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दुनिया मेरे आगे: मायूस मेहनतकश

जिस दिन मजदूर को काम नहीं मिलता है, उस दिन वह मायूस हो जाता है। उसकी दिहाड़ी मारी जाती है। उस दिन वह कमाएगा नहीं, लेकिन खाना तो है ही। दिन भर वह जी-तोड़ मेहनत करता है, तब जाकर उसे कुछ पैसे मिल पाते हैं। मजदूरों को दिहाड़ी लोग शायद अहसान समझ कर देते हैं।

Author March 1, 2018 2:51 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।(एक्सप्रेस फोटो/मनोज कुमार)

निशा कुमारी

आजकल ‘लेबर चौक’ से जब भी गुजरती हूं तो मजदूरों का जमावड़ा देख कर दिल में एक हूक उठ जाती है। एक खास जगह पर मजदूरों की भारी भीड़ उमड़ती है और ऐसा लगता है जैसे कोई मेला लगा हुआ हो। सब काम की तलाश में आए होते हैं। गांव-समाज से अपना घर-बार छोड़ कर। कुछ-कुछ समय पर ठेकेदार किस्म का एक आदमी कार लेकर आता है और वह कुछ कहे, इससे पहले ही मजदूरों का हुजूम उसकी कार के पास जुट जाता है। सब उसकी शर्तों पर उसके साथ जाने के लिए तैयार रहते हैं। एक को ठेकेदार कहता है कि तुम्हारी उम्र तो अभी कम है… नौसिखुआ लगते हो, तो नवयुवक कहता है- ‘कर लेंगे साहब! गांव में पहले भी काम करते रहे हैं। उम्र पर मत जाइए। वैसे भी काम नहीं करेंगे तो खाएंगे क्या..! बाप मर गया है, विधवा मां है और एक बड़ी बहन और एक छोटा भाई भी है परिवार में… बहन की शादी भी करनी है अभी!’

जिस दिन मजदूर को काम नहीं मिलता है, उस दिन वह मायूस हो जाता है। उसकी दिहाड़ी मारी जाती है। उस दिन वह कमाएगा नहीं, लेकिन खाना तो है ही। दिन भर वह जी-तोड़ मेहनत करता है, तब जाकर उसे कुछ पैसे मिल पाते हैं। मजदूरों को दिहाड़ी लोग शायद अहसान समझ कर देते हैं। मैं भी एक जगह काम करती हूं और मुझे भी तनख्वाह मिलती है। यह मेरा अधिकार होता है और मैं तो अपनी शर्तों पर काम करती हूं। लेकिन मजदूर अपनी शर्त पर काम नहीं करते, क्योंकि उनकी पूरी जीवनचर्या को नियंत्रित करके रखा गया है। आज की तारीख में बाकी चीजें भले ही दिन-रात महंगी होती जा रही हों, लेकिन मजदूर की मजदूरी नहीं बढ़ रही है। लोग दो सौ रुपए देंगे और जो मन होगा मजदूरों से दिन भर काम करवाएंगे। इतने पर भी कुछ लोगों का मानना है कि आजकल मजदूरों का नाज-नखरा ज्यादा ही बढ़ गया है। पहले की बात कुछ और थी। बंधुआ मजदूर होते थे। बाद में और समय बदला तो सेर-दो सेर दिहाड़ी पर काम होने लगा। लेकिन आज सब कुछ बदल गया है। यह और बात है कि जब बंधुआ मजदूरी का जमाना था, तब भी भाई साहब के परिवार में अनाज की कीमतों में कभी कोई कमी नहीं आई। बल्कि यह कहा जाए कि मजदूर किस्म के लोगों के लिए दाम चढ़ ही रहा, तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। अनाज लेने के लिए आने वाले लोगों से पहले बेगारी कराई जाती थी और फिर बाद में उन्हें अनाज दिया जाता था। दूसरी ओर, समर्थ लोग अपने खेत में उपजाए गए अनाज को अपनी शर्त पर ही बेचते रहे। लेने वालों ने कभी उन पर मेहरबानी नहीं की, लेकिन उन्होंने मजदूर वर्ग के लोगों को सही कीमत पर अनाज देकर मेहरबानी जरूर की। हमारे पड़ोस का एक परिवार मूल रूप से कृषि पर आधारित रहा। बाहरी खर्चों के लिए उन्हें भी रुपए की जरूरत होती थी। ऐसे में अनाज बेचना उनकी मजबूरी थी। सोच का कितना बड़ा अंतर है। उनकी मजबूरी मेहरबानी हो जाती है और मजदूर वर्ग की जरूरत उसे अहसानमंद बना देती है।

घरों में काम करने वाले नौकर के रूप में जाने वाले सहायक और सहायिकाओं के प्रति लोगों का जो नजरिया देखती हूं, उससे मन घबराता है। लगता है कि यह कैसा समाज है! जबकि इन कामगारों, दिहाड़ी मजदूरों, घरेलू सहायकों और ड्राइवर जैसे लोगों के सहारे ही हम अपना कामकाज आगे बढ़ाते हैं। फिर इन लोगों के प्रति हमारा बर्ताव ऐसा क्यों है, हम उन पर क्यों ऐसे चीखते-चिल्लाते हैं! यों भी अपने को उच्च समझने वाले हम लोग भी आखिर क्या हैं? किसी न किसी तरह से कहीं न कहीं कोई शारीरिक श्रम बेच रहा है तो कहीं कोई मानसिक श्रम। बेचता तो हर कोई है अपने आप को। और इसे बेच कर ही दो जून की रोटी कमाता है। जब बड़े-बड़े दफ्तरों में ऊंचे डिग्रीधारियों को नौकरी के लिए भागदौड़ करते देखती हूं तो लेबर चौक पर दौड़ कर कार तक आने वाले वे मजदूर याद आ जाते हैं। इन डिग्रीधारियों की भी हालत मजदूरों जैसी ही हो गई है। यह अलग बात है कि अगर काम मिल गया तो ये लोग वातानुकूलित दफ्तरों में कुर्सी-टेबल पर काम करते हैं और कड़ाके की सर्दी-गरमी या बरसात में काम करने वाले मजदूरों के प्रति उनका रवैया मानवीय नहीं होता। जबकि मजदूरों के प्रति ऐसी सोच रखने वाले भले ही किसी बड़े दफ्तर में काम करते हों, लेकिन वे भी करते काम ही हैं और हुए नौकर ही। दरअसल, हमारे देश और समाज में हर कोई किसी न किसी रूप में नौकर ही है, चाहे वह सरकारी नौकर हो या लोक सेवक। ऐसे में अपने को संभ्रांत समझने वाले हम लोगों को क्या मजदूर वर्ग के लोगों के प्रति अपना व्यवहार और अपनी सोच नहीं बदलनी चाहिए?

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