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दुनिया मेरे आगे: बचपन के बहाने

प्रसिद्ध बाल मनोवैज्ञानिक कमला मुकुंदा अपनी पुस्तक ‘वाट डिड यू आस्क्ड एट स्कूल टुडे’ में कहती हैं कि बच्चों में गैर-जन्मजात सीखने की अपार क्षमता होती है। गैर-जन्मजात सीखने का अर्थ है पढ़ना, लिखना, प्रयोग करना आदि। तो फिर स्कूलों में बच्चे ये सब क्यों नहीं सीख पाते?
Author February 13, 2018 02:04 am
चित्र का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

कालू राम शर्मा

किसी बच्चे को देखता हूं तो मुझे वह अपार संभावनाओं से लबरेज लगता है। आनुवांशिकी बताती है कि एक बच्चे की बनावट ही इस तरह की होती है कि उसमें तमाम क्षमताएं होती हैं जो हम दुनिया के लोगों में देखते हैं। चाहे वह किसी भी जाति या धर्म का हो। अहम यह है कि बच्चे को बचपन से कैसा माहौल मिलता है। हम मानव की बात करें तो उसका दिमाग और शरीर की आनुवांशिक बनावट कुछ इस तरह की होती है कि उसे अगर उचित वातावरण मिले तो वह हर चीज सीखने का माद््दा रखता है। मामला यह है कि अकसर हम जात-पांत की बात करते हुए इंसानों की बुद्धि व उनकी सीखने की क्षमताओं पर सवालिया निशान दागना शुरू कर देते हैं। वास्तव में जो हाशिये की पृष्ठभूमि के बच्चे होते हैं उनका न केवल शारीरिक बल्कि सोचने-समझने की तैयारी व लालन-पालन मुख्यधारा की संस्कृति से जुदा होता है। यह एक प्रमुख कारण है कि वे मुख्यधारा से कटे होते हैं। सवाल है कि आखिर हम क्यों मुख्यधारा में हर किसी को लाना चाहते हैं।

स्कूलों में न पहुंचने वाले बच्चे हााशिये पर जी रहे परिवारों से हैं। सच कहें तो स्कूल उन तक अपनी पहुंच नहीं बना पाया है। बच्चा चाहे कितनी भी कमजोर पृष्ठभूमि के परिवार में जन्म ले, वह अपने परिवेश की भाषा सीख ही लेता है। दुनिया का हर बच्चा भाषा सीखने की क्षमता के साथ जन्म लेता है। इसका अर्थ यह नहीं कि वह जन्म लेते ही भाषा सीख लेगा बल्कि वह यह क्षमता लेकर जन्मता है। इतना ही नहीं, बच्चा दुनिया की हर भाषा सीखने की क्षमता रखता है।
हर बच्चा जिज्ञासु और उत्सुकता का खजाना होता है। बच्चा शिशु अवस्था से ही दुनिया की पड़ताल शुरू कर देता है। एक आठ माह की बच्ची के लिए अपने आसपास की हर चीज निराली होती है। वह उसे छूती है, उसका स्वाद लेना चाहती है, उसकी गंध लेना चाहती है। हर बच्चे में जिज्ञासा और उत्सुकता, अवलोकन, विश्लेषण, सामान्यीकरण करने के गुण होते हैं। ये वे कौशल हैं जो विज्ञान के ज्ञान को बुनने में अग्रणी होते हैं। सवाल है कि हम बच्चों के शुरुआती स्तर पर ही इन कौशलों के विकास पर कितना जोर देते हैं। घरों में रोजमर्रा की प्रक्रियाओं में बच्चे इन कौशलों के बीच से गुजरते हैं। मसलन, एक तीन साल की बच्ची अपने आसपास किसी चिड़िया को देखती है और उसकी आवाज सुनती है। अगली बार वह उसकी आवाज को समझ लेती है कि फलां चिड़िया आंगन में होगी। एक बच्ची चिड़िया को धूल में नहाते देख सवाल करती है कि यह धूल में क्यों नहाती है? वह यह भी देखने की कोशिश करती है कि क्या दूसरी भी धूल में नहाती है? इतना ही नहीं, वह इंसानों से भी तुलना करने लगती है? वह पूछती है कि ‘तुम धूल में क्यों नहीं नहाते?’

प्रसिद्ध बाल मनोवैज्ञानिक कमला मुकुंदा अपनी पुस्तक ‘वाट डिड यू आस्क्ड एट स्कूल टुडे’ में कहती हैं कि बच्चों में गैर-जन्मजात सीखने की अपार क्षमता होती है। गैर-जन्मजात सीखने का अर्थ है पढ़ना, लिखना, प्रयोग करना आदि। तो फिर स्कूलों में बच्चे ये सब क्यों नहीं सीख पाते? मैंने भी शिक्षकों के साथ इस मसले पर खूब बातें की हैं। यह समझना बेहद जरूरी है कि आखिर बच्चों के साथ तमाम शिक्षक स्कूलों में मेहनत करते हैं, फिर भी बच्चों में पढ़ने-लिखने जैसे बुनियादी हुनर का विकास नहीं हो पाता। कमला मुकुंदा के अनुसार, स्कूलों में जो कुछ भी होता है वह दिमाग की तासीर के विपरीत होता है। हमारा दिमाग अर्थपूर्ण चीजों को पकड़ने में माहिर है। वह अर्थहीन चीजों के प्रति उदासीन रहता है। सच कहें तो स्कूलों को बच्चों की तासीर के मुताबिक अपना रवैया और कार्यप्रणाली बनानी होगी।

वैसे एक स्कूल से आम व्यक्ति या कि अभिभावक जो अर्थ निकालते हैं वह यह कि जहां भवन हो, कक्षाएं, मेज-कुर्सियां, कक्षा में बैठे बच्चे, मिड-डे मील, घंटी, पीरियड, दैनिक डायरी, पाठ्यपुस्तकें, होमवर्क आदि आदि। मगर क्या एक स्कूल इन्हीं भौतिक सुविधाओं से ‘स्कूल’ बन जाता है? नहीं। एक स्कूल से आशय है जहां सीखने-सिखाने का समृद्ध वातावरण हो। और सीखने-सिखाने का अर्थ यह कदापि नहीं कि जहां बच्चों को जबरन वह सब सीखने को बाध्य किया जाए जो वे नहीं चाहते या कि जहां बच्चों को तथाकथित सूचनाओं की घुट्टी पिलाई जा रही हो। सडबरी वैली स्कूल का वह किस्सा मुझे याद आता है जहां किसी भी बच्चे को यह नहीं कहा गया कि तुम पढ़ो। मगर हर बच्चा जो उस स्कूल से लौट कर गया, वह पढ़ना सीख कर ही गया। जाहिर है कि उस स्कूल ने बच्चों को पढ़ने के अवसर उपलब्ध कराए।

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