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दुनिया मेरे आगे: साइकिल की सवारी

आज के समय में जब बच्चों के शौक में वीडियो गेम की दुनिया बचपन से ही उनके अंदर एक तेज रफ्तार मनोभावना को जन्म देती जा रही है तो साइकिल की फुरसत भरी चाल के लिए जगह का बने रह पाना नामुमकिन-सा होता जा रहा है।

Author April 16, 2018 3:22 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

दीना नाथ मौर्य

पिछले दिनों जब मैं अपने एक महानगरीय मित्र के साथ उनके बच्चे के लिए साइकिल खरीदने गया तो रंग-बिरंगी खिलौने जैसी तमाम साइकिलें वहां थीं, लेकिन वह नहीं थी जिससे हमने साइकिल की सवारी करना सीखा था। आज जब सड़क पर साइकिल के लिए जगह नहीं बची है तो बचपन की वह दुनिया हमें बरबस याद आती है। किसी देश का प्रधानमंत्री जब साइकिल की सवारी करता है तो यह बात खबर बन जाती है। यहां अस्सी रुपए लीटर पेट्रोल की कीमत चुकाने के बाद हमें साइकिल जरूर याद आती है। साइकिल चलाना संतुलन को साध लेना भर नहीं होता। साइकिल एक जरिया होती थी उन तमाम चीजों से जुड़ने की, जिन्हें समाज के पारंपरिक समुदायों ने अधिगम और शिक्षण के औपचारिक और अनौपचारिक तरीकों के रूप में विकसित किया था। साइकिल चलाना अपने श्रम के सहारे आगे बढ़ जाने का यथार्थ उदाहरण होता है। आज मशीनों के संसार में श्रम का सिकुड़ते जाना वाकई चिंताजनक है। पहली बार जब हमारे हाथ में साइकिल की मुठिया आई तो हमें गति के नियम का पता नहीं था और न ही संतुलन के किसी सिद्धांत की जानकारी थी। लेकिन दो पहियों के घूमने के साथ ही हम कहीं से कहीं जा सकते हैं, बचपन में यह हमारे लिए आश्चर्य का विषय जरूर होता था। उन दिनों हमारे इलाके में साइकिल के नाम में कोई उपसर्ग नहीं लगा था। वह सिर्फ साइकिल थी, मोटर साइकिल नहीं। हमारे आसपास के माहौल में साइकिल के साथ की पूरी दुनिया बसती थी, मगर हमें साइकिल चलाने की अनुमति न थी। हमारे हमउम्र साथी जब साइकिल चलाते समय हमारे सामने से गुजरते तो हम आंखें फाड़ कर उन्हें देखते और अपने नसीब को कोसते कि हम उनके घर क्यों न हुए जहां साइकिल के लिए कोई मनाही नहीं रहती। जब कोई रिश्तेदार हमारे यहां आता था तो हम उसकी साइकिल को बड़े ही सलीके से घर के अंदर ले जाते थे। इस काम में घर के सारे हमउम्र बच्चों की पूरी मंडली होती थी। इसमें हमारी बचपन की सामाजिकता निर्मित होती थी।

साइकिल की सवारी का किस्सा तो हमने बाद में पढ़ा, सवारी पहले की। पांचवीं तक की पढ़ाई मन लगा कर इसीलिए की गई थी कि छठी कक्षा में पढ़ने जाने के लिए साइकिल का साथ मिल सकेगा। छठी में पढ़ने के लिए जिस विद्यालय में हमारा दाखिला हुआ, वह घर से करीब तीन किलोमीटर की दूरी पर था। अब साइकिल के साथ ही हमें स्कूल जाना-आना था। तो अब सीखना जरूरी हो गया था, जिसके लिए हमने कम पापड़ न बेले। साइकिल चलाना जानने वाले हमारे साथी हमें सिखाने के नाम पर अपना ही हाथ साफ करते थे। इस दौरान सीखने के नाम पर हम दर्शक मात्र रह जाते थे। बाद में थोड़ी देर के लिए वे दोस्त हमें सीट पर बैठा कर खुद पीछे से पकड़े रहते और मुझे आगे देखते रहने के निर्देश के साथ साइकिल को जोर से धकेल देते और मैं गिर जाता था। फिर वे कहते आज इतना ही, आगे कल सीखेंगे। हमारे पास संतोष कर लेने के सिवा कोई और चारा न था।

इस दौरान हमने साइकिल के साथ लग गए अपने पैर की चोट और छोटे-छोटे घावों को भी घरवालों से छिपा के रखा। इस मशक्कत का परिणाम यह आया कि एक दिन हमने साइकिल के फ्रेम में पैर डाल कर दूसरी ओर के पैडल को घुमाना सीख लिया। इसे साइकिल को कैंची चलाना कहते थे। इस तरह चलाने में हमारे एक हाथ में साइकिल की मुठिया होती थी, दूसरे में फ्रेम होता था। कैंची चलने का वह मजा कभी न भूलने वाला है। साइकिल केवल मशीनी पुर्जा भर न थी, बल्कि एक चलती-फिरती जिंदगी थी। साइकिल की मुठिया के सहारे बचपन की वह दुनिया कई कौशल अपने आप अर्जित कर लेती थी, जिसे हम शिक्षा की भाषा में सीखना कहते हैं।

आज साइकिल जरूरत से ज्यादा शौक बन गई है और हमारे इस शौक को बाजार ने बखूबी भुनाया है। सड़क पर आज साइकिल का सीमित होता दायरा छतों, पार्कों और बालकनी तक सिमटता जा रहा है। कार में बैठ कर जिमखाने की दीवारों में बंद साइकिल चला कर पसीना बहाना और फिर कार से वापस घर आने वाला जीवन दरअसल मशीनी कैद की गवाही देता जान पड़ता है। पर्यावरण और सड़क सुरक्षा की चिंता भी इसी से जुड़ी हुई है। आज के समय में जब बच्चों के शौक में वीडियो गेम की दुनिया बचपन से ही उनके अंदर एक तेज रफ्तार मनोभावना को जन्म देती जा रही है तो साइकिल की फुरसत भरी चाल के लिए जगह का बने रह पाना नामुमकिन-सा होता जा रहा है। तेज रफ्तार मोटरगाड़ी की संस्कृति के सापेक्ष साइकिल को बचाना दरअसल उस पूरी संस्कृति को बचाना है, जिसमें मनुष्य की भागमभाग जिंदगी के बरक्स एक सहज जिंदगी बसती है।

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