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दुनिया मेरे आगे: छोटा उ से उम्मीद

ऐसा लगता है कि पुलिस और सुरक्षा बलों का महकमा अपने भीतर भी तमाम लड़ाइयां लड़ रहा है।

Author Published on: December 11, 2019 3:21 AM
सांकेतिक तस्वीर, सोर्स-इंडियन एक्सप्रेस)

इसमें आश्चर्य की भला क्या बात है कि ‘सारा देश’ जश्न मनाता दिखा कि ‘मुठभेड़’ से न्याय हुआ! क्यों होना चाहिए आश्चर्य कि बाबाओं को बचाने के लिए हिंसक होने तक टूट पड़ने वाली भीड़ उसी पुलिस पर फूल बरसाती है, जिसके पास जाकर रिपोर्ट लिखवाने जाने से डरती हैं स्त्रियां! ऐसी खबरें अक्सर आती रहती हैं कि पुलिस हिरासत में हत्या हुई या बलात्कार हुआ। लेकिन हिरासत में हुए बलात्कारों की संख्या के बारे में जनता नहीं सोचती तो भी अब कोई आश्चर्य नहीं होता। अब तो इस बात पर भी कोई हैरानी नहीं होती कि इस जनता में ज्यादातर पढ़े-लिखे लोग भी शामिल दिखने लगे हैं। सांसद से लेकर लेखक, साहित्यकार, फिल्मकार भी! क्यों होना चाहिए आश्चर्य आखिर? हम अतार्किक लोग हैं। हम भीड़ हैं… हमें भीड़ बनना सिखाया गया है… तालियां बजाना सिखाया गया है। बात मानना और झुंड बन कर किसी के पीछे चलना सिखाया गया है। और यही असल सुख है, यही मानना हमारे भीतर बो दिया गया है। किस बात पर कितना हंसना है, किस बात को किस हद तक सहन करते जाना है सदियों तक, और किसे पीट-पीट कर मार डालना है, यह सब हमारे लिए कोई और तय करता है। हमने कब खुद के लिए खुद की मर्जी से सोचना सीखा? जो बता दिया गया, उसी को अंतिम मानते रहे! हम तो बताई गई मर्जियों पर अपनी मर्जी की मुहर लगा कर ही जीते जा रहे समाज रहे हैं हमेशा से।

क्यों आश्चर्य हो जब आपके तार्किक होने और यह पूछने को गुनाह मान लिया जाए कि ‘क्या यह कोई न्यायिक प्रक्रिया है’? शिक्षकों के आंदोलन को दरकिनार किया जाए और विद्यार्थियों की फीसवृद्धि को रद्द करने और शिक्षा को मुफ्त करने की मांग को देशद्रोह ही कह दिया जाए! सवाल पूछना आपका काम नहीं था। सौंप दिया गया काम था ताली बजाना, जयकारा लगाना। सवाल पूछेंगे तो मारे जाएंगे तो इसमें हैरत क्यों हो भला! क्यों हैरानी हो कि हम यह भी न सोचें कि यही पुलिस अपनी ही महिला अधिकारी की रक्षा में अक्सर नाकाम पाई जाती है। पुलिस क्या कोई व्यक्ति है? भीड़ क्या कोई व्यक्ति है? नहीं, दोनों ही सत्ता के खिलौने हैं, जिससे सत्ता अपनी-अपनी तरह से खेलती रहती है।

ऐसा लगता है कि पुलिस और सुरक्षा बलों का महकमा अपने भीतर भी तमाम लड़ाइयां लड़ रहा है। एक सिपाही को छुट्टी नहीं मिलती है और वह किन स्थितियों में पहुंच कर पांच साथियों को मार कर खुद को भी मार लेता है, यह बात क्यों चर्चा का विषय नहीं बनती? महीनों उन्हें घर जाने का मौका नहीं मिलता, हफ्तों छुट्टी नहीं मिलती, सोलह-सोलह घंटे ड्यूटी करनी पड़ती है। यह पूरे महकमे की कुंठा से भरी बातें हैं। ऐसी कुंठा भरी खबरें उनके भीतर भी बेलगाम प्रतिक्रिया की राह प्रशस्त करती हैं। पुलिस अपने नकारेपन को इस तरह ढंकती है और सुर्खियों में हिट हो जाती है। जनता नाचने लगती है कि न्याय हुआ। पर क्या सचमुच न्याय हुआ?

बिल्कुल आश्चर्य नहीं होता कि यही जनता सवाल नहीं करती कि बलात्कार, हत्या और अन्य अपराधों में शामिल लोग संसद में क्यों हैं! हां, याद आया… आखिर जनता ने ही तो उन्हें चुन कर भेजा है! क्यों भेजा होगा जनता ने उन लोगों को संसद में, यह सोचना मना है। हम तमाशबीन समाज हैं, क्योंकि ऐसे ही हम बनाए गए हैं। इसमें आश्चर्य कैसा भला? और जो इस भेड़चाल में शामिल नहीं हुए हैं, जिन्होंने सवाल करने बंद नहीं किए है, जिन्होंने बेहतर समाज का सपना देखना नहीं छोड़ा, जो भीड़ की तेज बहाव के खिलाफ भी अपना हस्तक्षेप दर्ज कर देते हैं, जो इंसाफ और हकों के लिए अब भी लड़ना और आवाज उठाना जानते हैं, उनका अगर मजाक उड़ाया जाए, उन पर मुकदमे दर्ज हों, उन्हें नजरबंद किया जाए, देशद्रोही कहा जाए तो भला क्यों आश्चर्य होना चाहिए! एक जागे हुए दिमाग से ज्यादा खतरनाक भला और क्या होता है? तो उसे घेरने में तो सत्ताएं जुट ही जाएंगी न?

नहीं आश्चर्य होता कि हम सबको, इस पूरे समाज को धर्म, जाति, मंदिर, मस्जिद और कहीं-कहीं सत्ता की चापलूसी से मिलने वाले फायदों, पुरस्कारों आदि की अफीम चटा-चटा कर कठपुतली बना दिया गया है। ये कठपुतलियां भीड़ हैं, साइबर सेल हैं। ये कठपुतलियां विलक्षण लेखक हैं, पत्रकार हैं, फिल्मकार हैं। इनके पास वे ‘तर्क’ हैं जो इंसानियत की पैरवी नहीं करते, धर्म की करते हैं, जाति की करते हैं। ‘तर्क’ जो अपराधियों में भी धर्म देखते हैं और पीड़ित में भी!
आश्चर्य तो यह है कि कोई उम्मीद है जो अब तक बुझी नहीं है। आश्चर्य तो यह है कि एक सुंदर समाज का सपना है जो तमाम किरचों में टूट जाने के बावजूद बचा हुआ है। दूर किसी गांव में कोई शिक्षक बच्चों को सुना रहा है प्यार भरी कोई कविता और कोई बच्ची लिख रही है ‘छोटा उ से उम्मीद’!

प्रतिभा कटियार

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