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आभासी दुनिया के लोग

अब आभासी दुनिया में विचरण करने वाले बच्चे हैं। कायदे के खाते-पीते घरों में कंचे खेलने वाले, धूल से लिपटे, कीचड़-पानी में सने बच्चे नहीं दिखते अब।

Author February 1, 2016 2:08 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

अब आभासी दुनिया में विचरण करने वाले बच्चे हैं। कायदे के खाते-पीते घरों में कंचे खेलने वाले, धूल से लिपटे, कीचड़-पानी में सने बच्चे नहीं दिखते अब। इनके अपने कमरे हैं, अपना जंक फूड और अपने पसंदीदा कार्यक्रम, अपने ऐप्स। जब टीवी नहीं चलता, तब मोबाइल और पैड्स होते हैं, गेम्स होते हैं। इनका सब कुछ छोटी या बड़ी स्क्रीन पर होता है और वास्तविक दुनिया इन्हें धीरे-धीरे झूठी लगने लगती है।
हर महीने नई टेक्नॉलजी वाले फोन, नए लैपीज, नए ऐप्स का इंतजार रहता है। विडंबना देखिए, जिन्होंने यह बाजार सजाया है वे इनके खतरों के प्रति खूब सजग हैं। स्टीव जॉब्स ने न्यूयॉर्क टाइम्स के रिपोर्टर निक बिल्टन से एक बातचीत में कहा था, ‘मेरे बच्चों ने आई-पैड का इस्तेमाल नहीं किया।

हम घर में बच्चों को एक सीमा तक ही टेक्नोलॉजी का उपयोग करने देते हैं।’ थ्री-डी रोबोटिक्स के प्रमुख क्रिस एंडरसन ने ‘द टाइम्स’ से एक इंटरव्यू में कहा, ‘मेरे बच्चे और बीवी मुझे फासिस्ट कहते हैं और कहते हैं कि उनके दोस्तों में से किसी के घर में ये नियम लागू नहीं होते। पर मैंने तो साफ-साफ, प्रत्यक्ष रूप से टेक्नोलॉजी के खतरे देखे हैं। मैं नहीं चाहता कि मेरे बच्चों के साथ वही हो, जो मेरे साथ हुआ है।’ सिलिकॉन वैली में भी ऐसा एक वर्ग है, जो अपने बच्चों को लॉस अल्टॉस जैसे स्कूलों में भेजता है, जहां कंप्यूटर ही नहीं हैं। जहां प्रत्यक्ष रिश्तों के जरिए सीखने पर जोर दिया जाता है।

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अल्बर्ट आइन्स्टाइन ने कहा था, ‘मुझे भय है एक दिन ऐसा आएगा जब टेक्नोलॉजी मानवीय संबंधों की जगह ले लेगी और तब दुनिया में होगी मूर्खों की एक पीढ़ी।’ अभी जो हालात हैं और जिस तरह बच्चे और बड़े दो-तीन फोन और लैपटॉप से लदे-फदे घूमते दिखाई देते हैं, ऐसा लगता है कि हम मूढ़ता के अलावा बहुत अधूरे, प्यासे, बेचैन, अधैर्य भरे जीवन की तरफ बढ़ रहे हैं।

लोगों में आत्ममुग्धता का भाव गहरा होता गया है। फेसबुक जैसे सोशल मीडिया की लोकप्रियता के पीछे यह एक बड़ी वजह है कि यह लोगों को अपनी आत्ममुग्धता में लोटने का मौका देता है। फेसबुक को मास्क बुक भी कहा जा सकता है, क्योंकि लोगों की कोशिश यही रहती है कि वे जैसे हैं, उससे ज्यादा खूबसूरत, ज्यादा बुद्धिमान दिखें। मुखौटा पहनने का मौका भी फेसबुक खूब देता है। ऐसे में झूठी पहचान से अपराध होते रहते हैं फेसबुक के जरिए। लोग मुखौटों के पीछे अपनी असली पहचान छिपा कर आते हैं और प्रेम के भूखे, अंतरंगता की तलाश में लोग उनके शिकार भी हो जाते हैं।
पर एक सकारात्मक बात भी है- कोई चाहे तो फेसबुक जैसे मंच आत्मबोध या खुद को जानने-समझने का अच्छा अवसर देते हैं। गौर से देखें, कैसे मित्रों के लाइक्स अहंकार की मालिश करते हैं। कैसे उनकी उदासीनता अहंकार की हवा निकाल देती है। कइयों को दिन में कई बार अलग-अलग कोण से सेल्फी पोस्ट करते देखता हंू। सेल्फी लेने की दीवानगी ने एक नई ‘सेल्फिश’ पीढ़ी को जन्म दिया है। लोगों की तस्वीरें लाइक न करें, तो रात को सोने से पहले कैसा बवंडर उठता है उनकी चेतना में, उसकी पड़ताल का बढ़िया मौका है फेसबुक।

कवियों-लेखकों के लिए तो यह बहुत अच्छा अवसर है। विचारों से सहमत न होने वालों के प्रति उठने वाली प्रतिक्रियाओं का बवंडर दिखाएगा कि मुझे अपने विचारों से कितना लगाव है, भले ही वे कितने ही बेतुके हों। हम चाहें तो हर रिश्ता एक आईना बन सकता है। इसका और भी सकारात्मक पहलू है। मसलन, आपको पूरी दुनिया में समान सोच-विचार वाले लोगों के साथ जुड़ने का मौका देता है। कभी-कभी लोग गंभीर संवाद करते भी दिख जाते हैं। फेसबुक ने, भले ही छिछले तौर पर ही सही, लोगों को कुछ पढ़ने के लिए प्रेरित किया है। अतीत में दफ्न कई लोगों को फेसबुक के दीवाने खोद-खोद कर निकाल लाते हैं, तो एक तरह से उनका पुनर्जन्म हो जाता है।

हां, राजा डरता है फेसबुक से। प्रजा बेखौफ हुई जा रही है। कोई अंकुश नहीं उस पर। सोशल मीडिया में कोई बॉस नहीं, आप खुद अपना सेंसर बोर्ड हैं। ऐसे में लोग खुल कर अपनी बात कहते हैं और राजा को खुली जुबान का डर होता है। बाकी मीडिया को तो खरीद-बेच सकता है राजा, पर हर इंसान की जुबान को कैसे खरीदेगा?
मोबाइल आपकी जेब में है, कंप्यूटर घर-दफ्तर में। पूरा खेल आपके हाथ में है। आप पूरा दिन सोशल चिट-चैट में बिताएं, कोई गंभीर बातचीत करें या आत्मज्ञान लें, सब आप पर है। चाकू की धार की तरह है इंटरनेट और सोशल मीडिया। आप फल काट कर खाएं, अपना स्वास्थ्य सुधारें या फिर अपनी अंगुली जख्मी कर लें, अपने निजी रिश्तों को जख्मी बनाएं, आपकी समझ-बूझ पर है।

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