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दुनिया मेरे आगे: विकृतियों के ठिकाने

लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आजादी का हवाला देकर कुछ ऐसी बातों को भी न्यायसंगत ठहराया जा रहा है जो तार्किक दृष्टि से नहीं, संवेदना के स्तर पर देखी जानी चाहिए। कुछ सकारात्मक प्रयोग परिवार और समाज दोनों स्तरों पर होने चाहिए। लेकिन सकारात्मक खबरें अब शायद ही कहीं पढ़ने को मिलती हैं।

Author May 11, 2018 4:32 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

आज क्या यह संभव रह गया है कि स्कूलों में विद्यार्थी रोजाना की मुख्य खबरों पर चर्चा करें? बल्कि आज कहीं भी संवेदनशील लोग बिना आहत हुए क्या इन खबरों को पढ़ सकते हैं? हर रोज सामना नाबालिग बच्चियों से सामूहिक बलात्कार। कभी कठुआ, कभी उन्नाव, कहीं गली-मुहल्ले में बच्चियों से तो कभी विदेशी पर्यटकों के साथ वहशीपने और इंसानियत को शर्मसार कर देने वाली घटनाओं की खबरें। ‘निर्भया’ से हुई बर्बरता के बाद देश भर में उसका विरोध हुआ, आंदोलन हुए, मोमबत्ती जुलूस निकले, प्रार्थना सभाएं हुर्इं। लगता था, समूचा देश और समाज इस घिनौने कृत्य के विरुद्ध खड़ा है। बच्चियां अब सुरक्षित होंगी! पर क्या हुआ? आज भी बलात्कार की घटना मुख्य खबरों में शुमार होती है। देश में कानून है। पर क्या कानून से बलात्कार के खिलाफ जंग जीती जा सकती है? कानून की लड़ाई दरअसल जिंदगी भर की कमाई और उम्र को गंवाना होता है। इतने सालों बाद भी निर्भया कांड के आरोपियों का क्या हुआ? पास्को कानून क्या करेगा? पीड़ितों को मुआवजे से उनके दर्द की क्या-क्या भरपाई हो सकेगी? जिन राजनीतिकों को इस समस्या से छुटकारे के लिए समाज को दिशा देनी थी, कई बार वे खुद भी इस अपराध के कठघरे में खड़े दिखते हैं। छोटी-छोटी बच्चियों को बंधक बना कर उनके साथ कई दिनों तक सामूहिक बलात्कार, फिर उसकी जघन्य हत्या। समर्थ लोग बचने के रास्ते भी निकाल लेते हैं और इस दलील के साथ खड़े हो जाते हैं कि उन्हें फंसाया जा रहा है। पीड़ित लड़की, उसके परिवार को धमकी देकर चुप करा देते हैं और बिना किसी संकोच के सार्वजनिक मंचों पर खड़े होते हैं।
हम भारत के लोग धर्म में आस्था रखते हैं। स्त्री को ‘देवी’ मान कर पूजा करते हैं। लेकिन आश्चर्य है कि कुछ धार्मिक स्थान भी इस अपराध के लिए इस्तेमाल होते हैं। हम ईश्वर में आस्था रखते हैं, कर्म और उसके फल में विश्वास करते हैं और पुनर्जन्म की धारणा को भी मानते हैं। लेकिन किसी बच्ची के खिलाफ अपराध करते हुए हमारी ये धारणाएं कहां चली जाती हैं? हम ईश्वर के भय से मुक्त कैसे हो जाते हैं?

किसी स्कूल से खबर आती है कि वहां आठवीं कक्षा का बच्चा एक छह-सात साल की बच्ची से बलात्कार करता है। खबर आती है, लोग पढ़ते-सुनते रहते हैं। फिर थोड़े दिनों बाद उसी तरह की खबर आ जाती है। इसके पीछे क्या कारण हैं, इस पर विचार नहीं होता। विचार होता भी है तो घटना पर, उसकी प्रवृत्ति पर नहीं। जो कुछ भी यह सब हो रहा है, वह मानवीय नहीं है। यह मानसिक विकृति है। ‘मोबाइल मेरी मुट्ठी में’ जहां है, वहां सबको सब कुछ की छूट देता है। इंटरनेट पर कामोत्तेजक विकृतियों के वीडियो कोई भी देख सकता है। एक अफसोसनाक ‘डिजिटल दुनिया’ का विकास हो रहा है। साथ ही सामाजिक, स्वाभाविक, विकृतियां बढ़ रही हैं। बच्चे घरों में अकेले हैं। मां-बाप के साथ कम हैं। मां-बाप उन्हें सुख-सुविधाएं देते हैं, उनकी छोटी-बड़ी हर जरूरत का ध्यान रखते हैं और सोचते हैं कि सब ठीक हो गया। बच्चे आभासी दुनिया में जी रहे हैं। उनका अपने बराबर के बच्चों के साथ संपर्क छूट गया है। एकल परिवारों में मां-बाप व्यस्त हैं। कोई दूसरा रिश्तेदार चाचा, मामा, बुआ की पीढ़ी अब नहीं रही। घरों में भी अब ‘एक बच्चे’ का चलन है। इसलिए इस पीढ़ी के बच्चे निराधार, अकेले और असहाय हैं।
एक सर्वेक्षण के मुताबिक आजकल साठ फीसद बच्चे अवसाद से गुजर रहे हैं या ‘एंक्जाइटी’ की चपेट में हैं। वे अपना कैथार्सिस यानी विरेचन सोशल मीडिया में पाते हैं। वहां कोई रोक नहीं। समय से पहले का वीभत्स और विकृत कामोद्दीपन उन्हें विकृत स्थितियों में ले जाता है। यह विकृति का नियम सब जगह एक-सा लागू होता है। इसलिए जिन्हें नेता कहा जाता है, वे कहीं विधानसभा में भी अश्लील वीडियो देखते पकड़े जा सकते हैं। इस समय एक नया डिजिटल, आभासी, आतंकी, अकेलेपन का और विकृत समाज बन रहा है।

लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आजादी का हवाला देकर कुछ ऐसी बातों को भी न्यायसंगत ठहराया जा रहा है जो तार्किक दृष्टि से नहीं, संवेदना के स्तर पर देखी जानी चाहिए। कुछ सकारात्मक प्रयोग परिवार और समाज दोनों स्तरों पर होने चाहिए। लेकिन सकारात्मक खबरें अब शायद ही कहीं पढ़ने को मिलती हैं। कोई विकलांग लड़की हिमालय की चोटी पर पहुंची, कोई आठवीं पास व्यक्ति एक कंपनी के शीर्ष पद पर पहुंचा, एक मजदूर मां ने अपने बच्चे को इंजीनियर-डॉक्टर बना दिया…! ऐसी खबरें कभी कहीं दिख जाती हैं तो उन्हें पढ़ कर हृदय में उत्साह जगता है। कुछ करने की प्रेरणा पुख्ता होती है कि कोई चाहे तो कुछ भी कर सकता है। इसलिए जरूरी है कि समाज के दूसरे सकारात्मक पक्षों को भी सामने लाया जाए। अन्यथा बचे हुए संवेदनशील लोगों का अच्छाई पर से विश्वास उठ जाएगा। बलात्कार के खिलाफ एक सामाजिक अभियान शुरू हो। इस अपराध की सजा के साथ दोषियों का बहिष्कार जरूरी है।

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