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दुनिया मेरे आगेः दमित अस्मिता

‘मुक्ति कभी उपहार में नहीं मिलती, उसके लिए संघर्ष करना पड़ता है।’ पाउलो फ्रेरे की यह उक्ति खासतौर पर महिलाओं के अपने अधिकारों के लिए संघर्ष के आलोक में ज्यादा सही लगती है, जिसमें आज अपनी अस्मिता के लिए आवाज उठाना तक एक स्त्री के लिए खासा संघर्षमय बना हुआ है।

Author March 9, 2016 2:48 AM
पाउलो फ्रेरे

‘मुक्ति कभी उपहार में नहीं मिलती, उसके लिए संघर्ष करना पड़ता है।’ पाउलो फ्रेरे की यह उक्ति खासतौर पर महिलाओं के अपने अधिकारों के लिए संघर्ष के आलोक में ज्यादा सही लगती है, जिसमें आज अपनी अस्मिता के लिए आवाज उठाना तक एक स्त्री के लिए खासा संघर्षमय बना हुआ है। हाल ही में एक खबर आई कि दिल्ली के आनंद विहार इलाके में खाने का सामान खरीद कर घर लौट रही एक युवती को कुछ लोगों ने कार में खींच लिया। उसे मारा-पीटा, फिर सामूहिक बलात्कार के बाद चलती कार से एक सुनसान जगह पर फेंक दिया। एक और खबर यह थी कि एक दलित लड़की का सामूहिक बलात्कार कर उसे जिंदा जला दिया गया।

जब से मैंने यह खबर पढ़ी, मन में दबा एक खौफ फिर उभर आया है। लग रहा है कि अगले हादसे का शिकार कहीं मैं तो नहीं होऊंगी! कुछ दिन पहले जब कॉलेज जाने के लिए शेयरिंग यानी अलग-अलग कई लोगों को बिठा कर गंतव्य तक पहुंचाने वाले आॅटो में बैठी तो मजबूत कद-काठी का और एक अज्ञात भय पैदा करता व्यक्ति भी मेरे बगल में बैठा। उसका बैठना मेरी तरह नहीं था। उसमें एक अजीब-सा ‘अधिकार भाव’ था। आॅटो में एक महिला अपने बच्चे के साथ पहले से बैठी थी। खैर, वह पुरुष जिस प्रकार खुद को फैला कर उसमें मौजूद जगह से कुछ ज्यादा ही घेरते हुए बैठा, वह मेरे लिए मजबूरन खुद को सिकोड़ने कारण बन गया। लगातार यह बेचैनी हो रही थी कि इस पुरुष को थोड़ा सिकुड़ कर बैठना चाहिए, क्योंकि इसके चौड़ा होकर बैठने से मैं बहुत दमित महसूस कर रही थी।

लेकिन पहले से बना हुआ खौफ इस कदर हावी हुआ कि मेरी आवाज कहीं दब गई। मेरी चेतना लगातार मुझे कह रही थी कि यह ठीक नहीं है… इस आदमी ने मेरा भी स्थान घेरा हुआ है और मुझे बोलना चाहिए। लेकिन मैं कुछ कह नहीं पा रही थी! लगभग आधा रास्ता निकल जाने के बाद अपने डर और गुस्से पर मैंने थोड़ा काबू किया और विनम्र भाव से उससे कहा कि आप थोड़ा सिकुड़ कर बैठिए… मुझे बहुत दिक्कत हो रही है! इस पर उसने कड़क आवाज में अधिकार जताने के अंदाज में कहा- ‘और कितना सिकुड़ कर बैठूं!’ हालांकि यह कहने के बाद उसने खुद को थोड़ा संभाला और अपने एक कंधे का बोझ मेरे कंधे से हटा लिया।

कोई इन्हें मामूली घटनाएं कह सकता है। मगर ये मेरे दिमाग से निकल नहीं रही हैं और रह-रह कर खुद के कमजोर और असुरक्षित होने का बोध मन को बेचैन कर रहा है। दिल्ली कितनी असहज, असुरक्षित और भय का शहर हो गई है महिलाओं के लिए! यहां एक महिला की ‘सशक्त आवाज’ भी लगातार एक भय के चलते दबती जा रही है। यह दबाव रोज अखबारों की इन खौफ पैदा करती सुर्खियों से इतना बढ़ता जा रहा है कि हम खुद भी अपनी आवाज को नहीं सुन पा रहे हैं! समाज के उस वर्ग की सोच को लेकर गहरी चिंता यह है कि जो लोग बलात्कार के बाद महिलाओं को कहीं भी फेंक देते हैं या जिंदा जला देते हैं, उनके अस्तित्व को बर्बर तरीके से नष्ट कर देते हैं, वे मानवीय संवेदना और दिमागी विकास के किस चरण पर ठहरे रह गए! उनकी इस हालत की मार महिलाएं क्यों झेलें?

हमारे समाज में दिनोंदिन बढ़ती अमानवीयता और यौन हिंसा एक प्रकार का सोच-समझा और गढ़ा हुआ प्रपंच लगता है! यह समाज संकीर्ण विचारधारा के लोगों द्वारा गढ़ा गया है, जो महिलाओं को केवल उपभोग और देह प्रदर्शन की वस्तु समझते हैं। वे इसी यथास्थिति को कायम रखना चाहते हैं। इस सबके पीछे केवल कुछ लोग जिम्मेदार नहीं हैं, बल्कि वैश्विक स्तर पर एक बड़ा उद्यमी जगत है, जो सूचना और तकनीक के जरिए रोज विज्ञापनों और सिनेमा के जरिए वस्तु के रूप में महिलाओं की चेतनाहीन और नग्न तस्वीरें परोस रहा है।
नव पूंजीवादी और नवउदारवादी व्यवस्था में विश्व एक बाजार बन गया है और लोग मुनाफा कमाने का जरिया। इस बाजार में भी सबसे ज्यादा मुनाफा कमाने की वस्तु की तरह महिलाओं को देखा जाता है। इस तरह की मानसिकता का प्रतिबिंब आमतौर पर रंगीन विज्ञापनों और अश्लील फिल्मों में देखा जा सकता है। महिलाओं के विरुद्ध लगातार बढ़ती यौन हिंसा, तमाम तरह की वर्चस्वशाली शक्तियों की उस मानसिकता का चित्रण है, जहां महिलाओं के मन में लगातार यह डर पैदा करने की कोशिश की जा रही है कि वे अपनी आवाज भी नहीं सुन सकें।
एक मित्र ने कहा कि यह सारा प्रपंच महिलाओं को अपनी ताकत न पहचानने देने के लिए किया जा रहा है, ताकि वह अपनी ही ताकत और आवाज को उठाने की हिम्मत न जुटा पाए। इस तरह, स्त्री की अस्मिता के हनन का यह नया पूंजीवादी और आधुनिक विचार है, जहां महिलाओं का सम्मान, अस्मिता और ताकत सब पैसे और लाभ की मोहताज बन कर रह गई है!

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