ताज़ा खबर
 

दुनिया मेरे आगे- अंतिम पायदान पर

इस बदलाव में अंतिम पायदान का वह व्यक्ति कहां है? हम सब आमतौर पर इस सवाल पर सोचने के लिए कभी फुर्सत नहीं निकाल पाते।

Author August 3, 2017 5:52 AM
प्रतीकात्मक चित्र।

जेपी चौधरी
यह अंतिम पायदान पर खड़ा व्यक्ति कौन है? क्या यह एक संवाद भर है? हम चांद पर बिछौना लेकर जा रहे हैं, बुलेट ट्रेन की बातें अब जमीन पर उतरने लगी हैं, एक्सप्रेस-वे जैसी सड़कों पर लड़ाकू विमान उतर रहे हैं, स्मार्टफोन के मामले में भारत दुनिया में पहले स्थान पर जा पहुंचा है, स्मार्ट सिटी की घोषित सूची लंबी होती जा रही है, भारत के सामरिक और आर्थिक महाशक्ति बनने की दुहाई दी जा रही है, हर तरफ विकास की गाथा सुनाई पड़ रही है, देश डिजिटल हो रहा है। लेकिन इस बदलाव में अंतिम पायदान का वह व्यक्ति कहां है? हम सब आमतौर पर इस सवाल पर सोचने के लिए कभी फुर्सत नहीं निकाल पाते।

जिस दिन भारत के चंद्रयान ने चांद की ऊंचाइयों को मापा था, उस दिन बेंगलुरु का अंतरिक्ष विज्ञान केंद्र वैज्ञानिकों की सफलता पर तालियों से गूंज रहा था और राजनेताओं द्वारा परस्पर बधाइयों का सिलसिला जारी था। बेशक ऐसे मौके बड़ी उपलब्धिां हैं और मैं भी खुशी और गौरव से सराबोर था। लेकिन इस महान उपलब्धि को मैं जिस टीवी चैनल पर आंखें गड़ाए देख रहा था, उसी पर आगे नीचे की पट्टी पर एक खबर चल रही थी- ‘सीवर में सफाई करते लोगों की मौत।’ ये दोनों खबरें विरोधाभासी थीं कि एक ओर हम चांद पर पहुंच चुके हैं, वहीं हमारे देश के ही कुछ लोग गटर में मर रहे हैं। क्या गटर में मरने वाला यह व्यक्ति ही अंतिम पायदान पर खड़ा व्यक्ति है?व्यवस्था में न्याय से वंचित, श्रम के बदले मजदूरी से वंचित, शिक्षा और स्वास्थ्य से बेखबर, सामाजिक और राजनीतिक रूप से हाशिये पर, रोजगार के नाम पर गांव या शहर में साफ-सफाई का काम करना, कहीं-कहीं मैला भी ढोना, कुपोषण से ग्रस्त, अत्याचार और शोषण का शिकार, मलिन बस्ती में बसेरा और आखिर मौत का ठिकाना गटर…! मैं यह कहना चाहता हूं कि यही अंतिम पायदान पर खड़ा व्यक्ति है और अपने हक और विकास की बाट जोह रहा है। भारतीय समाज में यह जाति बाकी सबके लिए ‘अछूत’ है। भारत पर राज करने वाले मुगल और अंग्रेज भी चले गए, लेकिन सफाईकर्मी जातियों के जीवन में कोई खास बदलाव नहीं आया।

HOT DEALS
  • Apple iPhone 7 128 GB Jet Black
    ₹ 52190 MRP ₹ 65200 -20%
    ₹1000 Cashback
  • Honor 9 Lite 64GB Glacier Grey
    ₹ 13975 MRP ₹ 16999 -18%
    ₹2000 Cashback

सवाल है कि हम चांद तक पहुंचने के लिए आधुनिक वैज्ञानिक उपकरण बना सकते हैं, लेकिन सीवर की सफाई के लिए आधुनिक मशीनें क्यों नहीं? आज दुनिया के उन देशों में भी सीवर की सफाई मशीनों या उपकरणों के जरिए की जाती है जो चांद और मंगल तक नहीं पहुंचे हैं और न ही कोई आर्थिक और सामरिक महाशक्ति हैं। हमारे वैज्ञानिक और राजनेता इन खबरों से जानबूझ कर अनजान बने हुए हैं। वे शायद नहीं चाहते कि सफाई-पेशा जातियां इस घृणित और अमानवीय पेशे से मुक्त हों। जाति से जुड़े पेशे की त्रासदी के बीच धर्म परिवर्तन के जरिए इन लोगों के जीवन में बदलाव की एक धुंधली-सी किरण अवश्य देखी जाती है, लेकिन पूर्व सामाजिक पहचान का दर्जा वहां भी इनका पीछा नहीं छोड़ता। इधर हिंदू धर्म में आस्था के बावजूद किसी हिंदू धार्मिक संगठन की ओर से कभी इनके विकास और अधिकारों की बात नहीं की जाती है, न ही आंबेडकर के नाम पर दलितों की राजनीति करने वाले इनकी जिंदगी में वास्तविक बदलाव के लिए कोई लड़ाई लड़ते हैं। दरअसल, सामाजिक न्याय की संकल्पना का पैमाना ये सफाई-पेशा जातियां ही हैं।

कई इलाकों में सिर पर मैला ढोने और गटर में उतरने की आज भी कायम हकीकत के सामने मानवता लाचार दिखती है। आए दिन सीवर में उतरे सफाईकर्मियों की मौत की खबरें आम हैं। मगर मानवाधिकार आयोग ने ऐसी घटनाओं पर शायद ही कभी स्वत: संज्ञान लिया हो या इस तरह की व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाई हो कि यह मानवीय गरिमा और अधिकारों के विरुद्ध है। अनुसूचित जातियों के दायरे में भी सबसे ज्यादा शोषित और निचले पायदान पर खड़े इस तबके के लिए मीडिया से लेकर बुद्धिजीवी तबके तक के बीच में कोई चिंता नहीं देखी जाती है। सफाई-पेशा जातियों का दोष शायद यह है कि चेतना के अभाव में उन्होंने अपनी सामाजिक स्थिति से उपजी त्रासदी के खिलाफ उतना मुखर होकर आवाज नहीं उठाई। जबकि यह हकीकत है कि समाज में वंचित तबकों के बीच जागरूक वर्गों ने अन्याय के खिलाफ मोर्चा खोला तो उन्हें कुछ अधिकार मिले।हालांकि धीरे-धीरे ही सही, आज हालात बदल रहे हैं और बाबा साहब डॉ भीमराव आंबेडकर के विचारों को आत्मसात करते हुए इन जतियों के बीच भी शिक्षा और चेतना का प्रसार हो रहा है। सामाजिक और राजनीतिक समझ रखने वाले तमाम लोग आज सामने आ रहे हैं, लेकिन उनके लिए राजनीतिक दलों से लेकर सरकारी तंत्र तक में वाजिब अवसर नहीं मिल पा रहा है। मगर यह ध्यान रखना चाहिए कि अगर हमारे समाज का कोई हिस्सा मानवीय गरिमा के हक से वंचित हाशिये पर खड़ा है तो हम एक न्याय आधारित समाज होने का दावा नहीं कर सकते!

 

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App