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दुनिया मेरे आगे: डर के आगे

असफलता का डर, लोगों के हंसने का डर, दूसरों की नजरों में बेहतर साबित न हो पाना आदि ऐसे आम डर हैं जिनसे हम सब रोज गुजरते हैं। हम जिस सामाजिक माहौल में पलते-बढ़ते हैं, उसमें हर वक्त हमें इस बात की आशंका रहती है कि कोई मेरे ऊपर हंस तो नहीं रहा है, कोई मेरी आलोचना तो नहीं कर रहा है, कोई मुझसे नाराज न हो जाए आदि।

प्रतीकात्मक तस्वीर।

हम सबके भीतर एक भय है। इस डर की वजह से ही शायद हम खुल कर अपनी जिंदगी नहीं जी पाते। हम दूसरों की इच्छाओं, शर्तों, चाहतों को जी रहे होते हैं। अगर हम डर के दर्शन में जाएं तो पाएंगे कि मनुष्य न केवल एक समाज का सदस्य है, बल्कि समाज में रहने के नाते दूसरों की अपेक्षाओं, लालसाओं, उम्मीदों को भी जीता है। उसे हमेशा यह डर रहता है कि कहीं कोई नाराज न हो जाए, कोई रूठ न जाए, रिश्तेदार आना-जाना न बंद कर दें। शायद यही वजह है जिसमें हमारी पूरी जिंदगी भय के साथ गुजर जाती है। हालांकि ऋग्वेद के एक मंत्र में कामना की गई है कि हमें अपने मित्र से भी भय न हो, हमें अपने अमित्र या शत्रु या परिचित से भी भय न हो, हम निर्भय हो सकें, कामना है कि पूरा विश्व मेरा मित्र हो। हालांकि यह कामना बहुत कठिन नहीं है। लेकिन व्यावहारिक दृष्टि से देखें तो यह संभव नहीं है, क्योंकि हर कोई हमारा मित्र नहीं हो सकता। सबकी अपनी अपनी सीमाएं हैं, अपने स्वार्थ हैं।

जहां स्वार्थों के बीच टकराहट होगी, वहां मित्रवत भाव बरकरार रखना जरा कठिन काम है। मनोविज्ञान, दर्शन शास्त्र आदि मित्रवत व्यवहार करने की वकालत करते हैं। यह अलग बात है कि हम सभी को खुश नहीं कर सकते। खासकर जब आप किसी प्रमुख और शीर्ष पद पर हों तो हर कोई आपसे खुश रहे, ऐसा संभव नहीं है। लेकिन कोशिश की जा सकती है। किसी संस्थान में शीर्ष पद पर बैठा कोई भी व्यक्ति अगर कंपनी के हित में कठोर कदम उठाता है तो इसमें निश्चित ही किसी न किसी की हानि होती है। लेकिन इस भय से कोई निर्णय टल पाता है? प्रबंधन क्षेत्र के जानकार मानते हैं कि व्यापक हित के लिए कठोर निर्णय भी लिए जाने चाहिए। दूसरी ओर, कहीं यह भी पढ़ा है कि अगर एक गांव के बर्बाद होने से एक शहर बचता है तो इसमें कोई हर्ज नहीं। प्रबंधन में भी इसी दर्शन और मनोविज्ञान का अध्ययन किया जाता है और इस पर अमल किया जाता है।

भय कई किस्म के होते हैं। मनोविज्ञान की दृष्टि से देखें तो इसे ‘फोबिया’ माना जाता है। मनोविज्ञान में कई किस्म के फोबिया का जिक्र आता है। पानी का डर, अंधेरे का डर, अनजान से डर, ऊंचाई से डर आदि। यह सूची लंबी हो सकती है। खासकर मनोविश्लेषण और मनोचिकित्सा शास्त्र में विभिन्न तरह के फोबिया या भय का इलाज किया जाता है। यानी इन भयों का अध्ययन किया जाता है, ताकि मनोरोगी को ठीक किया जा सके। जानकार मानते हैं कि हम न केवल व्यक्ति, वस्तु और परिस्थितियों से डरते हैं, बल्कि हमारा सबसे बड़ा डर दूसरों की नजर में असफल होना होता है। हम किसी भी कीमत पर नाकामी स्वीकार नहीं कर पाते। दूसरों की हंसी और दूसरों की नजर में श्रेष्ठ साबित होने की चाहत कई बार हमें गहरे भय और निराशा में धकेल देती है। यानी हमारे भय का एक सिरा दूसरों की नजरों में असफल और नाकारा न होने की छवि से बचने से जुड़ा है। जबकि हमें अपनी जिंदगी अपनी शर्तों पर जीना आना चाहिए, न कि दूसरों की इच्छाओं को हम ढोते रहें।

असफलता का डर, लोगों के हंसने का डर, दूसरों की नजरों में बेहतर साबित न हो पाना आदि ऐसे आम डर हैं जिनसे हम सब रोज गुजरते हैं। हम जिस सामाजिक माहौल में पलते-बढ़ते हैं, उसमें हर वक्त हमें इस बात की आशंका रहती है कि कोई मेरे ऊपर हंस तो नहीं रहा है, कोई मेरी आलोचना तो नहीं कर रहा है, कोई मुझसे नाराज न हो जाए आदि। इस तरह की चिंताएं हमें डर की ओर धकेलती हैं। दसवीं और बारहवीं के परीक्षा परिणाम के बाद बच्चे जब आत्महत्या करते हैं तो इसकी जड़ में यही सबसे बड़ी वजह है कि लोग, दोस्त क्या कहेंगे… मुझसे मम्मी-पापा की उम्मीदें बहुत थीं… मुझसे यह भी नहीं हो सका आदि मनोवृत्तियां व्यक्ति को डर की गिरफ्त में ले जाती हैं।जबकि इस बात पर मंथन करने की आवश्यकता है कि क्या आप उन लोगों के लिए पढ़ रहे थे? क्या आप उनके लिए जीवन के लक्ष्य तय कर रहे थे? क्या एक बेहतर इंसान उनके लिए बन रहे थे या आपको एक सफल व्यक्ति बनना था? सच यह है कि आपको जीवन में अपनी शर्तों पर जीना ही था, इसलिए जी रहे हैं। कोई भी व्यक्ति जिंदगी में नाकाम नहीं होना चाहता। लेकिन सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि हम अपनी सफलता के लिए किस शिद्दत से काम कर रहे हैं। कितने योजनाबद्ध तरीके से उस पर अमल कर रहे हैं। असफल होने के डर से बचने के लिए हमें अतिरिक्त मेहनत करनी होती है। तब यह डर भी खत्म होता है।

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