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दुनिया मेरे आगे: उम्र से पहले

यह समस्या वास्तव में परेशान करने वाली है। ये छोटे बच्चे अपनी उम्र से भी तेज नई कक्षा में भेज दिए जाएंगे और भेजे भी जा रहे हैं। पर क्या वे वास्तव में इस लायक होंगे कि अपनी समझ से आगे की चीजों को पढ़ कर अपनी एक समझ बना सकें?

Author Updated: August 19, 2019 5:25 AM
बच्चों की प्रतीकात्मक तस्वीर

राय बहादुर सिंह

सोचना कभी-कभी बहुत ज्यादा उबाऊ काम लगता है, मगर खुद को व्यस्त रखने का यह उत्तम तरीका है। खाली बैठे-बैठे कुछ और न सही, पर कुछ सोचते रहने में आखिर बुरा क्या है? पिछले कई महीने से रोज कुछ न कुछ सोचने बैठता हूं, पर पिछले विषय के निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले ही एक नए विषय पर सोचना शुरू कर देता हूं। दूसरों का तो पता नहीं, पर मैं खुद को अत्यधिक चिंताग्रस्त मानसिकता का व्यक्ति समझने लगा हूं, जिसके दिमाग में ‘न्यूरॉन्स’ के आपसी घर्षण से दावानल जल उठा है। जलते ‘न्यूरॉन्स’ का ताप इतना ज्यादा है कि सिर फटने लगता है। आंखों को हर वक्त घेरे पानी की परतों के कारण विकल्प धुंधलाने लगे हैं। यह बेहद अजीबो-गरीब स्थिति है, जो पहले तो व्यक्ति को व्याकुल करती है, फिर धीरे-धीरे आदि बना देती है। आंखों के सामने रोज कुछ गलत होता तो दिखता है, पर उसमें नए जैसा कुछ भी महसूस नहीं होता।

बीते कुछ महीनों के दौरान नजरअंदाज करने के कौशल का खूब विकास हुआ है। जिन समस्याओं को सुलझाने की क्षमता मुझमें है, वे तुरंत नजर आ जाती हैं, पर ज्यादातर दिखने के बावजूद दिखाई नहीं देती। शुरुआत में कोफ्त होती थी तो कुछ न कुछ बकबक कर यानी बेमानी बोल कर काम चला लेता था, लेकिन रोज एक ही तरह का काम व्यक्ति को उबाऊ बना देता है, जैसे मैं होने लगा हूं। हालांकि हाल की एक घटना बहुत से सवालों को लिए हुए है, जिनमें इतना ताजापन और तीखापन है कि फिर से कुछ दिन सीखने और सोचते रहने का मसाला हाथ लग गया है। इस घटना के संदर्भ में अगर मैं किसी से कहूं कि पांच से सात साल का बच्चा कौन-सी कक्षा का विद्यार्थी होगा, तो कोई भी सामान्य व्यक्ति यही जवाब देगा कि पहली या दूसरी कक्षा के। इस तर्क को सार्वभौमिक रूप से स्वीकार करने में किसी को कोई दिक्कत नहीं होगी, पर मुझे जरूर समस्या आएगी।

दरअसल, तेजी से युवा होते भारत में हमारे लोगों को बच्चों को अच्छा और सच्चा नागरिक बनाने की इतनी जल्दी है कि अभी ठीक से बोल भी पाने वाले बच्चों का दाखिला उसकी उम्र से ज्यादा बड़ी कक्षाओं में करा दिया गया है। जो बच्चे अभी आंगनबाड़ी जाने योग्य भी नहीं है, उनका नामांकन स्कूल की उन कक्षाओं में कर दिया गया, जिनमें उन्हें पहुंचने में अभी समय लगता। स्कूल की एक शिक्षिका ने कारण बताया कि पुराने शिक्षक साथियों ने स्कूल में घटते नामांकन को बढ़ाने के लिए गांव के उन बच्चों का दाखिला स्कूल में कर दिया जो अभी गोद में ही थे और उनके नाम का मिड डे मील यानी दोपहर का भोजन उठाया जाने लगा। जब तक उन्होंने चलना शुरू किया और स्कूल में दाखिले के लिए आए तो उन्हें उन कक्षाओं में बैठाया जाने लगा, जिनमें उनका छोटी उम्र में ही दाखिला कर दिया गया था।

चूंकि कागज यानी दस्तावेज ही सब कुछ बोलते हैं, इसलिए हमें किसी साक्ष्य की आवश्यकता कहां कि कोई इस बात की जांच भी करे। सवाल है कि इन सबके पीछे का कारण क्या है। जानने की कोशिश की तो पता चला कि इसके पीछे शिक्षा का अधिकार कानून है, जिसके मुताबिक तीस विद्यार्थियों पर एक शिक्षक और तीस से अधिक पर दो शिक्षक प्रति स्कूल नियुक्त किए जाने हैं। अगर स्कूल में बच्चों का नामांकन कम होता है तो उसके अनुसार शिक्षकों की भी नियुक्ति होगी। मोटे तौर पर तीस से साठ के बीच विद्यार्थियों की संख्या रही तो दो शिक्षक स्कूल में उपलब्ध करवाए जाएंगे। इससे ज्यादा हुई तो तीन शिक्षक नियुक्त किए जाएंगे। लेकिन स्कूल से बच्चों की संख्या कम होने लगी तो शिक्षकों का तबादला कर दिया जाएगा। इससे बचने के लिए उन बच्चों को भी उम्र से बहुत पहले स्कूल में दाखिला दे दिया गया, जो अभी गोद में ही थे। ऐसे स्कूल में बच्चे क्या सीख रहे होंगे? कक्षा एक से पांच तक के बच्चों में किस तरह का अंतर होगा? क्या ऐसी स्थिति में हम यह उम्मीद कर सकते हैं कि हमारे सरकारी स्कूल बच्चों को गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा दे सकते हैं। कहा जाता है कि स्कूल का काम बच्चों को केवल लिखना-पढ़ना सिखाना नहीं, बल्कि मूल्यों के साथ-साथ उसका सर्वांगीण विकास करना भी है। यह प्रश्न पूछा जाना चाहिए कि क्या ऐसे ही किया जाएगा बच्चों का सर्वांगीण विकास?

यह समस्या वास्तव में परेशान करने वाली है। ये छोटे बच्चे अपनी उम्र से भी तेज नई कक्षा में भेज दिए जाएंगे और भेजे भी जा रहे हैं। पर क्या वे वास्तव में इस लायक होंगे कि अपनी समझ से आगे की चीजों को पढ़ कर अपनी एक समझ बना सकें? या उनके लिए यह ज्यादा आसान होगा कि वे अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ कर घर के अन्य कार्योे में लग जाएं? हमारी ऐसी ही लापरवाही के कारण सरकारी शिक्षा-व्यवस्था अपाहिज होती जा रही है। बच्चे खूब पढ़ रहे हैं और आगे बढ़ रहे हैं पर केवल कागजों में..!

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