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दुनिया मेरे आगे: असुरक्षित बेटियां

सोचने लगता हूं दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश को अंग्रेजों से आजाद कराने में कितने लोगों की जान चली गई और कितनी महिलाएं अकेली लाचार रह गर्इं और कितने बच्चे अनाथ हो गए थे। उस देश में आज हालात ये हो गए हैं कि बच्चियां अपने ही घर में सुरक्षित नहीं हैं।

बृजमोहन आचार्य

सुबह-सुबह मंदिरों में घंटियों के साथ आरती और मस्जिदों में अजान की आवाज सुनता हूं तो मन को सुकून मिलता है। सोचता हूं कि धर्मनिरपेक्ष देश में पैदा होने का यही सुख है। लेकिन जब उसी समय खबरों में बच्चियों के साथ बुरा बर्ताव, बलात्कार और मारपीट की घटनाओं से जुड़ी खबरें पढ़ता हूं तो मन विचलित होने लगता है। सोचने लगता हूं दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश को अंग्रेजों से आजाद कराने में कितने लोगों की जान चली गई और कितनी महिलाएं अकेली लाचार रह गर्इं और कितने बच्चे अनाथ हो गए थे। उस देश में आज हालात ये हो गए हैं कि बच्चियां अपने ही घर में सुरक्षित नहीं हैं। जिस देश में तैंतीस करोड़ देवी-देवताओं का वास माना जाता है, नवरात्र के दिनों में बच्चियों को पूजा जाता है, उसी देश में बच्चियों के साथ इस तरह की त्रासद घटनाएं होंगी, यह कल्पना में भी नहीं आता है। उत्तर प्रदेश के अमरोहा जिले के गजरौला में एक पिता ने अपनी बच्चियों को इसलिए बिजली के खंभे से बांध कर पीटा कि बच्चियों के हाथों से दस रुपए का नोट गुम हो गया था। इसी प्रांत के देवरिया के बालिका गृह में बच्चियों के साथ बलात्कार की घटना सामने आई।

ये चंद समाचार बस उदाहरण भर हैं। देश भर में बच्चियों के साथ न जाने क्या-क्या बुरा बर्ताव होता है, किसी ने सोचा भी नहीं होगा। देश की आजादी के बाद से ही राजनेता भुखमरी मिटाने की बात करते रहे हैं। देश की राजधानी में सरकार के दो मंत्री गाड़ियों में घूमते हैं और भुखमरी मिटाने का संदेश देते हैं। इसी राजधानी में कई दिनों से भूखी रही तीन बहनों ने दम तोड़ दिया था। जब इस प्रकार की घटनाएं सामने आती हैं तब भी देश के सबसे बड़े मंदिर में बैठने वाले नेताओं को कोई चिंता नहीं होती है। बच्चियों की सुरक्षा के लिए कानून बने हुए हैं और फैसलों को सुनाने वाली अदालतें भी मौजूद हैं। फिर भी समाज के फैसलों को परिवार के लोग बेचारे बन कर स्वीकार करते हैं। राजस्थान के बूंदी कस्बे के हरिपुरा गांव में समाज की पंचायत के ठेकेदारों ने एक नाबालिग बच्ची को इस जुर्म में जाति से निकाल दिया कि उसकी गलती से एक पक्षी टिटहरी का अंडा फूट गया था। अगर बच्ची का यह जुर्म इतना बड़ा था तो कुछ मशहूर माने जाने वाले लोग तो जंगल में शिकार खेलते हैं और बॉलीवुड के एक चेहरे ने तो चिंकारा को मार दिया था। फिर भी किसी ने उस शख्स की फिल्मों का बहिष्कार नहीं किया या फिर न उसे किसी फिल्म निर्माता ने अपनी फिल्म में काम करने से मना किया। प्रचंड गरमी में अपने घर के बाहर बने टिन के नीचे दस दिनों तक वह बच्ची समाज के फैसले के कारण बैठी रही। इस फैसले से बच्ची की मां के दिल और दिमाग पर क्या गुजरी होगी, जिसने उसे नौ माह तक गर्भ में रखा और बड़ी होने के बाद क्या-क्या सपने देखे होंगे?

जिस बच्ची की उम्र हंसने, खेलने-कूदने की हो, हमउम्र बच्चों के साथ बतियाने की हो, उसके साथ ऐसा बर्ताव करके समाज बच्चों के दिमाग पर कौन-सी छाप छोड़ना चाहता है? अब अगर यह बच्ची स्कूल या फिर किसी समारोह में जाएगी तो क्या अन्य बच्चे इस बारे में बात नहीं करेंगे? जाति पंचायत के उस व्यवहार की चोट उस अबोध बालिका के दिलो-दिमाग से जिंदगी भर नहीं मिटेगा। इस बारे में समाज ने कभी नहीं सोचा। राज्य में मुख्यमंत्री महिला हैं, बच्चों के लिए बाल संरक्षण आयोग भी बना हुआ है। मगर चुनावों में राजनीतिक रोटियां सेंकने वाले नेता कानून से बड़ा समाज को मानने लगे हैं, क्योंकि उन्हें मालूम है कि समाज के ठेकेदार ही चुनावों में काम आएंगे। आज देश की हालत यह हो गई है कि कोई बच्ची स्कूल-कॉलेज या फिर ट्यूशन पढ़ने जाती है तो जब तक वह वापस घर नहीं आ जाती, तब तक अभिभावकों के चेहरे पर चिंता की लकीरें उभरी रहती हैं। इस प्रकार की घटनाओं में लगातार बढ़ोतरी को देखते हुए सरकार को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी और कानूनी मोर्चे पर सख्त पहलकदमी करनी होगी। समाज को आईने में देखना होगा कि उसके व्यवहार में ऐसा क्या हो गया कि लोग अपनी बच्चियों को लेकर उससे असुरक्षित महसूस करने लगे हैं। जबकि एक समूह के रूप में समाज तो सभी लोगों के बीच एक तरह का सुरक्षाबोध देता है। लेकिन आज बाहर गली-सड़कों से लेकर अपने घरों तक में बच्चियां महफूज नहीं हैं। आखिर ऐसा क्या हुआ है, किसने समाज में जहर घोल दिया है कि समूह में सुरक्षित महसूस करने वाले लोग उल्टे डर महसूस करने लगे हैं। यह स्थिति किसी भी उस नागरिक को परेशान करेगी जो हर अगले रोज समाज से सभ्य होने और संवेदनशील व्यवहार करने की अपेक्षा करता होगा।