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दुनिया मेरे आगेः द्वंद्व की दीवारें

‘अचानक’ एक अजीब शब्द है! अक्सर जो घटनाएं हमें अचानक लग रही होती हैं, कोई और उन घटनाओं को अंजाम देने के लिए पूरी सतर्कता से योजना बना चुका होता है।

Author February 3, 2016 3:19 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

‘अचानक’ एक अजीब शब्द है! अक्सर जो घटनाएं हमें अचानक लग रही होती हैं, कोई और उन घटनाओं को अंजाम देने के लिए पूरी सतर्कता से योजना बना चुका होता है। कितने ही विचार उस अचानक लगने वाले क्षण को पूरी तरह सोचे-समझे विचार के रूप में योजित कर चुके होते हैं। ठीक वैसे ही, जैसे किसी के आने के सारे हालात मुझे ‘अचानक’ लग रहे थे, जबकि यह पहले से तय था। घटनाएं चाहे तय हों या फिर अचानक, हो गर्इं तो हो गर्इं! फिर ये मुझे इस तरह से प्रभावित क्यों कर रही हैं?

इससे एक चीज तो यह समझ आ रही है कि द्वंद्व या पीड़ा सहमति या असहमति पर निर्भर नहीं करते हैं। ये लगातार घटित होते रहते हैं, अलग-अलग रूप में। सामान्य-सी लगने वाली एक घटना मुझे सामान्य क्यों नहीं लग रही है! पता नहीं, यह सब क्यों मेरे लिए कष्टसाध्य द्वंद्व का विषय बना हुआ है! दरअसल, एक पुरुष दोस्त मुझे देर रात घर छोड़ने आए। क्या यह वाकई एक मामूली बात है, या फिर सदियों से चली आ रही मान्यताओं और रूढ़ियों को तोड़ने वाली अहम घटना है? मुझे याद है कि अब से पंद्रह वर्ष पहले हम दिल्ली के अपने नए घर में आए थे और इसी दौरान मेरा दाखिला भी नए स्कूल में कराया गया था।

मैं छठी कक्षा में आ चुकी थी और मां की नजरों में बड़ी हो चुकी थी। मैं बारह वर्ष की एक बच्ची थी जो किशोरावस्था में कदम रख रही थी। मां उस दौरान अक्सर समझाती थी कि अब मैं बड़ी हो चुकी हूं और मुझे गली के लड़कों से बात नहीं करनी चाहिए और न ही उनके साथ खेलना चाहिए। ऐसा करने वाली लड़कियां ‘अच्छी’ नहीं होतीं और न समाज में उन्हें कोई ‘अच्छा’ मानता है! मां की वह सीख मेरे मन में इस कदर छप गई कि बीस साल की उम्र तक मेरे लिए पुरुषों से बात करने का मतलब पिता, भाई और किसी रिश्तेदार से बात करना होता था। मैं अक्सर सोचती थी कि मेरी बाकी सहेलियां कैसे अपने पुरुष मित्रों से बात करती हैं! क्या इन्हें डर नहीं लगता कि सब क्या सोचेंगे? और मेरे लिए यह एक समझ बन चुकी थी कि जो लड़कियां पढ़ती-लिखती नहीं, वे लड़कों से बात करती हैं।

हमारे परिवार में लड़कियों को ज्यादा पढ़ाया-लिखाया भी नहीं जाता था, क्योंकि परिवार में सामूहिक रूप से यह धारणा बनी हुई थी कि लड़कियों को ज्यादा पढ़ाने-लिखाने और घर से बाहर कहीं दूर कॉलेज भेजने का मतलब है उन्हें ‘बिगड़ने’ की दिशा में अग्रसर कर देना। लेकिन मैं बहुत पढ़ना चाहती थी, क्योंकि मां की तरह अपना सारा जीवन घर के भीतर नहीं बिताना चाहती थी। मैं अपनी एक पहचान बनाना चाहती थी, खुले आसमान में उड़ना चाहती थी, इसलिए कभी भी अपना समय घूमने-फिरने में नहीं बिताया। खासकर पुरुषों से एक दूरी बनाए रखी। कॉलेज तक में अव्वल रही, लेकिन मानव जाति के इस दूसरे रूप को कभी मित्र रूप में समझ नहीं पाई। दो साल पहले जब मैंने दिल्ली विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर की पढ़ाई करने के लिए दाखिला लिया तो पहली बार इस दूसरे मानवीय जाति के प्राणी से मेरा सरोकार हुआ जहां मैंने उनसे पहली बार मित्रता का भाव महसूस किया। मैंने जाना कि अगर मैं पुरुष मित्रों से बात करूंगी तो परीक्षाओं में फेल नहीं होऊंगी और न ही ‘चरित्रहीन’ कही जाऊंगी। मैंने खुद तो यह जान लिया, लेकिन आज भी अपने परिवार और माता-पिता को इस लिंग भेद के प्रति संवेदनशील और जागरूक करना मेरे लिए चुनौतीपूर्ण और द्वंद्वात्मक है।

यही वजह है कि जब पुरुष मित्र घर तक छोड़ने आए, तो इसे मैंने समाज और परिवार की रूढ़ मान्यताओं पर चोट की तरह देखा। यह चोट अहसास है मेरे भीतर की मुक्ति और बाहर बंधनों के टूटने का। यह टूटना एक ऐसी प्रक्रिया है जो जिस चीज के साथ घटित होती है, उसे बिखेर देती है। बिखेर नहीं भी पाए तो कम से कम उसमें दरारें तो डाल ही देती है। मुझे सिमोन द बोउवार की लिखी ‘स्त्री उपेक्षिता’ की पंक्तियां याद आती हैं- ‘स्त्री पैदा नहीं होती, वह बनाई जाती है।’ क्या मेरे मन का यह द्वंद्व मेरे भीतर की बनी-बनाई उस स्त्री के टूटने का ही प्रतीक है? क्या मेरे भीतर निर्मित स्त्री की संरचना में दरार आ रही है? कहीं यह द्वंद्व इन दरारों का ही तो प्रतीक नहीं है? मैं सोच पा रही हूं खुद को एक ऐसी चेतना की तरह, जो दरारों से इस प्रकार विभाजित हुई है कि जिंदगी की घटनाएं उसमें बंट गई हैं। ऐसा लगता है कि मेरे कई हिस्से हो गए हैं और दूर कहीं शून्य में खड़ी मैं उन हिस्सों को पहचानने की कोशिश कर रही हूं। कुछ धुंधला-सा दिखता है! मैं महसूस कर पा रही हूं इस धुंधलके में मुक्ति के अहसास को!

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