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दुनिया मेरे आगे: हंसी का सौंदर्य

व्यक्ति अपनी सफलता के प्रयास उस गति से नहीं करता है जिस तीव्र गति से वह दूसरों की असफलता के लिए दांवपेच लगाता है। आपको परेशान देख कर कुछ लोगों को अच्छा लगता है। खुल कर दो बार हंस दीजिए, आपके आधे मित्रों को तो यही सोच के नींद नहीं आएगी कि आखिर आप इतने प्रसन्न क्यों हैं!

Author March 6, 2018 2:39 AM
सांकेतिक फोटो

वैज्ञानिकों का दावा है कि स्वस्थ और लंबा जीवन जीने के लिए खूब खुश रहना चाहिए और खुल कर हंसने की आदत डालनी चाहिए। आज हम जिस तरह भागमभाग से भरा और तनावयुक्त जीवन जी रहे हैं, उसमें उन्मुक्त रूप से हंसने की बात तो दूर, मुस्कराने के लिए भी वजह खोजनी पड़ती है। कभी-कभी तो याद करना पड़ता है कि इससे पहले आखिर हम खुल कर हंसे कब थे! हमारे आसपास का दायरा भी इतना संकुचित होता जा रहा है जिसमें हंसने-मुस्कराने की वजहें खोती जा रही हैं। मेरी एक मित्र है। उसके पास बात करने की अपनी एक अलग शैली है, जो आपको अनायास ठहाके लगाने के लिए मजबूर कर देती है। ऐसा नहीं है कि वह खुद परेशान नहीं होती है, लेकिन यह उसका स्वभाव है कि आप लाख अवसाद में हों, आपकी सारी समस्याओं को कुछ समय के लिए रफा-दफा करने का हुनर है उसके पास।

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वह दैनिक जीवन की छोटी-बड़ी घटनाओं को हास्य की चाशनी में डुबो कर आपके सामने ऐसे रखती है कि भीतर की सारी कड़वाहट मिठास में बदल जाती है। उसके पास अनंत किस्से हैं, जो कोरी गप्प नहीं होते हैं, बल्कि वे उसी के साथ घटने वाली रोजमर्रा की घटनाएं हैं। उसके हर किस्से का अंत जोरदार ठहाके के साथ होता है। इस बर्बर समय में कितनी मासूम-सी लगती है उसकी यह आदत! स्वार्थी और मतलबी होते जा रहे समाज में ऐसी शैली और स्वभाव के लोग बहुत कम होते जा रहे हैं। भयानक रूप से व्यस्त जीवन जीते हुए भी उसके साथ कितना वक्त गुजर जाता है और पता ही नहीं चलता! उसे देख कर सोचती हूं कि कितना दरिद्र है वह इंसान जो खुल कर हंस भी नहीं सकता। आज के आडंबर से भरे समाज में हम नहीं जान सकते कि हमारा कौन-सा मित्र कब हमसे शत्रुवत व्यवहार कर जाए। व्यक्ति अपनी सफलता के प्रयास उस गति से नहीं करता है जिस तीव्र गति से वह दूसरों की असफलता के लिए दांवपेच लगाता है। आपको परेशान देख कर कुछ लोगों को अच्छा लगता है। खुल कर दो बार हंस दीजिए, आपके आधे मित्रों को तो यही सोच के नींद नहीं आएगी कि आखिर आप इतने प्रसन्न क्यों हैं! यह टूटते हुए विश्वास, बिखरती संवेदनाओं और मरती हुई मनुष्यता का समय है। ऐसे ही किसी समय के लिए ग़ालिब ने लिखा होगा- ‘बस कि दुश्वार है हर काम का आसां होना/ आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसां होना।’ ऐसे समय में अगर कोई आपको हंसने की छोटी-सी भी वजह दे रहा है तो यकीन मानिए, वह आज के समय का सबसे सुंदर व्यक्ति है।

यह सुंदरता कभी मनुष्य का स्वाभाविक गुण हुआ करती थी। आज हित-मित्र-पड़ोसी तो दूर रक्त-संबंध भी स्वार्थ की भेंट चढ़ चुके हैं। एक ही घर में रह कर लोग मोबाइल में मैसेज कर एक दूसरे से अपनी बातें कहते हैं। वाट्सऐप पर खाने-पीने के फैसले हो जाते हैं। व्यक्ति बिना किसी स्वार्थ के किसी से मिलना या समय देना तो दूर, बात करने से भी गुरेज करने लगा है। व्यक्तिगत स्वार्थ के साथ ही ‘अर्थ’ आज सभी संबंधों की नींव बन चुका है। जबकि आर्थिक स्वार्थ किसी भी संबंध की कब्रगाह होते हैं। फिर भी व्यक्ति इसे ही खुशी का मूल मान कर जीवन को भूसी बटोरने के क्रम में चावल को लुटा देने की तरह गुजार रहा है। आज संबंधों में ऊर्जा और गरमाहट खोजनी पड़ती है। एक समय था जब गांव के चौबारे पर, गलियों के नुक्कड़ पर, चौराहों की गुमटियों पर अक्सर जोरदार ठहाकों की गूंज सुनाई दे जाती थी। लेकिन आज वह सब दुर्लभ हो चुके हैं। तकनीक ने हमें कृत्रिम जीवन प्रदान किया है। अब हम समूह में नहीं हंस रहे होते हैं, बल्कि बंद कमरे में, हेडफोन लगा कर मोबाइल में हास्य वीडियो देख कर अकेले में मुस्करा लिया करते हैं।

दूसरी ओर, खुल कर हंसने के लिए योगा के साथ हंसी के आसन कराए जाते हैं। स्थिति यह है कि हम सबको हंसाने के लिए टीवी पर ‘लाफ्टर शो’ आयोजित किए जा रहे हैं। सच यह है कि अब ऐसे शो देख कर भी हंसी नहीं आती। किसी को रुलाना या दिल दुखाना बहुत आसान है, लेकिन बहुत मुश्किल है किसी के चेहरे पर मुस्कान लाना। हंसी के बेताज बादशाह चार्ली चैपलिन कहते हैं कि ‘अगर आप केवल मुस्कराएंगे तो पाएंगे कि जीवन अभी भी मूल्यवान है।’ वे यह भी कहते हैं कि ‘हंसी के बिना बिताया हुआ दिन बर्बाद हो गया दिन होता है’। हमें अपने जीवन को मूल्यवान बनाने के लिए ही सही, मुस्कराने के बहाने ढूंढ़ने ही पड़ेंगे और अगर निदा फाजली की ‘किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाए’ पर अमल करते हुए हम किसी को हंसा भर दें तो यकीन मानिए, यह मूल्य और भी बढ़ जाएगा।

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