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दुनिया मेरे आगे: वृत्ति और विवेक

मनुष्य अपनी वृत्तियों का गुलाम है। सकारात्मक और नकारात्मक वृत्तियों को हम जीवनभर मनुष्यों से लेकर संस्था और व्यवस्थाओं तक में देखते हैं। एक आदमी से बात शुरू होती है और सकल समाज से विराट-व्यापक जनसमाज पर उसका प्रभाव पड़ता है।

Author February 26, 2018 3:06 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

सुनील मिश्र

मनुष्य अपनी वृत्तियों का गुलाम है। सकारात्मक और नकारात्मक वृत्तियों को हम जीवनभर मनुष्यों से लेकर संस्था और व्यवस्थाओं तक में देखते हैं। एक आदमी से बात शुरू होती है और सकल समाज से विराट-व्यापक जनसमाज पर उसका प्रभाव पड़ता है। हर व्यक्ति के जीवन में तरह-तरह के लोग आते हैं। अपने-अपने व्यवहार और स्वभाव के साथ वे लोग याद रहते या नहीं रहते हैं। कई बार दोनों ही स्थितियों में याद रहते हैं। उसके लिए भी, जो आने वाले अनुकूल समय में अपने पक्ष के साथ व्यवहार करेगा और उसके लिए भी जो भले कुछ न करे पर ऐसे लोग, ऐसे मत या ऐसे स्वभाव उसके जीवन का हिस्सा इसलिए बने रहेंगे, क्योंकि ऐसे जीवन का अर्थ उसके लिए कुछ भी नहीं है और वह इससे बचना या सावधान रहना चाहता है। इसलिए शायद ऐसे लोगों की थोड़ी स्मृति, उनकी नकारात्मक उपस्थिति के साथ उसके मन में बनी रहती है।

लेखक होने के नाते आम-समाज को समझने की जिज्ञासा शुरू से बनी है। हमारे एक आदरणीय ने एक महत्त्वपूर्ण बात यह कही कि अगर किसी भी व्यक्ति को उसके सच्चे स्वभाव में देखना हो तो उस वक्त बहुत ध्यान देकर देखना चाहिए, जब वह भरपूर गुस्से में हो। किसी भी मनुष्य का इस स्तर तक गुस्से में होना उसके भीतर के सारे बुरे, दबे, छिपे संक्रमणों को उजागर कर देता है। गुस्से में आदमी का विवेक खत्म हो जाता है। उस समय उसका चेहरा, उसके द्वारा अतिरेक में कहे जाने वाले शब्द उसकी प्रवृत्ति और भीतर के अहंकार को उजागर करते हैं। गुस्से में ही वह सामने वाले को यह बताता है कि वह क्या कर सकता है! हमारे आसपास ऐसे लोगों की बहुलता है जो अपनी नकारात्मक वृत्ति और विवेक के साथ जीवन और लोक व्यवहार, दोनों में एक समान उपस्थित हैं। ऐसे लोग जितने अपने घर-परिवार में अनुकूल और समरस हैं, देहरी से बाहर निकलते ही उनकी देहभाषा बदल जाती है। एक व्यक्ति उस समाज का भी हिस्सा है, परिचय और मित्रता के दायरे में आता है। उसका दूसरा आयाम वह है जहां वह कर्तव्य करता है और उसके बदले में स्थापित व्यवस्था द्वारा उसको जीवनयापन के लिए एक निश्चित समय पर नियमित रूप से सहायता मिलती है। अगर वह ऐसी जगह पर है, जहां उसे चार दूसरे लोगों की सेवा करने का अवसर मिला है, तो वहां उसकी जवाबदेही और बढ़ जाती है। दुखद है कि ऐसी अनेक जगहें निराशाजनक, नकारात्मक, कई कारणों से तनाव से भरे रहने वाले लोग अपनी-अपनी तरह से सामाजिक और देशज बदलाव की सारी सकारात्मकता और संभावनाओं को धूमिल या ध्वस्त करने का काम करते हैं।

इतनी सब बातें इसलिए कहने की जरूरत लगी कि हाल ही में एक तहसील में संबंधित जिले के कलक्टर की एक बैठक में मैं भी मौजूद था, जिसमें वे उन बैंकों के अधिकारियों की बैठक ले रहे थे, जिन्होंने अपने लक्ष्य पूरे नहीं किए हैं। युवा और मन से बहुत सहज और सकारात्मक कलक्टर ने तीन चौथाई से भी ज्यादा बैंकों के प्रबंधकों को उनकी कार्यशैली के लिए फटकार लगाई, क्योंकि विषय सीधे समाज और जनता से जुड़ा था। ऋण वसूली से लेकर खाता खोलने और ऋण देने के मामलों में जिस तरह से बैंक अधिकारी अपनी भूमिका वहां रख रहे थे, जान कर आश्चर्य हुआ कि अगर कोई अनपढ़ या गरीब व्यक्ति ठीक से आवेदन पत्र नहीं भर पाया तो उसका आवेदन सुधरवाने या थोड़ा मार्गदर्शन करने के बजाय उसे खारिज करके बैंक अधिकारी अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाते हैं। इस तरह की मानसिकता की कलक्टर महोदय ने निंदा की और नसीहत दी कि आपको कमजोर और गरीब लोगों से खतरा है. जिन्हें लाख-पचास हजार ऋण देना होता है, उन महिलाओं से खतरा है जो समूह बना कर मेहनत करके समाज में अच्छा उदाहरण उपस्थित कर रही हैं। आपको अपनी जिम्मेदारी पूरा करने में क्या परेशानी है?

स्वाभाविक है, वृत्ति और विवेक से नकारात्मक अधिकारियों के पास इन सवालों का सार्थक उत्तर नहीं था, सिवाय नीचे सिर झुकाने के। लेकिन मुझे इस बात पर अच्छा लगा कि कोई ऐसा अधिकारी निगरानी कर रहा है और ड्यूटी पर है जो ऊंची पढ़ाई के साथ संवेदना और संवेदनशीलता के साथ इस सेवा में मौजूद है। वरना ज्यादातर ऊंचे पदों पर बैठे लोगों के व्यवहार के बारे में अनुभव बहुत अच्छा नहीं पाया जाता है। लेकिन अफसोस इस बात का भी हुआ कि नकारात्मकता और प्रवृत्तियों को बदल पाना शायद आसान नहीं है। लोग अपने स्पष्टीकरण में या फिर अपना पक्ष रखते हुए भी इस बात को अपनी देह और चेहरे की भाषा से साबित करते हैं कि वे दरअसल बहुत टेढ़े-मेढ़े रास्तों के ही नाकेदार हैं। हालांकि मेरे भीतर अब भी उम्मीद है कि कुछ लोग जरूर होंगे, जिन्हें देश और समाज की फिक्र होगी और वे हाशिये के लोगों के प्रति संवेदनशील होंगे।

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