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दुनिया मेरे आगे: अब कैसा सावन

मानसून का मौसम है। कहीं रिमझिम कहीं झमाझम। कोई खुश है तो किसी का जीना मुश्किल हो गया है। अभी झारखंड और कई राज्यों में औसत से कम बारिश हुई है तो दिल्ली सहित समूचे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में दो या तीन दिन की बरसात ने ही जल-थल एक कर दिया। ऐसे में सावन आ गया।

Author August 3, 2018 2:34 AM
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मानसून का मौसम है। कहीं रिमझिम कहीं झमाझम। कोई खुश है तो किसी का जीना मुश्किल हो गया है। अभी झारखंड और कई राज्यों में औसत से कम बारिश हुई है तो दिल्ली सहित समूचे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में दो या तीन दिन की बरसात ने ही जल-थल एक कर दिया। ऐसे में सावन आ गया। मगर क्या हम सावन की उमंग की हिलोरें अपने अंदर महसूस कर पाते हैं? दरअसल, आजकल लोगों के लिए बरसात आफत का मौसम हो चुका है। कम से कम अब अखबार और टेलीविजन पर खबरें देख कर तो यही लगता है। सब तरफ यही खबर है कि यह गली पानी में डूबी है तो इस मुहल्ले से लोग बाहर नहीं निकल पा रहे। घनघोर बरसात से सारा जीवन अस्त-व्यस्त हो गया है।

इधर हमारे यहां झारखंड में पिछले महीने से ही पानी बरस रहा है। खेती-किसानी के लिए भले पर्याप्त न हो, मगर आम लोगों के लिए मुसीबत की शुरुआत हो चुकी है। किसान खेतों में बिचड़े रोप रहे हैं और आसमान की ओर आस लगाए देख रहे हैं कि कुछ और बारिश हो तो इस बरस फसल अच्छी हो। मगर शहर के लोग बारिश नहीं चाहते और घनघोर बरसात से नगर निगम की पोल खुल जाने का भी खतरा रहता है। कुछ दिन पहले ही घुरती रथ मेला था और उसी मौके पर बारिश भी हो रही थी। एक मां अपने बच्चे को लेकर पैदल रास्ते से गुजर रही थी कि अचानक हल्की बारिश होने लगी। मां ने तुरंत छतरी निकाली और अपने तीन-चार साल के बच्चे को बरसाती कपड़े या रेनकोट पहनाने की कोशिश करने लगी। बच्चा नहीं पहनना चाह रहा था। उसने कहा- ‘मां छतरी में ही ले चलो न… मुझे रेनकोट पसंद नहीं।’ इस पर मां ने जोर से डपटा- ‘तुम्हें मेला घूमना है कि वापस घर चलें? भीगने की कोई जरूरत नहीं, बीमार पड़ जाओगे’। मायूस बच्चा रेनकोट पहनते हुए अंगुलियों के इशारे से भीगने देने की समय-सीमा मां को समझाता हुआ बोला- ‘मां, घर जाकर मुझे बस इतना-सा भीगने दे देना! पानी में भीगना बहुत अच्छा लगता है मुझे’।

जाने मां ने हां कहा या नहीं, मगर बच्चे की अंगुलियां थामे आगे बढ़ गई। उसे देखने के बाद मैं समझ सकती हूं कि लोग अब बरसात को आफत क्यों मानने लगे हैं। दरअसल, यह दृश्य एक बानगी है कि हम प्रकृति से दूर कैसे होते जा रहे हैं। क्या इस बच्चे को उसकी मां ने बारिश का आनंद लेने से रोक कर जीवन के एक सुंदर अनुभव से वंचित नहीं कर दिया? आजकल के बच्चे या बड़े इतने नाजुक क्यों हैं कि उन्हें भीगने से तुरंत ही जुकाम या बुखार हो जाता है। पहले तो ऐसा नहीं था। हमारा बचपन कागज की नाव बनाते, उसे झरझर बहते पानी में बहाते और उस नाव के डूब जाने तक उसके पीछे भागते-भागते बीतता था। उस दौर में बरसात का इंतजार होता था और कई बार तो स्कूलों में छुट्टियां भी कर दी जातीं। सभी बच्चे मिल कर बारिश का मजा लेते।

तब न हमारे माता-पिता रोकते थे भीगने से, न ही हम बीमार पड़ते थे। पहले के लोग कहते थे कि बच्चों को धूल-माटी में खेलने दिया करो, क्योंकि इससे शरीर मजबूत होता है। बारिश में भीगो और जाड़ा-गरमी सब मौसम का आनंद लो। यह सच भी था कि तब हम खूब भीगते थे, धूल-मिट्टी में खेलते थे, लेकिन उसकी वजह से बीमार नहीं पड़ते थे। अब तो बारिश भी पहले जैसी नहीं होती और जितनी देर होती है, उतनी देर हम जहां हैं, वहांं खुद को कैद कर लेते हैं। न खुद भीगते हैं और न ही बच्चों को भीगने देते हैं। ऐसे में हमारे भीतर न इम्यून सिस्टम यानी रोग प्रतिरोधक प्रणाली मजबूत हो पा रही है और न ही हम प्रकृति से जुड़ पा रहे। बारिश में बादलों का बदलता रंग, टिपटिप की आवाज, पत्तों में सिमटी बूंदों की खूबसूरती से अनजान नई पीढ़ी कितना कुछ गंवा दे रही है, शायद इसका अहसास अभी नहीं है सबको। मशीनों की सोहबत में मशीन हो रहा इंसान और इस तरह खुद अपने शरीर को इतना कमजोर कर ले रहा है कि बारिश की बूंदों से बताशे की तरह घुल जाने का डर लिए प्रकृति की इस नियामत को आफत समझने लगा है। यों एक सच यह भी है कि हमारे शहरीकरण ने बारिश का सौंदर्य रहने नहीं दिया। पक्की सड़क, सूखती झील और नदियां, सीमेंट के मकान बारिश के पानी को जमीन में समाने का अवसर नहीं देते। प्रकृति-चक्र वैसे ही गड़बड़ हो रहा है और हम मानव मन से, बचपन से मिलने वाला अद्भुत अनुभव भी छीन ले रहे हैं। इसलिए अब न लोगों को बारिश का सौंदर्य दिखता है, न ही किसी को ‘सावन को आने दो’ जैसे गीत गाने का मन करता है!

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