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तकनीक की सीमा

दोस्त झुंझलाता-सा दफ्तर में दाखिल हुआ और हताशा से फट पड़ा- ‘यह बैंक है या आफत! पिछले तीन घंटे में तीसरी बार बैंक का चक्कर लगा चुका हूं, लेकिन वहां कर्मचारी बोलता है..

Author नई दिल्ली | October 27, 2015 5:49 PM

दोस्त झुंझलाता-सा दफ्तर में दाखिल हुआ और हताशा से फट पड़ा- ‘यह बैंक है या आफत! पिछले तीन घंटे में तीसरी बार बैंक का चक्कर लगा चुका हूं, लेकिन वहां कर्मचारी बोलता है कि सर्वर डाउन है, कंप्यूटर नहीं चल रहा। अगर आज एकाउंट में पैसे नहीं जमा कराए तो घर की खातिर लिए गए कर्ज की किस्त भरने की तारीख निकल जाएगी और मुझे जुर्माना भरना पड़ेगा। प्राइवेट बैंक का कर्ज है। एक किस्त नहीं जमा करने पर लगातार फोन आएंगे, सो अलग।’ मैंने उसे शांत किया और कहा कि देखते हैं, क्या उपाय हो सकता है।

मैं दोस्त की दिक्कत समझ रहा था। उसकी शिकायत वाजिब थी। उसे उस दिन एक जरूरी रिपोर्ट अपने अखबार में देनी थी। छुट्टी ले नहीं सकता था, सो दफ्तर आते ही उसने सोचा कि पहले बैंक का काम निपटा लिया जाए। कुछ देर में आने की बात कह वह बैंक खुलते ही दफ्तर से निकल गया। वहां काफी लोगों की भीड़ जमा हो गई थी। बताया गया कि सर्वर डाउन होने के चलते कंप्यूटर नहीं चल रहे हैं, इसलिए कोई भी काम नहीं होगा। उधर बैंककर्मी आराम से बातचीत करने में मगन थे और इधर लंबी लाइन में लगे ग्राहक पस्त थे। कई लोगों के चेहरे पर परेशानी साफ दिख रही थी। कोई भी काम नहीं हो रहा था। आखिर दोस्त लौट आया। कुछ देर काम करने के बाद वह इस उम्मीद में फिर बैंक गया कि शायद अब सर्वर ठीक हो गया होगा। लेकिन इस बार हालत पहले से बदतर थी। बैंक लोगों से खचाखच भर गया था। तीन बार बैंक के चक्कर लगाने पर भी काम नहीं हुआ तो उसकी उम्मीद टूटने लगी।

लेकिन इस तरह की दिक्कत केवल दोस्त के साथ नहीं हुई। यह समस्या आम है। हाल ही में मैं भी इससे दो-चार हुआ। बच्चों की स्कूल फीस जिस बैंक में जमा होती है, वह घर से दो किलोमीटर की दूरी पर है। ब्रांच में आमतौर पर मैं ‘ड्रॉप बॉक्स’ में चेक डाल कर लौट आता हूं। उस दिन गया तो बैंक में जबर्दस्त भीड़ थी। वहां एक परिचित मिल गए। उन्होंने बताया कि आज सर्वर डाउन होने की वजह से काम नहीं हो पा रहा है।

सवाल है कि अगर सारा काम कंप्यूटर और इंटरनेट पर निर्भर है तो ये लोग अपना पूरा तंत्र दुरुस्त क्यों नहीं रखते या फिर विकल्प के तौर पर मैनुअली काम करने की व्यवस्था क्यों नहीं रखते! मैंने जैसे ही उनके सामने यह बात रखी तो वे उबल पड़े- ‘इन्हें तो काम से बचने का मौका चाहिए! अगर सर्वर डाउन होता है तो इनकी बांछें खिल जाती हैं। इन्हें काम नहीं करना पड़ता। अगर ये चाहें तो लोगों के पैसे का लेन-देन करके रसीद या पर्ची मुहर लगा कर दे दें और जब सर्वर ठीक से काम करने लगे तो सबके खाते में दर्ज कर लें। लेकिन यह उपाय शायद इन्हें सूझता या फिर ये जानबूझ कर ऐसा नहीं करते।’ उनकी बात में दम था। उन्होंने वहां मौजूद कई कर्मचारियों से यह कहा भी। लेकिन उनकी सुनने वाला कोई नहीं था। लोग अपना काम होने के इंतजार में बेहाल खड़े थे। उधर बैंककर्मी एक केबिन में घेरा बना कर बैठे हंसी-ठहाके लगा रहे थे। कुछ कर्मचारी अपने स्मार्टफोन में उंगलियां घिस रहे थे तो कुछ बैठे ऊंघ रहे थे।

एक नौजवान बैंककर्मी उनके गोल से अलग एक तरफ खाली बैठा था। मैंने उससे पूछा कि अगर सर्वर अक्सर धोखा दे जाता है तो दूसरा उपाय क्यों नहीं किया जाता! उसने कहा- ‘कई बार ऊपर के अधिकारियों से शिकायत की है, लेकिन अभी तक कोई समाधान नहीं निकला।’ एक तरफ सरकार ‘डिजिटल इंडिया’ का नारा देती है और अभी बैंकों तक में कंप्यूटर और इंटरनेट पर निर्भर काम में लगातार बाधा आती रहती है। जबकि अमूमन सभी बैंकों के कामकाज का डिजिटलीकरण हो चुका है।

वैकल्पिक उपाय के तौर पर बुनियादी सुविधा भी अभी बहुत सारे बैंकों में नहीं हैं। कंप्यूटर और इंटरनेट दिखाने के लिए हैं, लेकिन उसकी गति इतनी धीमी है कि सामान्य स्थितियों में जो काम दस मिनट में होना चाहिए, वह आधे घंटे में होता है। इसके अलावा, जैसे ही सर्वर डाउन हो जाता है, लोग परेशान होने लगते हैं। मैंने उस युवक से कहा कि आप लोगों को इसका कोई समाधान निकालना चाहिए। उसने मुझसे पीछा छुड़ाने के लहजे में जवाब दिया कि इसके लिए मुझे ब्रांच मैनेजर से बात करनी चाहिए। उधर ब्रांच मैनेजर कमरे में किसी से बातचीत में व्यस्त थे और हंसी-मजाक का दौर चल रहा था। मैं ‘डिजिटल इंडिया’ और ‘स्किल इंडिया’ के नारे को याद कर रहा था।

(नवीन पाल)

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