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दुनिया मेरे आगे : विश्वास बनाम विज्ञान

जब बारिश नहीं होती थी तो किसी पंडित या पुजारी के कहने पर किसी प्रतिष्ठित मंदिर में शिव का दूध से अर्घ भरा जाता था। अगर इलाके में कोई साधु होता था, तो वह यज्ञ का आयोजन करने के लिए लोगों को कहता था। इस प्रक्रिया में कभी बारिश हो जाती थी और कभी नहीं।

Author June 15, 2018 3:48 AM
तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक रूप से किया गया है। (फोटो सोर्स प्रदीप दास)

बचपन में अपने आसपास भी यह सुनता और देखता था कि कोई व्यक्ति अपनी कोई मनोकामना पूरी करने के लिए किसी पूजा या यज्ञ का आयोजन कराता था। अब इस तरह के आयोजन से उसकी मनोकामना पूरी होती थी या नहीं, यह तो किसी को पता नहीं चलता था, लेकिन उसके प्रभाव में दूसरे लोग जरूर आ जाते थे। हाल ही में एक खबर आई कि गुजरात में बारिश के लिए अलग-अलग जिलों में बड़े स्तर पर यज्ञ कराए जाएंगे। मेरे लिए यह समझना मुश्किल है कि आज जब वैज्ञानिक सोच की सबसे ज्यादा जरूरत महसूस की जा रही है, इस तरह के आयोजनों के जरिए देश और समाज को क्या दिया जा सकेगा! जब हम छोटे थे और बारिश नहीं होती थी, सूखे के आसार बन जाते थे, तब गांवों के गरीब परिवारों के बच्चे मिल कर घर-घर जाते थे और दरवाजे पर खड़े होकर एक साथ चिल्लाते थे- ‘मेघ हो मेघ, पानी बरसाओ, मेघ हो मेघ।’ जिस घर के सामने जाकर वे ऐसा कहते थे, वहां से उनके ऊपर एक-दो बाल्टी पानी उड़ेल दिया जाता था और वे मिट्टी में लोटने लगते थे। कीचड़ से सने बच्चों को बादलों से पानी के लिए गुहार के बदले में कुछ अनाज दिया जाता था। यही क्रम वे पूरे गांव के ज्यादातर घरों के सामने जाकर पूरा करते थे।

पानी और अच्छी बारिश के लिए ऐसे टोटकों की शुरुआत गरमी में ही हो जाती थी। तब लोग मौसम के बारे में भी गुसार्इं, ओझा या तांत्रिक से पूछते थे। वह भविष्यवाणी करता था कि बरसात में बारिश कैसी होगी। हालांकि उन मौकों पर गुसार्इं की ओर से बातों को इस तरह कहा जाता था, जिसका साफ-साफ मतलब शायद ही कोई निकाल पाता था। बारिश अच्छी हुई तो लोग कहते थे कि गुसार्इं ने पहले ही बता दिया था और सूखा पड़ा तो भी यही बात कही जाती थी। ऐसी भ्रम में डालने वाली बात करना सबके बस में नहीं था या फिर ज्यादातर लोग उसे समझ सकने की कोशिश नहीं करते थे। दरअसल, यह आम लोगों के समझ की सीमा थी कि वे भविष्यवाणियों के लिए किसी व्यक्ति पर निर्भर होते थे और उस पर विश्वास भी करते थे। लेकिन उसके सही या गलत होने के बारे में सोचना जरूरी नहीं मानते थे।

जब बारिश नहीं होती थी तो किसी पंडित या पुजारी के कहने पर किसी प्रतिष्ठित मंदिर में शिव का दूध से अर्घ भरा जाता था। अगर इलाके में कोई साधु होता था, तो वह यज्ञ का आयोजन करने के लिए लोगों को कहता था। इस प्रक्रिया में कभी बारिश हो जाती थी और कभी नहीं। अगर हो जाती थी तो पूरा श्रेय बच्चों, शिव या साधु को चला जाता था, वरना यह कह कर संतोष कर लिया जाता था कि ‘दैव’ के आगे व्यक्ति सिर्फ कोशिश ही तो कर सकता है! पुराने जमाने में धर्म के नाम पर लोगों को कुआं खुदवाने, तालाब बनवाने और पेड़ लगवाने की सलाह दी जाती थी। अगर किसी की कोई मनोकामना पूरी हो जाती थी, तो अपनी-अपनी शक्ति के अनुसार लोग ये काम करते थे। कोई कुआं खुदवाता था, कोई मंदिर बनवाता था और जिसके पास धन नहीं है तो वह चौराहों और खाली सार्वजिनक जगहों पर पीपल, बरगद या पाकड़ आदि के पेड़ लगाता था। पेड़, कुआं और तालाब पानी से जुड़े हैं। कुओं और तालाबों में पानी लंबे समय तक सुरक्षित रहता है। यही नहीं तालाबों और बावड़ियों के भरे रहने से कुओं के पानी का स्तर भी बना रहता है। पेड़ भी अपनी ओर बादलों को आकर्षित करते हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश में एक त्योहार मनाया जाता है ‘पनढकउवा।’ इसका मतलब है पानी को ढक कर रखना, यानी पानी का संरक्षण।

लेकिन अब अंधविश्वासों के बूते कायम कई परंपराओं की तस्वीरें बदलने लगी हैं। आज गांवों में भी लोग किसी गुसार्इं की बातों के बजाय मौसम विभाग की सलाह पर भरोसा करने लगे हैं। भले ही मौसम विभाग की भविष्यवाणी भी कई बार गलत हो जाती है। यह वैज्ञानिक सोच के विकसित होने और उसके प्रसार का असर है। लोग अब मानने लगे हैं कि वर्षा के लिए कोई देवता जिम्मेदार नहीं है, बल्कि बादलों से वर्षा होती है। उसकी भी एक प्रक्रिया है। समुद्र, झील, तालाब और नदियों का पानी सूरज की गरमी से वाष्प बन कर ऊपर उठता है। इस वाष्प से बादल बनते हैं। ये बादल जब ठंडी हवा से टकराते हैं तो इनमें रहने वाले वाष्प के कण पानी की बूंद बन जाते हैं। ठीक वैसे ही, जैसे कमरे की हवा में रहने वाली वाष्प फ्रिज से निकाले गए ठंडे केन से टकरा कर पानी की बूंद बन जाती है। जाहिर है, विज्ञान और वैज्ञानिक सोच की बुनियाद पर ही सभ्यता और समाज का विकास ठोस आकार ले सकता है। इसलिए किसी भी समाज को अंधविश्वासों और धारणाओं के बजाय विज्ञान और तथ्यों पर भरोसा करना चाहिए।

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