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बंद दरवाजों के भीतर

दिल्ली-एनसीआर में ऐसी किशोरियों-स्त्रियों के लिए अब ‘मेड’ शब्द प्रचलित है, और घर की मालकिन के लिए ‘मैडम’। जब किसी किशोरी-स्त्री को प्रताड़ित किया जाता है तो उसके मुंह में कपड़ा ठूंस दिया जाता है कि चीख बाहर न जाए।

Author October 23, 2017 5:31 AM
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

हाल में एक खबर आई कि किसी किशोरी परिचारिका को बंद दरवाजों के भीतर मारा-पीटा गया। उसके शरीर में घाव हुए। उसे ठीक से खाने-पीने नहीं दिया गया और वह महीनों या वर्षों किसी कैदी का-सा जीवन बिताती रही। किसी फ्लैट परिसर से छलांग लगाने के दौरान, पड़ोसियों ने उसे देखा, बचाया और तब रहस्य खुला कि वह छलांग क्यों लगा रही थी। ऐसा नहीं कि ऐसी दुर्घटनाएं सिर्फ किशोरियों के साथ होती हों, किसी बढ़ी उम्र की स्त्री के साथ भी हो सकती हैं। होती ही हैं। पर किशोरियों की बात हमने इसलिए की है कि कम उम्र की लड़कियों में प्रतिरोध करने की क्षमता कम होती है। और वे सहज ही इस तरह की हिंसा का शिकार बनाई जा सकती हैं। दिल्ली-एनसीआर में ऐसी किशोरियों-स्त्रियों के लिए अब ‘मेड’ शब्द प्रचलित है, और घर की मालकिन के लिए ‘मैडम’। जब किसी किशोरी-स्त्री को प्रताड़ित किया जाता है तो उसके मुंह में कपड़ा ठूंस दिया जाता है कि चीख बाहर न जाए। ‘मेड’ को ‘मैडम’ ही प्रताड़ित करती हों, ऐसी बात नहीं है। कई मामलों में तो पुरुष भी शामिल होते हैं। साल-दो साल पहले खबर आई थी कि एक डॉक्टर दंपति खुद तो छुट्टियां मनाने विदेश गया और किशोरी मेड को घर के भीतर बंद कर गया। उसके खाने-पीने के लिए फ्रिज में पूरा सामान भी नहीं था। एक और खबर में आया कि एक ‘मेड’ को किसी से मिलने-बतियाने पर पाबंदी थी। वह पालतू कुत्ते को घुमाने जरूर ले जाती थी, पर किसी से बतिया नहीं सकती थी। और फ्लैट में सीसीटीवी कैमरे थे। उसे खाने को तभी मिलता था जब यह देख लिया जाता था कि उसने दिन भर ठीक से सारा काम-काज किया है या नहीं।

बंद दरवाजों के भीतर की हिंसा का हाल यह है कि अब पड़ोसी को भी हिंसा की खबरें नहीं मिल पातीं। मारपीट, बलात्कार और अन्य यातनाएं दबी रहती हैं। अगर किसी ने यह दिखा दिया कि उसे किसी से मिलने में बहुत दिलचस्पी नहीं है तो लोग भी आमद-रफ्त छोड़ देते हैं। फिर व्यस्त महानगरीय जीवन में अब किसे है इतनी फुरसत कि दूसरों के मामले में उलझे! सड़क पर भी यही हाल है। लोग घायलों को तड़पता छोड़ आगे बढ़ जाते हैं। हर शहर में बहुमंजिला फ्लैटों की बाढ़ है। बंद दरवाजों के भीतर की दुनिया सचमुच अपने में बंद हो गई है। घरेलू हिंसा का विस्तार हो गया है। इसकी खबर भी दुर्घटना के बाद ही आती है। एक जमाना था जब घर ही होते थे, फ्लैट नहीं। और चीख-पुकार या हंसी-उल्लास आंगन के हों, छत के हों या बंद कमरों के हों, दूसरे घरों तक भी कुछ न कुछ पहुंचते ही थे। अब नहीं पहुंचते। इसका यह अर्थ नहीं कि फ्लैट होने ही नहीं चाहिए। ‘घर’ तो हर किस्म के हो सकते हैं। आंगन वाले, छोटे-बड़े, कॉटेजनुमा, बंगले, कोठियां, फ्लैट, झोपड़ियां। बात सिर्फ इतनी है कि घर, घर ही रहें, वे अन्याय और हिंसा की जगहें न बन जाएं। पर अब देखिए हिंसा चाहे ‘मेड’ के साथ हो या दहेज के लिए सताई जाने वाली ‘बहू’ के साथ या परिवार के किसी अन्य सदस्य के साथ, वह बढ़ती ही दिखाई पड़ रही है। अच्छे व्यवहार की भूख, परिवार के सदस्यों के साथ, कितनी स्वाभाविक है यह बताने की जरूरत नहीं है, पर उसमें कहीं-कहीं बेहद कमी आई है।

और अच्छा तो यह हो कि हम अच्छे व्यवहार पर ही न रुक जाएं। सद्भावना और सहानुभूति का दायरा कुछ और बढ़ाएं। ‘मेड’ प्रसंग में ही यह एक बात अच्छी भी लगती है कि अब कई परिवार चाहते हैं कि उनकी ‘मेड’ अच्छे कपड़े पहने, कुछ सजी-धजी लगे, और उससे बराबरी का एक व्यवहार भी किया जाए। मैं जहां रहता हूं, नोएडा में, वहां स्कूल में पढ़ने वाली एक किशोरी को देखा करता था, जिसे पहुंचाने के लिए उसी की उम्र की एक ‘मेड’ उस लड़की का बस्ता लेकर गेट तक जाती थी- उसे स्कूल की बस पकड़वाने के लिए। उस मेड के कपड़े अच्छे होते थे, उसे ठीकठाक खाने को मिल पा रहा है, यह उसका चेहरा बताता था। पर जाहिर है, वह स्वयं स्कूल नहीं जा पाती थी। उसे तो इस ड्यूटी के बाद घर के अन्य कामों पर भी लगना पड़ता था। काश, जहां वह काम करती थी या घर के सदस्य की तरह रहती थी, वह परिवार उसकी पढ़ाई की चिंता भी करता।कभी मृणाल सेन ने ‘खारिज’ नाम से एक फिल्म बनाई थी, जिसमें कोलकाता के एक मध्यवित्त परिवार के एक लड़के (नौकर) की दुखांत कथा थी। उस लड़के को खाना-पीना सब ठीकठाक मिल रहा था, पर ठंड में उसके रहने-सोने-बिछाने की अच्छी व्यवस्था नहीं सोची गई थी। एक रात वह मर जाता है।…जाहिर है, मध्यवित्त परिवार को इसका बड़ा पछतावा होता है। …पर चिड़िया खेत चुग चुकी थी।
पछताने से क्या होता है। पर नहीं, बहुत-कुछ होता है पछताने से भी, उस पछतावे की कमी भी तो दिखाई पड़ रही है। सो, पछतावा तो होना चाहिए, समाज को भी। वह होगा तो हिंसा में कमी निश्चय आएगी!

 

 

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