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दुनिया मेरे आगे: असुरक्षित बेटियां

सोचने लगता हूं दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश को अंग्रेजों से आजाद कराने में कितने लोगों की जान चली गई और कितनी महिलाएं अकेली लाचार रह गर्इं और कितने बच्चे अनाथ हो गए थे। उस देश में आज हालात ये हो गए हैं कि बच्चियां अपने ही घर में सुरक्षित नहीं हैं।

Author September 1, 2018 2:02 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

बृजमोहन आचार्य

सुबह-सुबह मंदिरों में घंटियों के साथ आरती और मस्जिदों में अजान की आवाज सुनता हूं तो मन को सुकून मिलता है। सोचता हूं कि धर्मनिरपेक्ष देश में पैदा होने का यही सुख है। लेकिन जब उसी समय खबरों में बच्चियों के साथ बुरा बर्ताव, बलात्कार और मारपीट की घटनाओं से जुड़ी खबरें पढ़ता हूं तो मन विचलित होने लगता है। सोचने लगता हूं दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश को अंग्रेजों से आजाद कराने में कितने लोगों की जान चली गई और कितनी महिलाएं अकेली लाचार रह गर्इं और कितने बच्चे अनाथ हो गए थे। उस देश में आज हालात ये हो गए हैं कि बच्चियां अपने ही घर में सुरक्षित नहीं हैं। जिस देश में तैंतीस करोड़ देवी-देवताओं का वास माना जाता है, नवरात्र के दिनों में बच्चियों को पूजा जाता है, उसी देश में बच्चियों के साथ इस तरह की त्रासद घटनाएं होंगी, यह कल्पना में भी नहीं आता है। उत्तर प्रदेश के अमरोहा जिले के गजरौला में एक पिता ने अपनी बच्चियों को इसलिए बिजली के खंभे से बांध कर पीटा कि बच्चियों के हाथों से दस रुपए का नोट गुम हो गया था। इसी प्रांत के देवरिया के बालिका गृह में बच्चियों के साथ बलात्कार की घटना सामने आई।

ये चंद समाचार बस उदाहरण भर हैं। देश भर में बच्चियों के साथ न जाने क्या-क्या बुरा बर्ताव होता है, किसी ने सोचा भी नहीं होगा। देश की आजादी के बाद से ही राजनेता भुखमरी मिटाने की बात करते रहे हैं। देश की राजधानी में सरकार के दो मंत्री गाड़ियों में घूमते हैं और भुखमरी मिटाने का संदेश देते हैं। इसी राजधानी में कई दिनों से भूखी रही तीन बहनों ने दम तोड़ दिया था। जब इस प्रकार की घटनाएं सामने आती हैं तब भी देश के सबसे बड़े मंदिर में बैठने वाले नेताओं को कोई चिंता नहीं होती है। बच्चियों की सुरक्षा के लिए कानून बने हुए हैं और फैसलों को सुनाने वाली अदालतें भी मौजूद हैं। फिर भी समाज के फैसलों को परिवार के लोग बेचारे बन कर स्वीकार करते