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दुनिया मेरे आगे : बच्चे की भाषा

कभी किसी शिशु को करीब से देखने का अवसर मिले, तो अवश्य देखिए। उसकी हरकतें, जबान, खास अवसरों पर की जाने वाली चेष्टाएं मिल कर कैसे उसकी एक भाषा बनाती हैं। उन्हें समझ कर ही आप उसके किसी संकेत या भाषिक आशय को समझ सकते हैं। मेरी सवा साल की पोती जब मुझसे हाथ फैला कर कहती है- ‘आ जाओ’ तो दरअसल वह मुझसे ‘आ जाओ’ नहीं, ‘मुझे अपने पास ले लो’ कह रही होती है।

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महेश दर्पण

आमतौर पर हम निकट के व्यक्ति को गौर करने लायक नहीं समझते। अगर वह बच्चा हुआ तो कहने ही क्या! थोड़ा-सा पुचकार लिया, हंस-खेल लिया और फिर कह दिया कि जाओ अपनी मम्मी या बहन के साथ खेलो। बच्चे के साथ हमारा व्यवहार अमूमन एकतरफा रहता है। जो हम उससे कहना चाहते हैं, वह कह डालते हैं और कभी-कभी तो उसके पीछे पड़ जाते हैं कि हमारे कहे को वह समझ ही ले। लेकिन जो वह कहना चाह रहा होता है, उसे सुनने की कोई खास जरूरत हम महसूस नहीं करते। सच है कि उसकी भाषा आसानी से समझ में आने वाली नहीं होती, लेकिन उसकी बात समझने का धैर्य न रखना कहां की समझदारी है! भाषा विज्ञानी भोलानाथ तिवारी ने भाषा की उत्पत्ति पर लिखे निबंध में मिस्र के राजा सेमेटिकस द्वारा ईश्वर निर्मित मूल भाषा को जानने के लिए किए गए प्रयोग का उल्लेख किया है। इसके तहत उसने दो बच्चों को जन्म के ठीक बाद से समाज से अलग रखा। उसके पीछे शायद उसकी यह सोच काम कर रही थी कि ईश्वर से प्राप्त भाषा वे सहज ही बोल लेंगे। इसके लिए उन्हें न कुछ सीखना जरूरी होगा और न किसी का सिखाना। जब बच्चे कुछ बड़े हो गए तो पाया गया कि उनकी भाषा में महज एक शब्द है- ‘बेकोस।’ भोलानाथ तिवारी के अनुसार यह फ्रीजियन भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है- रोटी। जो सेवक उन बच्चों के संपर्क में आया था, उसने असावधानीवश ‘बेकोस’ कह दिया होगा और बच्चों ने तुरंत सीख लिया। इसके अतिरिक्त वे भाषा के नाम पर कुछ नहीं जानते थे। भोलानाथ तिवारी ने ठीक कहा है कि अगर कोई भाषा सचमुच ईश्वर द्वारा बनाई गई होती और बच्चे उसे मां के गर्भ से ही सीख कर आते होते तो पूरी दुनिया आज एक भाषा बोल रही होती। बच्चे वही सीखते हैं, जो वह अपने आसपास से सुनते हैं। कभी-कभी तो वह ध्वनि भर पकड़ लेते हैं और उसका अर्थ अपने हिसाब से समझने या लगाने लगते हैं। यह भी उस शब्द की ध्वनि के बारंबार प्रयोग या स्पर्श से हो पाता है।

कभी किसी शिशु को करीब से देखने का अवसर मिले, तो अवश्य देखिए। उसकी हरकतें, जबान, खास अवसरों पर की जाने वाली चेष्टाएं मिल कर कैसे उसकी एक भाषा बनाती हैं। उन्हें समझ कर ही आप उसके किसी संकेत या भाषिक आशय को समझ सकते हैं। मेरी सवा साल की पोती जब मुझसे हाथ फैला कर कहती है- ‘आ जाओ’ तो दरअसल वह मुझसे ‘आ जाओ’ नहीं, ‘मुझे अपने पास ले लो’ कह रही होती है। उसके अनेक रोचक संकेत उसकी बनती हुई उस भाषा से परिचित कराते हैं, जिसे वह घर-परिवार और आस-पड़ोस से सुन कर समझ और अपने हिसाब से बरत रही होती है। कभी-कभी तो जब वह बहुत कुछ कहना चाह रही होती है तो उसकी ध्वनियों और कहन के आवेग में शब्द परस्पर गड्डमड्ड होने लगते हैं। मैं उसकी बात न समझूं तो वह अपनी उसी बात को तेज स्वर में दोहरा देती है। इस तेजी के पीछे उसका यह विश्वास काम कर रहा होता है कि अब तो दादाजी मेरी बात समझ ही जाएंगे।

आप भी अवश्य ऐसे अनुभवों से गुजरे होंगे। ऐसे में पाया यह होगा कि बच्चे की मां, दादी या नानी उसकी बात ज्यादा आसानी से समझ जाती है। वह उसकी एक-एक हरकत के साथ भाषा की पकड़ की प्रक्रिया को इतनी बारीकी से समझती है कि घर के अन्य लोगों के लिए बच्चे की भाषा का अनुवादक ही बन जाती है। ये दरअसल वे लोग हैं जो बच्चे के लिए भाषिक संपर्क का प्राथमिक स्रोत होते हैं। उनसे ही वह सीखता है कि कब, क्या, कैसे और किससे बोलना है। चीजों को समझने में आकृतियां उसकी बड़ी मदद करती हैं। आजकल दृश्य माध्यमों में आ रहे विज्ञापन अगर शिशुओं की पहली पसंद बनते जा रहे हैं तो इसके कारणों को समझना चाहिए। रोते-रोते अचानक वे विज्ञापन के समय न सिर्फ चुप हो जाते हैं, बल्कि इतने गौर से विज्ञापन देखते हैं कि जैसे उस वक्त उन्हें दीन-दुनिया से कोई सरोकार ही नहीं। उनकी एकटक आंखें, स्थिर मुद्रा और सजग शरीर जैसे उस भाषा को बड़ी अच्छी तरह आत्मसात कर रहा होता है। इससे क्यों न यह अनुमान लगाया जाए कि भाषा में न सिर्फ ध्वनियां, बल्कि सचल चित्रों का योग बच्चे के लिए आज एक बड़ा आकर्षण बन गया है! आजकल हिंदी के साथ अंग्रेजी शब्दों का ऐसा बाल संस्करण बन रहा है कि देखते ही बनता है। मेरी पोती को उसकी दादी ने गली में दौड़ता कुत्ता दिखा कर कहा- ‘वो देखो, डुग्गू जा रहा है!’ बस, उसके लिए कुत्ता हो गया- डुग्गू। डॉग से डुग्गू बना तो बच्चा उसे झट से समझ गया। उसने उसे बार-बार गली में दौड़ते हुए भी तो देखा था न! अब जब कभी उसे कुत्ता नजर आता है, तो वह कहती है- डुग्गू-डुग्गू।’ आप उसकी बात समझ जाएंगे तो खुश हो जाएगी, वरना दोहराती रहेगी। आखिर भाषा तो उसी की रहेगी! हां, दूसरों का संग-साथ निरंतर उसे बदलता-संवारता रहेगा।

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