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दुनिया मेरे आगे: रटना बनाम जानना

हमारे यहां बच्चों के पाठ्यक्रम पर चिंतन बहुत कम होता है। इसीलिए कई दशकों से बच्चे एक तरह की ही अंग्रेजी और हिंदी कविता पढ़ते आ रहे हैं।

Author January 3, 2017 12:40 AM
हमारे बच्चों के पाठ्यक्रम पर चिंतन बहुत कम होता है।

यह अक्सर देखने और सुनने को मिलता है कि जब कभी हम अपने बच्चों को किसी बड़े व्यक्ति से मिलवाते हैं तो यह कहते हैं कि बेटा… जरा राइम सुनाना। ‘राइम’ यानी अंग्रेजी में कविता। शायद हम लोगों से बच्चों को मिलवाने का अब तक और कोई नया तरीका नहीं ढूंढ़ पाए हैं। यह भी बहुत कम सुनने को मिलता है कि कोई अपने बच्चे को कविता यानी हिंदी में कोई रचना सुनाने के लिए कहता हो, खासकर शहरों में। खैर, यह तो भाषाई द्वंद्व है। ‘राइम्स’ के नाम पर हमारे बच्चे क्या सीखते हैं, इस पर ध्यान कम दिया जाता है। चिंता केवल इस बात की होती है कि बच्चे ने राइम्स रट लिया कि नहीं। स्कूल के पाठ्यक्रम में शामिल ज्यादातर राइम्स यूरोपीय देशों या अमेरिका से आयात किए गए हैं। इंटरनेट ने राइम्स की उपलब्धता को और आसान कर दिया है। ‘रेन-रेन गो अवे, कम अगेन अनदर डे’ जैसे राइम केवल रटाए जाते हैं। इसका मतलब शायद ही किसी बच्चे को बताया जाता है। मैंने भी बचपन में न जाने कितने राइम्स को बिना मतलब समझे रट लिया था।

यों ‘रेन-रेन गो अवे, कम अगेन अनदर डे’ जैसे राइम पर कई बार चर्चा हुई है कि यह इंग्लैंड के संदर्भ में लिखा गया हैं जहां वर्षा ज्यादा होती है। इसलिए बच्चे वर्षा को रुकने के लिए कह रहे हैं, ताकि वे बाहर खेल सकें। लेकिन भारत में बारिश का तो हमेशा स्वागत किया जाता है। भारत के संदर्भ में इस राइम की कोई सार्थकता नहीं है। इसी कड़ी में एक राइम की चर्चा जरूरी है जो आजकल काफी प्रचलित है- ‘हॉट क्रॉस बन्स, हॉट क्रॉस बन्स / वन अ पेनी, टू अ पेनी / हॉट क्रॉस बन्स / इफ यू हैव नो डॉटर, गिव देम टू योर सन्स..!’ पांच साल की आन्या इसे टाटा स्काइ के सक्रिय चैनल पर अक्सर सुनती है। अब इसके पाठ्यक्रम में भी यह राइम पढ़ाया जाता है। एक बार एक व्यक्ति ने ट्रेन में अपने मोबाइल से आन्या को यही राइम सुनाया था। औरों की तरह आन्या ने भी इस राइम को रट लिया है, बिना इसका अर्थ समझे।

जब मेरा ध्यान इस कविता पर गया और इसका मतलब जानने की कोशिश की तो पता चला कि चंद लाइनों में सुनाई जाने वाली यह कविता दरअसल अधूरी बोली जाती है। इसकी सिर्फ कुछ लाइनें बच्चों को रटाई जाती हैं और यह अधूरी कविता लोगों को गलत संदेश दे रही है, जिसमें कहा जाता है कि अगर घर में बेटी नहीं है तो आप अपने बेटे को पैसे दीजिए, ताकि वह बाहर से गर्म रोटी खरीद सके। जबकि पूरी कविता में ये लाइनें इस तरह हैं- ‘इफ यू हैव नो डॉटर / इफ यू हैव नो सन्स / वन अ पेनी, टू अ पेनी / हॉट क्रॉस बन्स…!’ इसमें और भी कई लाइनें हैं। इस तरह से यह अधूरी कविता लिंगभेद को बढ़ावा देती है और लड़कियों के बारे में एक रूढ़िवादी सोच को चित्रित करती है। पूरी कविता का मतलब यह कतई नहीं है और यह कहीं भी लिंग भेदभाव को नहीं बढ़ाती है। हालांकि गनीमत यही है कि इस कविता को सुनाने वाले ज्यादातर बच्चे किताबों में प्रकाशित इस अधूरी कविता का अर्थ नहीं समझते हैं, वरना बच्चों के दिमाग को प्रदूषित होने से कोई नहीं रोक सकता।

हमारे यहां बच्चों के पाठ्यक्रम पर चिंतन बहुत कम होता है। इसीलिए कई दशकों से बच्चे एक तरह की ही अंग्रेजी और हिंदी कविता पढ़ते आ रहे हैं। दरअसल राइम्स और कविता लिखने के काम को हम गैरउत्पादकता की श्रेणी में रखते हैं। ज्यादातर निजी स्कूलों में हर नए सत्र में किताबें बदल दी जाती हैं। किताब बदलने का सीधा संबंध बाजार के दबाव से होता है। जो प्रकाशक ज्यादा से ज्यादा कमीशन देता है उसकी किताबें स्कूल के पाठ्यक्रम में शामिल की जती हैं, किताबों में छपी सामाग्री से कोई लेना-देना नहीं होता है।यह एक गंभीर प्रश्न है। सरकार और स्कूल की जिम्मेदारी होनी चाहिए कि निजी प्रकाशकों की ओर से छापी गई सामग्री को सोच-समझ पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए। घर के सदस्यों की भी जिम्मेवारी बनती है कि इस बात का ध्यान रखें कि अपने बच्चों को क्या सिखा रहे हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि हम आधुनिकता की चादर में अंग्रेजी के नाम पर बच्चों को गलत संदेश दे रहे हों। इस पर गंभीरतापूर्वक विचार करने की जरूरत है। अंग्रेजी की कविताएं तो पूरे पाठ्यक्रम का एक हिस्सा भर हैं। यहां तो बच्चों के पूरे पाठ्यक्रम की समीक्षा जरूरी है, अन्यथा समाज में तरह-तरह की विसंगतियां पैदा होती रहेंगी।

 

 

 

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