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दुनिया मेरे आगे: चमक का नेपथ्य

पहली बार लगा कि नीयत हो तो यमुना का पानी भी रोजगार के लिए साफ किया जा सकता है। लेकिन इस कहानी में सबसे दिलचस्प बात यह है कि जिसे मैं अब तक यमुना का गंदा पानी समझ रहा था, उनसे बात करके पता चला कि वास्तव में वह नाले का पानी है जो यमुना के समांतर बहता हुआ यमुना में मिल जाता है।

Author July 6, 2018 2:10 AM
सड़क पर हों या घर में या कामकाज की जगह पर, कहीं भी शोर से छुटकारा नहीं है। सड़कों पर यातायात का शोर लगातार आपका पीछा कर रहा होता है।

राय बहादुर सिंह

विकास के शोर ने शहर भर को इतना मगरूर बना दिया है कि किसी के पास किसी के लिए समय नहीं है। न अपनों के दुख-सुख जानने और न उन रास्तों, पुलों, नदी-नालों के किनारे सन्नाटे में धीमे-धीमे सांस लेती कहानियों को सुनने के लिए। ऐसा भी नहीं है कि ये कहानियां किसी राहगीर को देख लालायित हो जाती हैं अपनी सुनाने को। बल्कि ये बड़ी खामोशी से उपेक्षा भी कर देती हैं और किसी को कानों-कान खबर भी नहीं होती। कुछ महीने पहले मैंने पद्माकर, रसखान, सूरदास और घनानंद को पढ़ा तो लगा कि इन कवियों के पास क्या सूक्ष्म दृष्टि थी। यमुना के किनारे धूल में उड़ती कहानियों को कैसे उन्होंने कविताओं में पिरोया है, यह सोच कर एक खयाल आया कि क्या मुझे भी कोई कहानी मिल सकती है! अपने में ही व्यस्त रहने वाली कहानियों से मैं मिला जामिआ से दूर यमुना के किनारे पर। बड़ी-बड़ी जंगली घास उगी हुई थी। सूरज सिर पर था। यमुना का पानी काला था, जैसा कि खबरों में पढ़ा था। थोड़ा अफसोस हुआ। फिर सोचा कि गंगा की तरह सरकार शायद किसी दिन यमुना का भी उद्धार कर ही देगी।

मैं किनारे पर बैठ गया। पानी को पास से देखने का मन हुआ। उधर किनारे पर घास के मैदान में कपड़ा धोने का काम करने वालों ने सूखने के लिए कपड़े फैला रखे थे। दूर से देखने पर एक रंगीन देहाती दृश्य आंखों के सामने उभर रहा था। यमुना के इस पार थोड़ी दूर पर कुछ लोग कालीन धो रहे थे। उनके पास गया। उन लोगों ने किनारे पर कई हौदियां बना रखी थीं, जिनमें वे पहले यमुना के पानी से दरी या कालीन को गीला करके उसे सर्फ और ब्रश से साफ कर रहे थे। उसके बाद यमुना के पानी में उतर कर कालीन धोते। मुझसे रहा नहीं गया तो पूछ बैठा कि भइया, जब पानी पहले से ही इतना काला है तो उसमें कालीनों को धोने से क्या लाभ! उन्होंने बताया कि हम एक बार कालीन इसी पानी से धोते हैं, फिर उसके बाद साफ पानी से। मैंने जानना चाहा कि साफ पानी कहां से लाते हैं। हम जहां थे, वहां पानी तो दूर, हवा को भी साफ कहने से पहले एक बार सोचना पड़े। वे सहज भाव से बोले कि हम नाले के गंदे पानी को साफ पानी बनाते हैं। उनकी बात सुन आश्चर्य और खुशी का मिला-जुला अहसास हुआ। जिस यमुना को बीते कई सालों में कोई सरकार साफ नहीं कर पाई, उसके पानी को ये कालीन धोने वाले साफ करते हैं। उन्होंने किनारे पर बनी हॉदी में गंदा पानी डाला और ब्लीचिंग पाउडर डाल कर पानी को साफ बना दिया।

पहली बार लगा कि नीयत हो तो यमुना का पानी भी रोजगार के लिए साफ किया जा सकता है। लेकिन इस कहानी में सबसे दिलचस्प बात यह है कि जिसे मैं अब तक यमुना का गंदा पानी समझ रहा था, उनसे बात करके पता चला कि वास्तव में वह नाले का पानी है जो यमुना के समांतर बहता हुआ यमुना में मिल जाता है। हममें से कितने लोग जानते होंगे कि हमारे घरों और फैक्ट्रियों से निकला पानी कपड़े और कालीन साफ करने के काम आता है! वह पानी जिसके संपर्क में आने से स्वस्थ व्यक्ति भी बीमार हो जाए। तेजी से बढ़ते शहरीकरण और जल की घटती उपलब्धता के कारण देश में कपड़ा धोने के व्यवसाय में लगे लोगों की आर्थिक और सामाजिक स्थिति पहले जैसी ही बनी हुई है। आमदनी कम होने के कारण ये लोग अपने बच्चों को स्कूल भेजने की जगह अपने ही काम में लगा लेते हैं। इसका सामान्य-सा अर्थ है कि ये लोग अपने बच्चों को पढ़ा-लिखा बेरोजगार नहीं बनाना चाहते हैं। दुनिया का सबसे युवा देश अशिक्षा और बेरोजगारी से त्रस्त है।

हमने लोगों को या भीड़ को मंदिर और मस्जिद के लिए आंदोलन करते हुए देखा है, लेकिन सरकारी स्कूलों और शिक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए आंदोलन करते नहीं देखा। इसके पीछे छिपे कारणों की तलाश में जाएंगे तो हमें अराजक कहा जा सकता है। यमुना के किनारे कालीन धोने वाले लोगों की शिक्षा को लेकर बनी मानसिकता ने कोई रातोंरात आकार नहीं लिया है, बल्कि इसके पीछे उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति जिम्मेवार है। दुनिया को कागज पर विकास दिखा कर बताया जाता है कि हमारा जीडीपी बढ़ा है और हमने विकास किया है। वास्तविकता चाहे जो हो, प्रचार के जरिए हमें भ्रम की उस उथली जमीन पर छोड़ दिया जाता है, जहां चारों ओर हमें विकास की धूल की आंधी चलती नजर आती है। वह आंधी दिल्ली से चल कर देश-भर की आंखों में धूल झोंकती रहती है। इस आंधी की सबसे बड़ी खासियत है कि यह देश की बेरोजगारी और अशिक्षा जैसी सभी समस्याओं को बड़ी सरलता से छिपा जाती है।

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