ दिए प्रयोग किया और हंसी उड़ाई। प्रेम को परिभाषित किया जाने लगा कि कैसे ‘ठीक है’ और कैसे ठीक नहीं है। बहुत सारे लोगों ने लड़की के माता-पिता की इज्जत को लेकर यह कहते हुए चिंता जताई कि वे क्या मुंह दिखाएंगे समाज और पड़ोसियों को! प्रगतिशील कहे जाने वाले समाज के लोगों ने दुराग्रहों से भरी हुई असभ्य और संवेदनहीन भाषा का भी इस्तेमाल किया। चिंता इस बात को लेकर नहीं दिखी कि लड़की को उसके पिता बेइंतहा पीटते थे। यह छिपा नहीं है कि ऐसे अभिभावक झूठी इज्जत या शान की खातिर अपने बच्चों की जान भी ले लेते हैं। दूसरी ओर, जिन घटनाओं में झूठी इज्जत के नाम पर प्रेमियों को मार डाला गया था, उनके बारे में लोग कुछ पुराने और घिस गए शब्दों को साथ दुख जाहिर करते देखे गए। मसलन, ‘क्या हम इंसान हैं’, ‘ये हम किस तरफ जा रहे हैं’ आदि। यानी जो जोड़ा प्रेम के लिए घर-बार छोड़ कर निकल गया, उसे मजाक का पात्र माना गया और जिन्हें मार डाला गया, उसके लिए दुख। इस तरह की बंटी हुई संवेदनाओं का मतलब समझना कई बार मुश्किल हो जाता है। समाज का दोहरापन यह है कि आर्थिक और सामाजिक रूप से संपन्न परिवार प्रेम और विवाह के बारे में कैसा भी फैसला ले, लोग उन्हें बधाई देते हैं। एक ओर हम विज्ञान और प्रौद्योगिकी के मामले में दुनिया को टक्कर देने का दावा कर रहे हैं, वहीं प्रेम जैसे मामलों में हमारी सोच का वैज्ञानिक और प्राकृतिक नहीं होना और इस कदर पिछड़ा होना वाकई अफसोसनाक है।

आज भी अपने उच्च जाति के दंभ में भरे लोगों द्वारा निम्न मानी जाने वाली जातियों का दमन-शोषण कहां रुक सका है! यह वाकई दुखद और शर्मनाक है कि केवल धार्मिक कट्टरता या जातिगत श्रेष्ठता के झूठे दंभ में प्रेम करने वाले जोड़े को मार डाला जाए। एक सवाल मन में उठता है कि सिर्फ जाति की वजह से प्रेम करने वालों की हत्या को किस लिहाज से ‘ऑनर किलिंग’ कहा जाए! जाति के नाम पर की गई हत्या में कैसी प्रतिष्ठा? मैंने गौर किया है कि अंतरजातीय या अंतरधार्मिक प्रेम करने वाले युगल भविष्य में अपने बच्चों के प्रेम संबंधों को भी सहजता से स्वीकार करते हैं और उनका मार्गदर्शन भी करते हैं। जड़ता, संकीर्णता और नफरत में घुलते किसी भी समाज की तस्वीर इसी रास्ते बदल सकती है। भावुकता और संवेदनशीलता जैसे मानवीय गुण प्रेम से ही पैदा होते हैं। लेकिन आधुनिकता के तमाम दावे के बावजूद हकीकत यह है कि झूठी इज्जत के नाम पर कत्ल के मामलों के खौफ की वजह से कई प्रेमी जोड़े घर में बिना बताए भाग जाते होते हैं। कइयों के पास तो रहने-खाने और बसने की कोई व्यवस्था नहीं होती। बस मजबूरी में वे एक अनजान सफर पर चल पड़ते हैं, सिर्फ अपने प्रेम को बचाने के लिए। लेकिन कई बार उनके साथ अनहोनी घटना घट भी जाती है।

एक स्वस्थ समाज के निर्माण के लिए हमें प्रेम जैसे विषयों पर गंभीरता से सोचने की जरूरत है। सिर्फ कविता और कहानियों में नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर भी कुछ ठोस काम होना चाहिए। हमें प्रेमी जोड़ों को प्रोत्साहन और सुरक्षा देनी होगी, समाज और सरकार दोनों के स्तर पर। लेकिन बजाय मदद के लिए आगे आने के, उनके सबसे दुख भरे वक्त को हम कई बार जायज ठहराने लगते हैं, यह मान कर कि उन्होंने अपना रास्ता खुद चुना है। सवाल है कि उनके लिए हमारे समाज ने कौन-सा सुरक्षित और सहज रास्ता छोड़ा हुआ है! गिनती के संवेदनशील लोग हैं हमारे समाज में जो वास्तव में दुखी होते हैं। सामाजिक कार्यों के लिए देश में अनेक संस्थाएं सक्रिय हैं। मेरा मानना है कि अब इन सबको मिल कर संस्थागत रूप से ऐसी पहल करनी चाहिए कि प्रेमी जोड़ों की हिफाजत और उनका पुनर्वास हो सके। उनके हक में कानूनी लड़ाई भी लड़ी जाए। इस तरह हम कई प्रेमी जोड़ों का भविष्य बर्बाद और उनका जीवन खत्म होने से बचा सकते हैं।

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