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दुनिया मेरे आगे : चिठिया हो तो

उन दिनों टेलीफोन एक्सचेंज के ऑपरेटर द्वारा ट्रंककॉल पर की जाने वाली वार्ताओं को सुनने के संबंध में भी अनेक रोचक किस्से पुराने लोग सुनाते हैं। जब देश में एसटीडी सेवाएं शुरू हुर्इं तो जगह-जगह पीसीओ यानी टेलीफोन बूथ खुल गए।

Author June 8, 2018 04:56 am
जब देश में एसटीडी सेवाएं शुरू हुर्इं तो जगह-जगह पीसीओ यानी टेलीफोन बूथ खुल गए। बहुत से लोगों को रोजगार मिला।(Source: Wikipedia)

अतुल कनक

एक वाक्य है- ‘अत्र कुशलं तत्रास्तु।’ नई पीढ़ी को इस वाक्यांश से कुछ याद आए या नहीं, लेकिन जिन लोगों का जन्म सत्तर के दशक में या उसके पहले हुआ है, उनके लिए संस्कृत का यह छोटा-सा वाक्यांश अनगिनत यादों के झरोखे खोल देता है। ‘अत्र कुशलं तत्रास्तु’ का शाब्दिक अर्थ है कि यहां सर्वकुशल है और वहां भी ऐसा ही हो। अस्सी के दशक के अंत तक लोग जब पत्रों के माध्यम से परस्पर संवाद करते थे, तब बहुधा चिट्ठियों की शुरुआत या तो इस वाक्यांश के साथ होती थी या फिर ‘यहां पर सब कुशल है। उम्मीद है वहां भी सब कुशलपूर्वक होंगे। आगे हाल यह है कि…’ जैसे वाक्यों से होती थी। आमतौर पर घर के हर सदस्य के हाथ में पहुंच गए मोबाइल फोन और त्वरित संवाद के अन्य माध्यमों ने लोगों से इंतजार का वह मीठा सुख छीन लिया है जो चिट्ठी के माध्यम से किसी प्रियजन की कुशलक्षेम प्राप्त करने में मिलता था। उस दौर में टेलीफोन आभिजात्य होने की निशानी समझा जाता था। टेलीफोन का एक कनेक्शन पाने के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता था और वीआईपी कोटे की वरीयता हासिल करने के लिए लोग अपने-अपने तरीके के जुगाड़ भी किया करते थे। अस्सी के दशक के मध्य तक तो टेलीफोन घर में हो जाने के बावजूद किसी अन्य शहर में रहने वाले रिश्तेदारों से बात करना बहुत आसान नहीं होता था। लोगों को ‘ट्रंककॉल’ बुक करवा कर अपनी लाइन मिल जाने की प्रतीक्षा करनी होती थी और बातचीत के तीन मिनट बीत जाने के बाद ऑपरेटर बात काट कर पूछ लिया करता था कि आप अपनी बात जारी रखना चाहते हैं या नहीं।

उन दिनों टेलीफोन एक्सचेंज के ऑपरेटर द्वारा ट्रंककॉल पर की जाने वाली वार्ताओं को सुनने के संबंध में भी अनेक रोचक किस्से पुराने लोग सुनाते हैं। जब देश में एसटीडी सेवाएं शुरू हुर्इं तो जगह-जगह पीसीओ यानी टेलीफोन बूथ खुल गए। बहुत से लोगों को रोजगार मिला। चूंकि रात को सात बजे बाद बात करने पर कॉल की दरें कम हो जाती थीं, तो सात बजे बाद लोगों को एसटीडी पीसीओ बूथ के बाहर लाइन में अपनी बारी की प्रतीक्षा करते देखा जा सकता था। इस दौर में जिन लोगों के यहां टेलीफोन नहीं थे, वे अक्सर ‘पीपी नंबर’ का इस्तेमाल करते थे। ‘पीपी नंबर’ का अर्थ कुछ लोग ‘पड़ोसी का फोन’ बताते थे। लेकिन यहां बात चिट्ठियों की। निश्चित रूप से चिट्ठियों की शुरुआत अपने प्रियजन तक संदेश पहुंचाने की आवश्यकता और आकांक्षा के कारण हुई होगी। पुराने दौर में राज्य के घुड़सवार आवश्यक पत्रों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाते थे। कुछ व्यापारिक संगठन भी सशुल्क ऐसी सेवाएं देते थे। गुप्तचरों और डाकुओं द्वारा पत्रवाहकों को रोक कर मार दिया जाना आम बात थी। लोगों ने कबूतरों का भी इस्तेमाल पत्रवाहक के तौर पर किया।

महज साढ़े तीन दशक पहले तक का चिट्ठियों का ढंग नई पीढ़ी के लिए रोचक हो सकता है। पोस्टकार्ड, अंतर्देशीय पत्र और लिफाफों का उपयोग लोग अपनी-अपनी सुविधा और आवश्यकतानुसार करते थे। पोस्टकार्ड कुशल समाचार भेजने का सबसे सस्ता साधन था। आज भी पोस्टकार्ड और अंतर्देशीय अस्तित्व में हैं, लेकिन लोग उनका उपयोग अपवादस्वरूप ही करते हैं। हिंदी के दिग्गज कवि हरिवंश राय बच्चन और हिंदी कवि मंचों के लोकप्रिय कवि बालकवि बैरागी अंत तक निरंतर पत्र लिखते रहे। उनके लिखे पत्र कई लोगों के पास संग्रहित हैं। हिंदी साहित्य में पत्र लेखन को एक स्वतंत्र विधा का दर्जा प्राप्त है। दुनिया भर में पत्र लेखन को बहुत गंभीरता से लिया जाता रहा है। विशिष्ट विद्वानों के परस्पर पत्र-व्यवहार के महत्त्वपूर्ण संग्रह भी प्रकाशित हुए हैं। कुछ पत्र अपने कथ्य के कारण बहुत चर्चित हुए हैं। अब्राहम लिंकन का अपने बेटे के नाम लिखा पत्र इसका एक उदाहरण है। आज भी इस पत्र को पिता-पुत्र के परस्पर रिश्ते की गरिमा और पिता द्वारा बेटे को दी जाने वाली सीख के संबंध में प्रमुखता से उल्लेख किया जाता है।

पत्र किसी व्यक्ति का मार्गदर्शन करने और अपनी मंजिल की ओर बढ़ने को प्रोत्साहित करने का अद्भुत माध्यम रहे। ‘सफेद-सफेद चावल मैं कूट-कूट कर धोता हूं/ बहन तुमरी याद में मैं, फूट-फूट कर रोता हूं’ जैसी तुकबंदियों से आम लोग अपनी बात को रोचक बनाने का प्रयास करते थे तो कई बार लोग फिल्मी गीतों के मुखड़े भी इस्तेमाल करने से नहीं चूकते थे। ‘राग दरबारी’ उपन्यास में श्रीलाल शुक्ल ने रोचक वर्णन किया है कि किस तरह गांव का एक लड़का अपने मन की बात कहने के लिए कागज पर कुछ फिल्मी गीतों के मुखड़े लिख कर अपने प्रेम का भरोसा अपनी प्रिया को जताता है। चूंकि पत्र लिखते समय भावों को प्रभावशाली तरीके से अभिव्यक्त किया जा सकता है, इसलिए प्रेम को अभिव्यक्त करने के लिए सारी दुनिया में पत्रों ने रोचक भूमिका निभाई। खुशबू में भीगा गुलाबी रंग का कागज खाली होकर भी क्या-क्या कह जाता था, इसे केवल वही महसूस कर सकता है, जिसने उस सुख को अद्भुत किया हो। प्रेम-पत्रों की एक पूरी दुनिया है।

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