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दुनिया मेरे आगे: कित्ता कित्ता पानी

कुछ देश तो इस विषय में काफी आगे बढ़ गए हैं। इस संदर्भ में इजराइल का नाम लिया जाता है। वहां समुद्र के जल को पीने योग्य बनाने के प्रयास शुरू हो गए हैं। कुछ वर्ष पहले हमारे देश में वर्षा जल-संचय की मुहिम चली थी। वह बारिश में बर्बाद होते पानी को बचाने का एक तरीका था।

Author August 17, 2018 2:48 AM
तस्वीर का इस्तेमाल सिर्फ प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है। (फोटोः Freepik)

हेमंत कुमार पारीक

यह कभी सोचा नहीं था। पहले किसी ने पाउच यानी प्लास्टिक की थैली में पानी बिकने की बात कही तो वह गले नहीं उतरी थी। उसे आश्चर्य से देखा था। वजह यह थी कि उस वक्त पानी हर जगह उपलब्ध था। बचपन में सैर के लिए जाते थे तो छल-छल करती नदी के किनारे रेत में कुइया यानी गड्ढा खोद कर पानी साफ कर लेते थे और मीठे जल से प्यास बुझाते थे। उस वक्त गांव में यत्र-तत्र कुएं और नगरपालिका की ओर से लगवाए गए नल हुआ करते थे। पानी की कोई किल्लत नहीं थी। चारों तरफ पानी ही पानी था। गरमी में भी यही हाल थे। चौराहों पर और दुकानों के सामने ही प्याऊ मिल जाती थी, तो वहीं पेड़ के नीचे पानी के घड़े रखे मिलते थे। लोग पानी पिला कर पुण्य कमाने की बात करते थे। गरमी के दिनों में विद्यार्थियों की ‘समर वेकेशन’ यानी इस मौसम की छुट्टियां होती थीं। स्वप्रेरणा से स्कूली छात्र रेलवे प्लेटफार्म पर पानी की बाल्टी लिए इधर-उधर एक डिब्बे से दूसरे में भागते दिखते थे। ट्रेन के यात्रियों को पानी पिलाने का पुण्य कार्य करते थे।

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कुछ वर्ष पहले गांव के उसी स्टेशन से गुजरा था। लोगों के हाथ में पानी की बोतलें और पाउच देख दंग रह गया। धीरे-धीरे ये बोतलें ट्रेन के सभी यात्री के हाथों में दिखने लगी थीं। पानी का बिकना शुरू हो गया था। आश्चर्य तब हुआ जब किसी वैज्ञानिक का लेख पढ़ा। उसमें कहा गया था कि चौथा विश्वयुद्ध पानी के लिए लड़ा जाएगा। इसी तारतम्य में मेरे एक व्यापारी मित्र ने हंसते हुए कहा था कि एक फैक्ट्री लगाने की सोच रहा हूं। पानी की बोतलें और पाउच की पैकिंग करूंगा। इस वक्त पानी का बाजार है।’ उस समय भी उसकी कही बात को गंभीरता से नहीं लिया था। लेकिन अब देख रहे हैं कि चारों तरफ पानी ब्रांडेड बोतल और पाउच में बिक रहा है। यहां तक कि किसी रेस्तरां या होटल में भी पानी बोतलों में दिया जाता है और उसका अलग से मूल्य चुकाना पड़ता है। वरना कभी इस तरफ ध्यान ही नहीं गया। पानी की महत्ता को कभी हमने समझा ही नहीं था। पानी नल को टोटियों से बेवजह बहता रहा और हमने कभी उसका महत्त्व नहीं समझा। जहां एक गिलास पानी की जरूरत थी, हमने एक बाल्टी पानी खर्च कर दिया।

पानी के महत्त्व को हमारे पूर्वजों ने समझा था। इसलिए शुरू से सुनते रहे कि पानी का अपव्यय नहीं करना चाहिए। सदियों पहले रहिमन भी कह गए हैं- ‘रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून…!’ इस संदर्भ में कई ऐसे उदाहरण भी मिलते हैं कि लोग प्यास से मर गए। आज भी देखता हूं कि मेरे सरकारी आवास के पीछे झुग्गी बस्ती है। वहां पानी का मात्र एक नल है। सुबह-सुबह बर्तनों की खटर-पटर के साथ चीख-पुकार मच जाती है। कभी-कभी तो हालत यह हो जाती है कि लोग पानी के लिए मरने-मारने पर उतारू हो जाते हैं। आज भी कभी-कभी ख्रबरें पढ़ता हूं कि गांवों में लोग बूंद-बूंद पानी को तरस रहे हैं। राजस्थान में तो महिलाएं घर से दूर पानी लेने जाती हैं। लोग सूखे कुओं में रस्सी के सहारे उतर कर पानी लाने को मजबूर नजर आते हैं। आश्चर्य की बात है कि पानी की कमी वहां होती है जहां कभी कल-कल बहती नदियां हुआ करती थीं। यत्र-तत्र कुएं, बावड़ी और नल होते थे। पानी पिला कर आदमी पुण्य कमाता था। आज वहीं आदमी प्यास के मारे छटपटा रहा है। दो बूंद पानी के लिए मारामारी मची है। पीने योग्य पानी नहीं बचा है। हालांकि पूरी दुनिया में सत्तर प्रतिशत पानी है। मगर उसका अधिकांश पीने लायक नहीं है। जिस तरह ऊर्जा के लिए आज वैज्ञानिक वैकल्पिक स्रोतों की खोज में सौर ऊर्जा का दोहन करने में लगे हैं, उसी तरह पानी के लिए अब दुनिया भर में उपलब्ध महासागरों की तरफ लोगों का ध्यान गया है।

कुछ देश तो इस विषय में काफी आगे बढ़ गए हैं। इस संदर्भ में इजराइल का नाम लिया जाता है। वहां समुद्र के जल को पीने योग्य बनाने के प्रयास शुरू हो गए हैं। कुछ वर्ष पहले हमारे देश में वर्षा जल-संचय की मुहिम चली थी। वह बारिश में बर्बाद होते पानी को बचाने का एक तरीका था। उस वक्त कई जागरूक लोगों ने इसे अपनाया था। सरकार ने भी सहयोग किया। निर्माणाधीन मकानों पर इसे अनिवार्य कर दिया था। पर धीरे-धीरे यह मुहिम भी शिथिल पड़ गई और यह भी समय की धुंध में कहीं खो गया। आज जब कभी सुबह के वक्त मैं सैर-सपाटे पर निकलता हूं तो एक तरफ पानी की कमी से जूझते लोगों को नगर निगम के नलों पर कतार में खड़ा पाता हूं तो दूसरी तरफ बंगलों के सामने पानी से धुलती गाड़ियां नजर आती हैं।

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