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दुनिया मेरे आगे: एक समांतर दुनिया

कोई भी राजनीतिक दल कभी इंसानों के साथ नहीं होते हैं। अगर वे कभी खड़े दिखते हैं तो उनके दलगत स्वार्थ उसके पीछे की मंशा होती है। उनकी भाषा, दावे की शक्ल में जुमले, मौका ताड़ कर निकाले गए आंसू, उनके वादे... ये सब आखिर झूठ होते हैं।

Author May 2, 2018 4:26 AM
यह सोचना होगा कि जन्म सबका धरती पर हुआ है इस धरती को खूबसूरत बनाने और पहले से खूबसूरत धरती के सौंदर्य को जीने के लिए।(फोटो सोर्स- सोशल मीडिया)

प्रतिभा कटियार

सोचा था कुछ ख्वाब बुनूंगी, पालूंगी और पोसूंगी उन ख्वाबों को। उनकी नन्ही अंगुली थाम कर धीरे-धीरे हकीकत की धरती पर उतार लाऊंगी। फिर वे सारे ख्वाब पूरी धरती पर सच बन कर दौड़ने लगेंगे। नफरत का शोर थमेगा एक दिन कि लोग थक जाएंगे एक दूसरे से नफरत करते-करते। बिना जाति या धर्म देखे किसी के भी कंधे पर सिर टिका कर सुस्ताने लगेंगे… राहत के पल चुनने लगेंगे। सोचा था एक रोज जिंदगी आजाद होगी सबकी… किसी भी तरह के भय से और आजादी के मायने नहीं कैद रहेंगे सिर्फ कागज के नक्शे पर दर्ज कुछ लकीरों में। सोचा था कि कविताओं से मिट जाएगा सारा अंधेरा एक दिन और धरती गुनगुनाने लगेगी प्रेम के गीत। नहीं जानती थी कि यह कोई यूटोपिया है! नहीं जानती थी कि ये ख्वाब देखने वालों की आंखें ही खतरे में पड़ जाएंगी एक रोज। नहीं जानती थी कि जिंदगी को सरल और प्रेम भरा बनाने का ख्वाब इतना जटिल हो जाएगा और उसे नफरत से इस कदर कुचल दिया जाएगा कि जिंदगी के लिए जगह की तलाश मुश्किल हो जाएगी!

हमारे सामने जो समाज है, आसपास से उठता धुआं है, यह जो मानव गंध है, हथियारों की आवाजें हैं, मासूमों की लगातार तड़पती कराह है, जुर्म हैं, जुर्म को छिपा जाने और दबा देने के तमाम इंतजाम हैं, वे सब किसने बनाए हैं आखिर? इन सबकी कमान कुछ खास हाथों में है। लेकिन क्या हम सब इसमें शामिल नहीं हैं? हालात के प्रति निर्विकार होना भी हालात में शामिल होना ही है। अपने प्रति हो रहे जुर्मों को न समझ पाना भी एक समय के बाद केवल अज्ञानता नहीं, मूर्खता बन जाती है। राजनीति से परे कुछ भी नहीं। मौन भी राजनीति है और बोलना भी। किस वक्त मौन साध लेना है और किस वक्त चीखना है, यह सुविधा से चुना जाता है। यह सब राजनीति है और हम सबके लिए इस राजनीति को समझना जरूरी है। हर किसी को। कोई भी राजनीतिक दल कभी इंसानों के साथ नहीं होते हैं। अगर वे कभी खड़े दिखते हैं तो उनके दलगत स्वार्थ उसके पीछे की मंशा होती है। उनकी भाषा, दावे की शक्ल में जुमले, मौका ताड़ कर निकाले गए आंसू, उनके वादे… ये सब आखिर झूठ होते हैं। उन पर भरोसा करने और उनका इंतजार किए बिना हमें खुद खड़ा होना होगा एक दूसरे के साथ मजबूती से। न्याय और वास्तविक आजादी के लिए हमें एकजुट होना होगा। अब हमें देश के भीतर अपने आसपास के और कई बार तो अपने ही भीतर के दुश्मन को पहचानना होगा। हमारे सामने जो हालात हैं, उसमें अब नहीं तो आखिर कब?

यह केवल हमारे लिए नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों, हमारे बच्चों के लिए जरूरी है। न सिर्फ उनके आज के लिए, उनके आने वाले कल के लिए। क्या हम सचमुच नहीं सोच पाते कि कैसा आज दिया है हमने अपने बच्चों को और कैसा भविष्य रख रहे हैं हम उनकी हथेलियों में? क्यों हमारी आंखों में ठूंस दिए गए दृश्य ही हमारे संपूर्ण सत्य बन जाते हैं और हम उन जबरन दिखाए दृश्यों पर सोचते और समझते तो नहीं हैं, लेकिन उनके आधार पर खून-खराबे पर जरूर उतर आते हैं। इससे ज्यादा दुखद क्या होगा कि हमने दर्द का बंटवारा कर लिया है! एक धर्म के लिए जिस बात को दर्द मान लिया जाता है, उसके लिए दूसरे धर्म की जिम्मेदारी भी तय कर दी जाती है और फिर उस दूसरे धर्म के दर्द से बदला लेने का अभियान चला दिया जाता है। हमारे तमाम घंटा-घड़ियाल बजाने के बावजूद ईश्वर सो रहा है। या फिर वह खामोश है… सब देख रहा है चुपचाप! हालांकि पूजा के समांतर अजान की आवाज गूंजती है वक्त की पाबंदी के साथ!
अब यह एहसास गहराने लगा है कि मुझे यह दुनिया नहीं चाहिए। मैं अपने बच्चों को डर के साए में घर से विदा नहीं करना चाहती। मैं नहीं चाहती कि मेरा बच्चा किसी भी तरह की और किसी से भी नफरत के करीब से भी गुजरे।

इंसान ही नहीं, पशु-पक्षी और प्रकृति से भी उसे हो वैसा ही लगाव जैसा मुझे है उससे। क्या यह असंभव है? क्या हम सब ऐसा नहीं चाहते? इसके लिए कोई कानून नहीं आएगा। इसके लिए हमें अपने भीतर उतरना पड़ेगा। जबरन हमारे भीतर जो बंटवारे, ऊंच-नीच, धर्म-जाति और स्त्री-पुरुष की खाइयां बना दी गई हैं हमारे जन्म के साथ ही, उसे पहले समझना होगा। उसे पाटना होगा। यह सोचना होगा कि जन्म सबका धरती पर हुआ है इस धरती को खूबसूरत बनाने और पहले से खूबसूरत धरती के सौंदर्य को जीने के लिए। शुरुआत हमें ही करनी होगी खुद से। आइए, खुद से बात करना शुरू करें, बिना किसी पूर्वग्रह के।

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