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दुनिया मेरे आगे- हर दिल जो प्यार करेगा

पड़ोस में रहने वाली लड़की टेनिस का अभ्यास कर रही थी। एक गेंद चारदिवारी के पार चली गई। फिर उसने कई गेंदें निकालीं।

Author August 28, 2017 6:33 AM
प्रतीकात्मक चित्र।

सत्यकाम

सुबह की सैर कर रहा था। पड़ोस में रहने वाली लड़की टेनिस का अभ्यास कर रही थी। एक गेंद चारदिवारी के पार चली गई। फिर उसने कई गेंदें निकालीं। मैदान में चारों ओर गेंदें छितरा गर्इं। मैं घूमते-घूमते उसकी ओर से गुजरने ही वाला था कि मेरे पैर ठिठक गए। वह शॉट लेने के लिए तैयार थी, लेकिन उसने मुझे ठिठकते हुए देख लिया। हाथ रोक लिया और स्मित इशारा किया, सादर कि आप निकल जाएं। मैं फुर्ती से निकला। तब लड़की ने शॉट लगाया और वह गेंद भी मैदान के एक कोने में जाकर वहीं थम गई, जहां जाकर उसकी ताकत चुक गई। इस संकेत में संवाद और संप्रेषण से मैं प्रफुल्लित हुआ और दिन भर इससे रोमांचित होता रहा। पूरे दिन न किसी पर गुस्सा आया, न किसी को कुपित नजर से देखा। मुस्कराता रहा, घर में भी और दफ्तर में भी!
क्या जीवन ऐसा हो सकता है? इस सोच ने दस्तक दी ही थी कि सोच का दूसरा पहलू धकिया कर अंदर घुस आया… जबरन! सृजनात्मकता को पंख देता। टेलीविजन या अन्य दृश्य माध्यम इसे निर्देशित करते हैं, बांधते हैं, कैद करते हैं और कई बार कुंद भी करते हैं, नकारात्मकता को बढ़ाते हैं। इसलिए आज फिर से किताबों की जरूरत आ पड़ी है। अब इसका एक वीभत्स रूप मेरे दिमाग ने सोचा, जो दिल्ली में आए दिन सड़कों पर होने वाले विवाद या ‘रोड रेज’ की घटनाओं से प्रेरित-परिचालित था कि अगर मैं वहां से जबर्दस्ती निकलने की कोशिश करता, लड़की भी ऐन वक्त पर शॉट लगाती, गेंद मुझे लगती, मैं उसे भला-बुरा कहता! वह रोती या फिर मुझसे झगड़ती! उसके माता-पिता आ जाते… पुलिस आ जाती…!

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ओह! मैंने क्या-क्या नहीं सोच लिया। यह दिमाग का बच्चा हमेशा नकारात्मकता की ओर क्यों ढलता है। जबकि सकारात्मकता की राह तो आसान भी होती है! सुखद और समीर के झोंकों से आप्लावित भी! तब हम क्यों नकारात्मक हो जाते हैं। खासतौर पर गाड़ी चलाते वक्त। गुस्सा नाक पर चढ़ा होता है… मैं भी गुस्सा होता हूं, पत्नी बरसती हैं! डर है उन्हें कि कोई अनहोनी न हो जाए! मैं सड़क पर होते अनाचार और अव्यवस्था को देख अपने आपको रोक नहीं पाता। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने क्रोध के कई रूपों की चर्चा की है, उसके एक रूप को सात्विक बताया है। लेकिन अब क्रोध की सात्विकता समाप्त हो चुकी है। अब वह तमस से भरा पड़ा है।हमारा ‘इग्नू’ रोड क्रोध पैदा करने के अवसर प्रदान करने में अव्वल है। ट्रैफिक के किसी नियम का पालन नहीं होता। दुकानों ने अतिक्रमण कर रखा है। बड़ी-बड़ी गाड़ियां सड़क पर पार्किंग के रूप में अवरोध बन कर खड़ी रहती हैं। ‘ग्रामीण सेवा’ कब कहां से अवतरित हो जाए और कब कहां प्रविष्ट हो जाए! लेकिन अगर आप उसमें बैठे हैं तो वह सबसे पहले आपको मेट्रो तक पहुंचाएगी। अब अगर हम ग्रामीण सेवा की सवारी कर रहे हैं तो वह हमारे लिए आनंददायक यात्रा होगी, चाहे दूसरों के लिए

जो हो। यानी हमारा नजरिया तुरंत बदल जाता है अपने स्वार्थ को लेकर। अगर हम रंचमात्र भी दूसरों के बारे में सोच लें, तो दुनिया न बदल जाए!
अखबार में पढ़ा कि एक पचासी वर्ष के व्यक्ति ने अपनी अस्सी वर्ष की पत्नी और छप्पन वर्ष के बेटे की हत्या करके खुद को फांसी पर चढ़ा लिया। इसका किसको क्या जवाब दिया जाए! चाहे सरेराह चलते हो, चाहे घर के भीतर, चाहे घर के बाहर, अगर थोड़ा-सा ‘स्पेस’ हम दे दें, थोड़ा-सा सकारात्मक हो जाएं तो सब कुछ अहो-अहो हो जाए!कहना आसान, करना मुश्किल। नकारात्मकता मनुष्य का स्वभाव है, सकारात्मकता ‘तपस्या’ से अर्जित की जाती है। भीष्म साहनी से एक बार मिलना हुआ था। उनके व्यक्तित्व में अथाह सकारात्मकता थी। जो भी पास जाता उसमें पूरा भीग के ही आता। इसीलिए मानवतावाद और मानववाद उनकी साहित्यिक संवेदना का परम लक्ष्य रहा। इसीलिए वे समाजवादी यथार्थवाद को भी कोई विचारधारा नहीं, बल्कि लेखकीय संवेदना का विस्तार मानते थे, जिसके केंद्र में था मनुष्य का हित और वह भी हाशिए पर खड़े व्यक्ति की रक्षा। इसी प्रकार के एक इंसान थे विष्णुकांत शास्त्री। उन्हें देखते ही एक दिव्य प्रभा शरीर में प्रवेश करने लगती थी। ये सब देव तुल्य थे। हर नेक इंसान के पास यह सकारात्मकता होती है।

पुस्तकें सकारात्मक सोच विकसित करने में मदद करती हैं। आज के नकारात्मक संसार में किताबों की जरूरत बढ़ती जा रही है। संचार के इलेक्ट्रॉनिक माध्यम नकारात्मकता को फैलाने की होड़ में लगे हैं। वहीं किताबें हमारे भीतर सकारात्मकता की अंत:सलिला बहाती रहती हैं। इसीलिए हमारा समाज जितना ज्यादा पुस्तकोन्मुख होगा, कला-उन्मुख होगा, उतना ही हमारा नुकसान कम होगा और हम मनुष्य बने रह सकेंगे। इस लिहाज से हमें किसी के भी ऐसे आह्वान का स्वागत करना चाहिए कि अब हमें स्वागत फूलों से नहीं, किताबों से करना चाहिए।

 

 

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