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दुनिया मेरे आगे: मूल्यों की शिक्षा

प्राचीन समय में हमारे देश में शिक्षा के लिए गुरुकुल या आश्रम होते थे और वहां विद्यार्थी दैनिक जीवनचर्या में बुनियादी मानवीय मूल्यों की शिक्षा प्राप्त करते थे। आज भी हमारे देश में कुछ ऐसे उच्च अधिकारी हैं जो अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में शिक्षा दिलवा रहे हैं।

दीपक गिरकर

जब किसी सरकारी अधिकारी, डॉक्टर, इंजीनियर, बड़े कारोबारी के भ्रष्टाचार, निर्दयता, असंवेदनशीलता की कहानी सामने आती है तो हमारे मस्तिष्क में एक ही बात आती है कि क्या इन्हें स्कूली शिक्षा के दौरान मानवीय मूल्यों की गुणवत्ता वाली शिक्षा मिली थी? शिक्षा को सरकार ने कभी अहमियत नहीं दी है। उसी का परिणाम हम समाज में देख रहे हैं। पिछले कुछ दशकों से शिक्षा के क्षेत्र में काफी गिरावट आई है और इसका बाजारीकरण हो गया है। आज शिक्षा का उद्देश्य ही सिर्फ डॉक्टर, इंजीनियर, सरकारी अधिकारी, चार्टर्ड अकाउंटेंट, कंपनी का सीईओ या बड़ा कारोबारी बनना हो गया है। शहरों और कस्बों में भारी-भरकम फीस वसूल करने वाले निजी स्कूल और कॉलेज तो हैं ही, इसके अलावा कुकुरमुत्तों की तरह कोचिंग संस्थान खुल गए हैं, जो मोटी फीस वसूल कर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करवाते हैं। बच्चों के निजी स्कूल और कोचिंग संस्थान में शिक्षण की वजह से उनके माता-पिता पर खर्च का भारी बोझ पड़ता है। यही वजह है कि इन दिनों लोग एक बच्चे के जन्म के बाद दूसरे बच्चे का विचार छोड़ देते हैं। दूसरी ओर, शिक्षा के व्यवसायीकरण ने शिक्षकों को भी गुणवत्ता वाली शिक्षा से दूर कर दिया है।

आज की शिक्षा व्यवस्था से देश में साक्षरता की दर जरूर बढ़ी है, लेकिन स्कूल और कॉलेज से विद्यार्थी सिर्फ रोबोट बन कर निकल रहे हैं। उनमें अच्छे संस्कार, संयम, साधना, महत्त्वाकांक्षा, परिश्रम, रचनात्मक दृष्टिकोण, वफादारी, समझदारी, नैतिक साहस और व्यावहारिक बुद्धि, शराफत, आत्मसम्मान, संवेदनशीलता, कर्मठता, सहजता और सकारात्मक सोच का अभाव साफ दिखता है। आज युवाओं में नकारात्मकता जन्म ले रही है, उनमें धैर्य की कमी दिखाई देती है, वे कठिन परिश्रम के बजाय कम मेहनत करके किसी भी तरीके से सफलता प्राप्त करना चाहते हैं और उच्च पद, धन-दौलत ही उनके आदर्श बन गए हैं। इन सभी कारणों से बच्चे और युवा मानसिक तनाव का शिकार होते जा रहे हैं। हर व्यक्ति की स्कूली शिक्षा की बुनियाद मजबूत होनी चाहिए, क्योंकि वही व्यक्तित्व के निर्माण की नींव है। आज देश की आर्थिक और सामाजिक प्रगति के लिए ऐसी बुनियादी मानवीय मूल्यों की शिक्षा की आवश्यकता है जो विद्यार्थियों के जीवन को समग्र रूप से प्रभावित करती हो और उनके व्यक्तित्व का निर्माण करने में सहायक हो। यह सच है कि जीवन में गुणवत्ता वाली शिक्षा से ही मानव संसाधन का वास्तविक विकास होता है। विकसित मानव संसाधन से देश का सामाजिक और आर्थिक विकास संभव है। गुणवत्तायुक्त शिक्षा से लैस व्यक्ति ही जीवन में अपना निर्णय खुद ले सकता है और समाज की प्रगति में अपना योगदान दे सकता है।

प्राचीन समय में हमारे देश में शिक्षा के लिए गुरुकुल या आश्रम होते थे और वहां विद्यार्थी दैनिक जीवनचर्या में बुनियादी मानवीय मूल्यों की शिक्षा प्राप्त करते थे। आज भी हमारे देश में कुछ ऐसे उच्च अधिकारी हैं जो अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में शिक्षा दिलवा रहे हैं। विकसित देशों में तो धनवान लोगों के बच्चे भी सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं। इसी तरह, सरकारी स्कूलों में भी ऐसे तमाम आदर्श शिक्षक हैं जो कर्मठ, सहज और कर्तव्यनिष्ठ हैं। वे अपने विद्यार्थियों को बुनियादी मानवीय मूल्यों की शिक्षा भी पाठ्य-पुस्तकों की शिक्षा के साथ दे रहे हैं।
मेरी निगाह में ऐसे शिक्षक ही असली सम्मान के पात्र हैं। विडंबना यह है कि एक ओर देश भर के सरकारी स्कूलों में शिक्षकों के लाखों पद खाली हैं और दूसरी ओर देश में बेरोजगारी फैली है। सरकारी स्कूलों में कई खामियां हैं। आवश्यक सुविधाओं और उपकरणों के अभाव के अलावा अधिकतर स्कूलों की इमारतें जर्जर अवस्था में हैं। शिक्षकों के प्रशिक्षण पर होने वाला खर्च नगण्य है। शिक्षा के अलावा सरकारी शिक्षकों के सिर पर तो सरकार ने न जाने कितना इतर बोझ लाद रखा है। शिक्षकों के इतने सारे कार्यों को देखते हुए ऐसा लगता है कि सरकार ने शिक्षकों के गले में ‘एकल खिड़की व्यवस्था’ की तख्ती टांग दी है। बेहतर हो कि उनसे केवल शिक्षण का काम लिया जाए और उनके प्रशिक्षण से लेकर तमाम उपाय कर स्कूलों में गुणवत्ता आधारित शिक्षा सुनिश्चित की जाए।

देश में शिक्षा के क्षेत्र में राजनीतिक संकल्प की कमी है। देश का सर्वांगीण और समग्र विकास तभी संभव है जब सरकार शिक्षा को प्राथमिक एजेंडे के तौर पर लेगी। सरकारी शिक्षकों को मिलने वाला वेतन समान और आकर्षक होना चाहिए, क्योंकि शिक्षकों का काम बहुत महत्त्वपूर्ण है। तभी शायद शिक्षक भी स्कूलों में बच्चों के प्रति ज्यादा जवाबदेह और संवेदनशील हो सकेंगे। यों शिक्षकों को यह बड़ी जिम्मेदारी भी अब अपने हाथ में लेनी होगी कि सरकारी स्कूलों के बारे में लोगों के बीच बनी छवि बदले। एक नागरिक होने के नाते हमें भी आत्मनिरीक्षण की जरूरत है। हमें शिक्षकों को सम्मान की नजर से देखना होगा। सरकारी स्कूलों का सशक्तीकरण करना ही इससे पैदा होने वाली समस्याओं का समाधान है।

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