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दुनिया मेरे आगे: वंचित बचपन

उस दिन से सोच रही हूं कि ये बच्चे जीवन के उतार-चढ़ावों को कैसे झेल पाएंगे जो इतनी छोटी उम्र में ही खुद को बूढ़ा समझने लगे हैं! उनके भीतर बुढ़ापे का भाव कहां से आ जाता है और क्यों वे इतनी जल्दी मानसिक रूप से थकान महसूस करने लगते हैं, यह समझने की कोशिश करती हूं। मैं उसे गले से लगाना चाहती थी। उसका हाथ पकड़ कर...

वर्षा

उसने कहा- ‘अब बुढ़ापे में मैं कहां सीख पाऊंगी?’ अगर सत्रह-अठारह साल के बच्चे या युवा के मुंह से आप ये शब्द सुनें तो कैसा लगेगा? मेरे दिल में कहीं कुछ चुभ-सा गया उस दिन। वह दिन और आज का दिन मैं इस चुभन को रह-रह कर अक्सर महसूस करती हूं। बास्केट बॉल के कोर्ट पर उस लड़की से मुलाकात हुई थी। बच्चों की कोचिंग के बाद हम भी बच्चों के साथ खेलने लगे। वह खेलना तो नहीं जानती थी, लेकिन उसकी लंबाई अच्छी थी तो हाथ बढ़ा कर रिंग में बॉल डाल देती थी। मैंने खेल खत्म होने पर उसका उत्साहवर्धन करते हुए कहा कि तुम सीख लो बास्केट बॉल खेलना। तुम्हें अपनी अच्छी लंबाई का फायदा मिलेगा। तुम इसमें बढ़िया करोगी। उसने जो जवाब दिया, मैं ऊपर बता चुकी हूं।

वह आइआइटी की तैयारी के लिए कक्षा छह से ही कोचिंग जा रही थी। अभी बारहवीं की परीक्षा के साथ उसने आइआइटी की परीक्षा भी दी थी। कक्षा छह से बारह के बीच उसने सिर्फ पढ़ाई की। न कोई खेल खेला, न दोस्त बनाए, न वह मस्ती की जो उसकी उम्र के बच्चे करते हैं, क्योंकि उसके पास और किसी काम के लिए वक्त ही नहीं था। जो शौक कभी पहले थे, उन्हें ये कह कर घर वालों ने छुड़ा दिए कि ‘अपने लक्ष्य पर ध्यान दो… दिमाग इधर-उधर मत भटकाओ।’ खेलकूद भी शायद उनके मुताबिक ध्यान इधर-उधर भटकाने की तरह है! जब उस परीक्षा का दिन आया, जिसकी छह साल से तैयारी चल रही थी, तो उसकी तबियत खराब हो गई। तबियत खराब होने की वजह तो पता नहीं लगी। लेकिन लगता था जैसे वह नाराज थी खुद से ही, क्योंकि अपना सौ प्रतिशत नहीं दे पाई थी परीक्षा में। या फिर हार गई थी अपने आप से ही। क्या था, पता नहीं!

उस दिन से सोच रही हूं कि ये बच्चे जीवन के उतार-चढ़ावों को कैसे झेल पाएंगे जो इतनी छोटी उम्र में ही खुद को बूढ़ा समझने लगे हैं! उनके भीतर बुढ़ापे का भाव कहां से आ जाता है और क्यों वे इतनी जल्दी मानसिक रूप से थकान महसूस करने लगते हैं, यह समझने की कोशिश करती हूं। मैं उसे गले से लगाना चाहती थी। उसका हाथ पकड़ कर उसे समझाना चाहती थी। लेकिन कुछ नहीं कह पाई। सिर्फ इतना कहा कि मैंने भी बारहवीं कक्षा के बाद ही बास्केट बॉल खेलना सीखा था और मैं बिल्कुल बूढ़ी नहीं थी, तो तुम कैसे हो सकती हो डियर! उसकी मां के चेहरे पर उसकी पढ़ाई के प्रति समर्पण को लेकर खुशी के भाव थे। उन्होंने क्या किया था अपने बच्चे के साथ, इसे वे शायद समझ नहीं पा रहीं। बाद में जब समझेंगी, तब कुछ कर नहीं पाएंगी।

कितना खूबसूरत होता है बचपन! न जाने कितने खेल, कितने दोस्त जेहन में दौड़े चले आते हैं, जब बचपन को याद करते हैं तो वे ढेर सारे खेल, वे अनगिनत दोस्त जिन्होंने किसी पाठशाला से कम पाठ नहीं पढ़ाए हमें, वे सब याद आ जाते हैं। इन सबने हमें बहुत कुछ सिखाया। क्या वह सब सीखना जरूरी नहीं होता? जीवन की पाठशाला में किताबों के पाठ हर वक्त काम नहीं आते। जिंदगी के इम्तिहानों में स्कूल की पढ़ाई कहां काम आती है! बनते-बिगड़ते रिश्तों को संवारने की कला स्कूलों के किस पाठ्यक्रम की किताब में सिखाई जाती है, कोई बताए तो जरा! हो सकता है कि बहुत से लोग मेरी इस सोच से इत्तिफाक नहीं रखें। लेकिन एक बात तो मानेंगे कि बच्चे भी इंसान ही हैं। खुश रहने का हक उनका भी उतना ही है, जितना दूसरों का। वे मशीन नहीं हैं जो हर वक्त एक ही काम करते रहें। घर से स्कूल पढ़ने, फिर स्कूल से घर खाना खाने, उसके बाद कोचिंग सेंटर में पढ़ने। वहां से शाम या रात को फिर घर खाना खाने और स्कूल कोचिंग से मिला गृह कार्य करने और बचे वक्त में सोने और अगले दिन उठ कर फिर से वही..! एकदम किसी मशीन में तयशुदा प्रोग्राम की तरह सुबह से शाम तक एक चक्र को पूरा करते। फिर अगले दिन यही। सालों-साल… बचपन और किशोरावस्था के खत्म होने तक भी। उफ्फ… यह सब सोच कर ही कोफ्त होती है उस पर। अगर वह विद्यार्थी सचेत न हो तो बस बेचारा पिस ही गया समझिए। कोई अवसाद की तरफ अग्रसर इन युवाओं की खबर लेगा? अगर ये बच्चे हार गए तो क्या हम नहीं हार जाएंगे? यह कैसा युवा हम अपने देश को दे रहे हैं जो जवान होने से पहले ही खुद को बूढ़ा समझने लगा है?

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