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दुनिया मेरे आगे : उदासी का दायरा

हमारे सरकारी स्कूल पहले से ही शिक्षकों की कमी से जूझ रहे हैं। उसकी कुछ हद तक भरपाई अतिथि और संविदा आधारित अस्थायी शिक्षकों द्वारा की जाती है। बदले में इन्हें मिलता है समान काम के बदले कम वेतन, दोयम दर्जे का व्यवहार, अल्प सुविधाएं, नौकरी की असुरक्षा और उदासी।

Author May 25, 2018 3:26 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

आलोक कुमार मिश्रा

हाल ही में निरीक्षण के लिए एक स्कूल में पहुंचा तो देखा कि लगभग दस शिक्षिकाएं स्कूल के मुख्य दरवाजे से निकलते हुए ऐसे ठहर गर्इं और स्कूल को निहारने लगीं, मानो विदाई का अंतिम अभिवादन दे रही हों। उनके मायूस चेहरों को देख कर मैंने पूछ लिया कि छुट्टी होने से इतनी देर पहले स्कूल से बाहर वे कहां जा रही हैं! उनमें से एक ने रुंधे गले से कहा- ‘हम तो हमेशा के लिए यहां से बाहर जा रहे हैं सर।’ मैंने वजह पूछी तो दूसरी शिक्षिका ने बताया कि यह पीएफसी का खेल है। मैं समझ चुका था। दरअसल, हर साल अप्रैल-मई में प्रशासनिक इकाई पोस्ट फिक्सेशन सेल (पीएफसी) द्वारा पिछले सत्र में रहे विद्यार्थियों की संख्या के आधार पर स्कूल में शिक्षक के पदों की संख्या तय की जाती है। मैंने शिक्षकों को पीएफसी के फरमान से उत्पन्न परिस्थिति पर चिंतित होते हुए पाया। आज सरकारी स्कूलों की खराब दशा और छवि के सामने निजी स्कूलों की चकाचौंध के कारण अधिकतर अभिभावक अपने बच्चों को निजी स्कूलों में भेज रहे हैं। सरकारी स्कूलों में शिक्षकों के खाली पदों पर पूरी नियुक्ति तो कभी नहीं हो पाई, लेकिन कटौती चल रही है। पीएफसी द्वारा अधिकतर सरकारी स्कूलों में की जाने वाली पद कटौती अस्थायी अतिथि शिक्षकों के लिए शोक ही लेकर आती है। जहां स्थायी शिक्षकों को इससे ‘सरप्लस’ यानी अतिरिक्त होकर स्थानांतरित होने का भय होता है, वहीं अतिथि शिक्षकों को तत्काल प्रभाव से कार्यमुक्त कर दिया जाता है और वे बेरोजगार की श्रेणी में आ जाते हैं और नई रिक्तियों के इंतजार करते हैं।
दिल्ली सरकार द्वारा स्कूली शिक्षा में सुधार के लिए एक ‘मेंटरशिप प्रोग्राम’ चल रहा है।

हरेक मेंटर शिक्षक कक्षा अवलोकन, शिक्षकों से शिक्षण शास्त्रीय बातचीत, चर्चा और फीडबैक, समय-समय पर प्रशिक्षण देने जैसे काम करने होते हैं। इस दौरान मेरी नजर गणित की एक शिक्षिका पर गई। बच्चों के साथ उनके संवाद, स्नेह और जुड़ाव मुझे कुछ विशेष लगे। एक बार गणित की कक्षा में आकृति की संकल्पना समझाते हुए उन्होंने अपने बैग से पांच बिस्कुट के पैकेट निकाले और बच्चों में एक-एक बिस्कुट बांट दिया। इनमें से कुछ आयत तो कुछ वर्ग आकृति में थे। बात पूरी होने तक उन्होंने बिस्कुट नहीं खाने की हिदायत दी। बच्चों के चेहरे पर बढ़ती जिज्ञासा को आसानी से पढ़ा जा सकता था। यों जिज्ञासा पैदा कर देना किसी भी शिक्षक के लिए महत्त्वपूर्ण उपलब्धि होती है। फिर उन्होंने प्रभावशाली ढंग से बिस्कुटों की इन दो आकृतियों के आधार पर वर्ग और आयत की संकल्पना को अनुभवजन्य तरीके से स्पष्ट किया। कक्षा के बाद जब मैंने उनसे कहा कि इस तरह तो आपका ज्यादा खर्च हो जाता होगा तो उन्होंने झट जवाब दिया- ‘इतना तो चलता है। इससे बच्चों की रुचि बढ़ती है और मुझे भी अच्छा लगता है।’ मैं शर्मिंदा हुआ। मैंने कभी भी खुद को या अच्छा वेतन पाने वाले किसी अन्य स्थायी शिक्षक को बच्चों के प्रति इतना समर्पित नहीं देखा था। यों मैंने कक्षाओं के अवलोकन में बहुत से अतिथि शिक्षकों को भरपूर मेहनती, विषय के ज्ञाता, सक्रिय और शैक्षिक दक्षताओं से सराबोर पाया है।

हमारे सरकारी स्कूल पहले से ही शिक्षकों की कमी से जूझ रहे हैं। उसकी कुछ हद तक भरपाई अतिथि और संविदा आधारित अस्थायी शिक्षकों द्वारा की जाती है। बदले में इन्हें मिलता है समान काम के बदले कम वेतन, दोयम दर्जे का व्यवहार, अल्प सुविधाएं, नौकरी की असुरक्षा और उदासी। सरकारी उदासीनता स्थायी भर्ती प्रक्रिया को शुरू करने और अंजाम तक पहुंचाने में वर्षों लगाती है। हजारों युवा इंतजार में ही अधिकतम उम्र सीमा लांघ जाते हैं। लगता है कि शासन-प्रशासन खुद ही सरकारी शिक्षा व्यवस्था को पंगु बना कर शिक्षा के निजीकरण को बढ़ावा देने में लगा हुआ है। मेरे मन में और भी कई सवाल उठने शुरू हुए हैं। कार्य क्षेत्र में सुविधा, सुरक्षा, सुगमता और बिना उपयुक्त कारण के निकाले जाने के भय से मुक्ति के लिए अधिकारों के रूप में जो उपलब्धियां उन्नीसवीं-बीसवीं सदी के लंबे संघर्ष के बाद अर्जित की गई थीं, वे कमजोर क्यों की जा रही हैं? समान कार्य के लिए समान वेतन जैसे लोकतांत्रिक और संवैधानिक अधिकार आज टूट कर बिखर क्यों रहे हैं? मार्क्सवाद और समाजवाद की जन चेतना से उपजी हमारी विरासत कहां गायब हो गई है? अब हम इन मुद्दों पर उद्वेलित और संगठित क्यों नहीं होते? फेसबुक और वाट्सऐप पर हमारे युवाओं की सेनाएं धर्म, जाति की जकड़न और नेता भक्ति से ऊपर उठ कर इन जरूरी मुद्दों पर चर्चा और संवाद क्यों नहीं करतीं? समाजवादी, लोकतांत्रिक, कल्याणकारी मूल्यों पर आधारित समाजों और सरकारों ने जिन मानवाधिकारों और मानवीय जीवन के आदर्शों को संविधान और व्यवस्था संरचना में स्थान दिया था, वही आज नव-पूंजीवादी दबाव में इन्हें दफन करने में क्यों लगे हैं? क्या उन शिक्षिकाओं की उदासी, मायूसी और रोजगार की असुरक्षा हमें कोई रास्ता दिखा सकती है? अन्य क्षेत्रों सहित स्कूली सुधारों में जब तक इन्हें दूर करने का प्रबंध नहीं किया जाता, तब तक शायद इसका भुगतान हमारी आने वाली पीढ़ियों को भी करना पड़े। आखिर उदासी और असुरक्षा का अपना दायरा तो होता ही है। एक उदास शिक्षक खुशहाल बचपन का सृजन कैसे और क्यों करेगा? आज बड़े फलक पर इन प्रश्नों का उत्तर ढूंढ़ने की जरूरत है।

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