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दुनिया मेरे आगे: शिक्षा की दुकानें

दिल्ली के अलावा तमाम छोटे शहरों में भारी तादाद में चल रहे इस तरह के कोचिंग संस्थानों में दावों और नतीजों का हाल एक ही है। लेकिन लोगों के पास शायद विकल्प कम रह गए हैं और ये कोचिंग संस्थान इसी का फायदा उठाते हैं। शिक्षा को व्यवसाय बना कर किस कदर उसका बाजारीकरण हो रहा है, ऐसे कोचिंग संस्थान इसका साक्षात प्रमाण हैं।

Author April 23, 2018 3:51 AM
इस तस्वीर का इस्तेमाल सिर्फ प्रतीक के तौर पर किया गया है।

कविता भाटिया

पिछले दिनों अपने बेटे को बारहवीं के विज्ञान विषयों की कोचिंग दिलाने के संदर्भ में मेरा कई निजी कोचिंग वालों से वास्ता पड़ा। हर गली, मोहल्ले और सोसाइटी में कुकरमुत्तों की तरह ट्यूशन केंद्र के बोर्ड लुभावनी भाषा में आमंत्रण देते नजर आए। मिलने पर उन केंद्रों के सभी अध्यापकों का दावा यह था कि वही श्रेष्ठ हैं। कोई इस आधार पर खुद को श्रेष्ठ बताता कि वह विद्यार्थियों को नोट्स, बुकलेट आदि उपलब्ध कराएगा, तो कोई इसलिए कि वह फलां स्कूल से जुड़ा है… और प्रायोगिक और मौखिक परीक्षा आदि में उसकी पहुंच रहती है। ऐसे केंद्रों में ट्यूशन फीस के नाम पर मासिक फीस की नहीं, अब हजारों में मोटे पैकेज की बात कही जाती है और आप पर अहसान कर उसे तीन-चार किश्तों में अदा करने की सुविधा दी जाती है। अगर किसी कारण आपका बच्चा अध्यापक के पढ़ाने की शैली से संतुष्ट नहीं, तो मजबूरी ऐसी कि बीच सत्र में छोड़ना मुश्किल।

यह किसी एक शहर का मामला नहीं है। दिल्ली के अलावा तमाम छोटे शहरों में भारी तादाद में चल रहे इस तरह के कोचिंग संस्थानों में दावों और नतीजों का हाल एक ही है। लेकिन लोगों के पास शायद विकल्प कम रह गए हैं और ये कोचिंग संस्थान इसी का फायदा उठाते हैं। शिक्षा को व्यवसाय बना कर किस कदर उसका बाजारीकरण हो रहा है, ऐसे कोचिंग संस्थान इसका साक्षात प्रमाण हैं। स्कूली शिक्षा से लेकर इंजीनियरिंग, मेडिकल, सिविल सेवाओं और बीएड आदि में प्रवेश की परीक्षाओं की तैयारी करवाने के नाम पर भी ऐसे संस्थानों में मोटी फीस ली जाती है। अभिभावक अपने बच्चों के उज्ज्वल भविष्य की चिंता में उनके साथ ऐसे संस्थानों के चक्कर काटते और अपनी जेबें हल्की करते देखे जा सकते हैं। नए शैक्षिक सत्र की शुरुआत में ही इनका कारोबार शुरू हो जाता है। सौ प्रतिशत अंक दिलवाने का आश्वासन देते और खुद को पंद्रह-बीस वर्षों के अनुभव का दावा करते जगह-जगह इनके विज्ञापन देखे जा सकते हैं। सोशल मीडिया के बढ़ते दायरे के कारण अब मोबाइल फोन पर भी संदेशों के जरिए कोचिंग संस्थानों और घरेलू ट्यूशन सेवाओं की जानकारी उपलब्ध कराई जाती है। पढ़ाई के लिए स्कूल से लेकर कोचिंग तक में उलझे बच्चों की हालत पस्त हो जाती है। स्कूल से लौटते ही फिर से बस्ता टांगे दोपहर से लेकर रात तक बच्चे कभी पैदल तो कभी किसी वाहन के जरिए इन्हीं कोचिंग संस्थानों में दौड़ते-भागते देखे जा सकते हैं। स्कूलों में अध्यापकों का उद्देश्य केवल पाठ्यक्रम पूरा कराना और परीक्षा लेने की खानापूरी करने तक सीमित रह गया है।

सच यह है कि आज शिक्षा का मूल्य घट रहा है। किसी भी तरह परीक्षा पास करना और प्रमाणपत्र हासिल करना उसका उद्देश्य मान लिया गया है। फिर वह प्रमाणपत्र छल-कपट, बेईमानी या रिश्वत आदि अनैतिक तरीकों से ही क्यों न हासिल हो! मनुष्य जीवन का विकास उत्तम शिक्षा से ही संभव है। वह शिक्षा जो उसे स्वविवेक, बौद्धिक जागृति और रचनात्मक-वैचारिक दृष्टिकोण की स्पष्टता दे सके। किसी दौर में शिक्षा का उद्देश्य विद्यार्थी का चरित्र गठन करना और उसे योग्य बनाना था, लेकिन अब वह इम्तहान तक सीमित होकर रह गया है। आज शिक्षा की आड़ में पैसा कमाना ही मूल उद््देश्य है। शायद इसीलिए शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी जरूरतें आम लोगों की पहुंच से दूर हो रही हैं। अगर सामान्य मध्यवर्ग या निम्न वर्ग का कोई अभिभावक अपने बच्चे को उच्च शिक्षा दिलाने का अभिलाषी हो तो ये संस्थान उसे मुंह चिढ़ाते नजर आते हैं। इन कारोबारी संस्थानों में पढ़ने वाला विद्यार्थी ऐसे संस्थानों से पढ़ कर जब सामाजिक दुनिया में प्रवेश करेगा तो वह एक श्रेष्ठ नागरिक के गुणों और नैतिक-सामाजिक मूल्यों से रहित व्यावसायिक दृष्टिकोण लिये हुए ही होगा।

कहा जाता है कि हमारी मनोवृत्ति का निर्माण हमारे जीवन और आचरण के अनुरूप ही होता है और इसका मूल आधार है हमारी शिक्षा। आज इसी शिक्षा पद्धति पर सवालिया निशान है। दरअसल, आज प्रतिस्पर्धा के माहौल में विद्यार्थियों की मौलिकता और रचनात्मकता कुचली जाती है। आपाधापी और तनाव के माहौल में बच्चे चिड़चिड़ापन, उत्तेजना, गुस्सा, बेचैनी और अभिभावकों के सपनों और इच्छाओं की लटकती तलवार से जूझते दिखाई देते हैं। मेरे एक परिचित दसवीं कक्षा की परीक्षा दे चुकी अपनी बेटी से कानून पढ़ने और वकील बनने की आकांक्षा पाले हुए हैं। जबकि बेटी से बातचीत में पता चला कि वह विज्ञान विषय पढ़ना चाहती है। अपनी इच्छाओं और सपनों को अपनी संतान पर लादने के अंजाम से हम सब परिचित हैं। जरूरी है किसी भी लक्ष्य तक पहुंचने के लिए हमें सही दिशा का ज्ञान हो और हम जो भी काम कर रहे हैं, वह पूरे मन और लगन से किया जाए। ऐसे में यह मार्गदर्शन एक जिम्मेदार शिक्षक ही दे सकता है, जो शिक्षा की दुकानदारी न कर उसे व्यापक दृष्टिकोण और वास्तविक ज्ञान से संपन्न बना सके।

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