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दुनिया मेरे आगे: आधा-आधा कुआं

दरअसल, यह कुआं दो परिवारों की जमीन में आधा-आधा पड़ता है तो आधा-आधा बंट गया।

Author Updated: October 2, 2019 1:46 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

अबकी बार गांव गया तो देखा कि बचपन में जिस कुएं का पानी हम पीते थे और अक्सर जहां नहाते थे, अब उसमें पानी नहीं है। दरअसल, यह पक्का कुआं काफी गहरा था और इस कुएं ने बचपन में हमें ही नहीं आस-पड़ोस और माता-पिता, चाचा-चाची, भैया-भाभी, रिश्तेदार-नातेदार सबको पानी दिया है। इसका पानी इतना ठंडा था कि 1970-1980 के दशक में हमारे टोले में जब भी शादी-ब्याह होता, पीतल की गगरी से पानी निकाला जाता और उसी से मेहमानों-बारातियों के लिए शरबत बनता। तब तक गांव में ठंडे पेय यानी कोल्ड ड्रिंक्स और बर्फ की सिल्ली नहीं आती थी।

दुनिया में कुएं का इतिहास कोई आठ हजार साल पुराना है। पहले कुएं, खेतों के आसपास ही बनाए जाते थे। मौजूदा समय में इजराइल में सबसे पुराने कुएं का पता चला है जो 7500-8000 साल पहले का है। हम सबके पुरखे, पहले नदी-तालाब-पोखरे से पानी पीते थे। फिर कुएं बनाए जाने लगे। उन्नीसवीं शताब्दी के शुरुआती वर्षों तक लकड़ी की मदद से खुदाई करके कुएं बनाने की तकनीक प्रयोग में थी। कुएं खुदवाना एक पुण्य का काम समझा गया, इसीलिए कई राजाओं ने सरेराह कुएं और बाबड़ी खुदवाए। राजस्थान के अभनेरी में नौवीं शताब्दी में बनी चांद बावड़ी बहुत प्रसिद्ध है। इसमें पानी तक जाने के लिए सीढ़ियां बनी हैं। यह चौंसठ फुट गहरी है और कहा जाता है कि भारत की यह सबसे गहरी और विशाल बावड़ी है, जिसमें तेरह मंजिल हैं। बढ़ती मांग ने कुएं-बावड़ी की खुदाई की तकनीक में लगातार सुधार किया। बीसवीं सदी में लोहे की आधुनिक मशीनों से कुएं-बावड़ी की खुदाई का काम शुरू हो गया, लेकिन अब कुएं खत्म होते जा रहे हैं।

सात-आठ साल पहले गांव के कुएं से जोड़ कर एक हैंडपंप लगा दिया गया था। राह चलते लोग भी आसानी से यहां पानी पी लेते थे। दरअसल, यह कुआं दो परिवारों की जमीन में आधा-आधा पड़ता है तो आधा-आधा बंट गया। अब हैंडपंप उखड़ चुका है। कुएं के आधे हिस्से को नए बने मकान ने ढक लिया है। संयुक्त परिवारों के विभाजन ने हमारे गांव में ही कई कुओं को समाप्त कर दिया। देश भर में कुओं की संख्या ऐसे ही घटती जा रही है, लेकिन उत्तरी कर्नाटक, मध्यप्रदेश, राजस्थान, गुजरात में अभी भी कुएं की महत्ता अधिक है। मेरे गांव में कई कुएं खत्म हो चुके हैं तो कुछ को इस हाल में छोड़ दिया गया है कि वे किसी काम के नहीं रहे।

पूर्वी उत्तर प्रदेश में 1990 के दशक में पहले घरों में हैंडपंप आए और फिर बिजली आने के बाद टंकी और जेट पंप लगने लगे। हमारे इलाके और गांव में ज्यादा पानी बटोर कर रखने का चलन नहीं था, लेकिन अब गांव में लोग छत पर प्लास्टिक की टंकी रखने लगे हैं। जो कुआं पानी से लबालब भरा रहता था, धीरे-धीरे उसका पानी नीचे जाने लगा। लोग बिजली की मोटर की मदद से ट्यूबवेल और कुएं से पानी खींचने लगे! नौजवानों को नहीं पता चला कि कुआं भी बूढ़ा हो रहा है। कुएं के साथी, पीतल वाली गगरी और डोरी तो कब के चले गए। शायद ही किसी घर में पुराने गगरा-गगरी मिलें! अपने ही गांव में बाबा-आजी, काका-माई,अम्मा -पिताजी, घुरपत्तर कितने लोग स्मृति के पन्नों में समाहित हो गए। ऐसे में यह कुआं मेरे भरोसे और पुरखों की याद दिलाता हुआ अभी भी वहां खड़ा है।

यह कुआं कम से कम सौ साल पहले बना हुआ था। बाद में इसके किनारे गोलाई में पक्का चबूतरा बना। लोग इस चबूतरे पर बैठ कर बातें करते, नहाते, कपड़े और अनाज सुखाते। अब कुएं की जगह मोटर और पानी की टंकी आ गए हैं। कुछ लोग गैलन का पानी खरीद कर पी रहे हैं। शादी-ब्याह और भोज में अब बोतल का पानी चलने लगा है। पुराने लोग, जिनके साथ कुएं का दाना-पानी, हल-बैल, गीत-गंवई के संबंध रहे हैं, उनमें से अधिकतर लोग गुजर गए। जो बुजुर्ग अभी भी मौजूद हैं, वे दुखी और लाचार हैं कि उनकी कोई नहीं सुनता। गांव में रह रहे मेरे एक भतीजे ने बताया कि आसपास के लोग कुएं में कूड़ा फेंकते हैं। जब मैंने झांक कर देखा तो कुएं में पानी नहीं दिखा। कूड़े का ढेर काफी ऊपर आ चुका था।

उसी दिन मुझे दिल्ली वापस आना था। ज्यादा समय नहीं था वहां रुकने के लिए। मेरे भीतर कुछ अजीब-सा महसूस हुआ। मेरे कानों में छपाक-छपाक कुछ बजने लगा, जैसे गगरी कुएं में पहुंच गई हो और कुआं यानी ‘इनार’ कह रहा हो- ‘हम तो आपके कंधे से लिपट कर, रोकर अपना मन हल्का कर लेना चाहते हैं, क्योंकि आप बहुत दिनों के बाद आते हैं और शायद आप जब अगली बार आएं, तो मेरा कोई निशान ही यहां नहीं मिले।’ सुविधाएं कैसे किसी समाज को इतना लापरवाह बना देती हैं कि वह उन बुनियाद को भी खत्म करने से नहीं हिचकता, जिन पर उसका जीवन टिका रहा।

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