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दुनिया मेरे आगे : मदद की भावना

हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में किसी छोटे या बड़े काम में किसी की मदद बहुत अहमियत रखती है। कई बार हम मदद पाकर खुश होते हैं तो कई दफा किसी की मदद करने भर से हमें खुशी मिलती है। असल में यह किसी न किसी तरह खुशियां बटोरने का साधन है।

Author May 26, 2018 3:44 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

अम्ब्रेश रंजन कुमार

हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में किसी छोटे या बड़े काम में किसी की मदद बहुत अहमियत रखती है। कई बार हम मदद पाकर खुश होते हैं तो कई दफा किसी की मदद करने भर से हमें खुशी मिलती है। असल में यह किसी न किसी तरह खुशियां बटोरने का साधन है। मदद की खूबसूरती यह है कि इसका कोई दायरा नहीं है, कोई सीमा नहीं है, न ही इसके लिए कोई समय या जगह तय है। हम घर में किसी की मदद करते हैं, आसपास रह रहे लोगों की मदद करते हैं, कार्यस्थल पर मदद करते हैं, राह चलते या किसी सफर में जरूरत पड़ने पर किसी की मदद करते हैं। कई बार हम इसे अचानक और अनायास ही कर जाते हैं। पिछले दिनों देहरादून से मुंबई लौटने के क्रम में मैंने दिल्ली से एक स्पेशल ट्रेन की टिकट ली थी। ट्रेन के खुलने का समय तीन बजे दोपहर था, लेकिन आजकल उनका समय पर चलना एक अजूबा ही माना जा रहा है। मेरी ट्रेन भी करीब डेढ़ घंटे विलंब से आई। स्टेशन पर इतनी देर तक इंतजार के बाद ट्रेन आ जाए तो राहत मिलती है। जबकि यह यात्रियों का अधिकार होना चाहिए कि वह वक्त से चले और वक्त पर अपने गंतव्य पर पहुंचे। बहरहाल, हमारे सामने की सीट पर कुछ यात्री थे जो वडोदरा जा रहे थे। कुछ देर बाद उन्होंने नाश्ते के लिए कुछ खाने-पीने की चीजें निकालीं। फिर पहले सहयात्रियों के बीच प्रसाद बांटा। रेलवे की ये घोषणाएं कान में गूंजने लगीं कि ‘अनजान लोगों का दिया कुछ भी न खाएं।’ हमारे समाज में अविश्वास की रफ्तार बहुत तेज हो चुकी है। दूसरे दिन ट्रेन अपनी गति के हिसाब से और ज्यादा देरी से मुंबई पहुंची। वहां से अपने आवास पर पहुंचने के लिए मुझे दूसरी लोकल ट्रेन लेनी थी। लेकिन वहां टिकट काउंटर पर काफी भीड़ थी। वहां एक महिला यात्री ने एक अन्य पुरुष यात्री से टिकट लेने में मदद मांगी। उसने किसी वजह से मना कर दिया। मैंने अपनी ओर से आॅटोमेटिक टिकट वेंडिंग मशीन से टिकट लेने में मदद का प्रस्ताव दिया, लेकिन मेरा कार्ड काम नहीं करने की वजह से नहीं हो सका। फिर वह महिला खुद दूसरी लाइन में लग गई। मुझे भी उस लाइन में काफी पीछे खड़ा होना पड़ा। इस बीच उस महिला यात्री ने मुझे बुलाया और कहा कि मैं आपका टिकट ले लेती हूं।

मेरी टिकट लेने के बाद वह महिला और मैं अपने-अपने रास्ते निकल पड़े। बात बहुत छोटी-सी थी कि मैंने उस महिला की मदद करने की कोशिश की और उसने मेरी मदद की। लेकिन एक सामान्य मानवीय संवेदना से लैस समाज की यह खूबसूरती हो जाती है कि दो अनजान लोग एक दूसरे की मदद करने में खुशी महसूस करें। लेकिन जब चारों तरफ संवेदनाओं का अकाल दिखता हो तो ऐसे में इस तरह के वाकये बेहद अहम लगने लगते हैं और लंबे समय तक याद रहते हैं। महानगरों की जीवनशैली के बारे में यह कहा जाता है कि यहां किसी के पास दूसरे के लिए समय नहीं होता। सभी अपने आप में व्यस्त रहते हैं। हादसे या अपराध के रूप में कई ऐसी घटनाएं सामने आती भी हैं, जहां लोग किसी घायल या पीड़ित की तत्काल मदद करने के बजाय बच कर निकल जाते हैं या फिर चुपचाप देखते रहते हैं। लेकिन इस तस्वीर के बीच हमें कुछ ऐसे उदाहरण भी मिल जाते हैं, जहां लोग दूसरे की मदद के लिए बेहिचक आगे बढ़ कर आते हैं। आज बदलते वक्त में मदद की अहमियत और बढ़ गई है। अलग-अलग उद्देश्यों से शहरों में पलायन बढ़ने से महानगरों की आबादी भी बढ़ी है। यहां लोगों को छोटी-बड़ी जरूरतों के लिए कई बार दूसरे पर निर्भर रहना पड़ता है। ऐसे में किसी ओर से बढ़ा मदद का एक हाथ किसी के काम को बहुत आसान बना देता है।

यही बात ग्रामीण इलाकों की जीवनशैली पर भी सटीक बैठती है। शहर की ओर पलायन से गांव की आबादी कम हो रही है। इसी कम आबादी में उन्हें भी कई बार अपने काम को पूरा करने के लिए अपने आसपास के लोगों की सहायता की जरूरत होती है। ऐसी स्थिति में अगर कोई आगे बढ़ कर मदद के लिए सामने खड़ा हो जाए तो हर किसी का काम आसान हो जाता है और बदले में खुशी भी मिलती है। सच तो यह है कि आपस में एक दूसरे की मदद हमारी जीवशैली को आसान करने के साथ-साथ हमारे जीवन को भी खूबसूरत बनाती है। यों भी मनुष्य चूंकि अपने व्यवहार की वजह से ही एक सभ्य समाज का निर्माण कर सकता है तो मदद को सभ्यता की राह में एक सुंदर अभिव्यक्ति और व्यवहार माना जाना चाहिए। और खुद को एक सभ्य समाज का हिस्सा कहने वाले लोगों की कोशिश यह होनी चाहिए कि अपनी सीमा में ही सही, बिना किसी हिचक के मदद के हाथ बढ़ा दें।

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