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दुनिया मेरे आगे: बाजार के पांव

धूल-धक्कड़ भरे बाजार के वे दिन आज भी याद आते हैं। तिरपाल के भीतर बनी वे अस्थायी दुकानें और दूरदराज गांवों से आए वे लोग। घर के सामने खड़ी बैलगाड़ियां और खाना पकाते वे ग्रामीण व्यापारी।

Author October 25, 2018 2:20 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

गांव में था तो बाजार को पहले कभी इतनी गंभीरता से नहीं लिया। हर इतवार यानी रविवार को बाजार लगता था। यों तो लगभग सातों दिन कहीं न कहीं वह बाजार लगता था, पर वे जगहें मेरे गांव से दूर-दूर होती थीं। जो सबसे पास था, वहां इतवार को ही बाजार लगता था। उस दिन के लिए हम सोमवार से ही इंतजार करते थे। वजह यह थी कि उस इतवार की सुबह सभी को हाथ खर्चे के लिए इकन्नी मिलती थी। दरअसल, इकन्नी के लिए इंतजार होता था और बाजार तो जैसे आंखों में बसा था। कहां छन्नूलाल की दुकान लगेगी और कहां माणिक लाल की, सब पता था। और यह भी मालूम था कि उनके पास कौन-कौन सामान होगा और इकन्नी की कीमत में बाजार में क्या-क्या मिलेगा। इकन्नी मिलते ही सभी भाई-बहन तय कर लेते थे कि इस हफ्ते किसको क्या खरीदना है और किस-किस की दुकान में जाना है। उन दुकानों पर सबसे आखिर में जाते थे। वजह यह कि दोपहर के भोजन के बाद बाजार की तरफ निकलते थे और शाम तक वहीं टहलते रहते। बाजार में नई-नई दुकानें खोजते रहते। कौन-कौन सा नया सामान बाजार में आया है और उसकी कीमत क्या है, इस सब का लेखा-जोखा दादी को बताते, क्योंकि पैसे वही देती थीं।

धूल-धक्कड़ भरे बाजार के वे दिन आज भी याद आते हैं। तिरपाल के भीतर बनी वे अस्थायी दुकानें और दूरदराज गांवों से आए वे लोग। घर के सामने खड़ी बैलगाड़ियां और खाना पकाते वे ग्रामीण व्यापारी। कभी किसी को बर्तन वगैरह की कमी पड़ जाती तो थाली, कटोरी, भगोना वगैरह मांग कर ले जाता। यहां तक कि तवा और चकला-बेलन की मांग भी कर लेते थे। कभी कोई आटा या दाल लाना भूल गया तो निस्संकोच मांग लिया जाता था। वे सभी ग्रामीण थे, सरल और सहज। शायद उन्हीं को ध्यान में रख कर कभी कबीरदास ने कहा था- ‘कबिरा खड़ा बाजार में…।’ कबीर की तरह किसी संत कवि ने शायद ही बाजार के साथ लुकाठी का जिक्र किया हो। हो सकता है बाजार में मची लूटमार और धोखाधड़ी उनके जेहन में रही हो। या फिर रास्ते में पड़ने वाले नदी-नालों को पार करने का खयाल भी हो। इस वास्ते लुकाठी की आवश्यकता पड़ती रही हो। यही संदेश उन्होंने समाज को देने की कोशिश भी की है कि जहां आवश्यकता हो वहां लाठी का उपयोग करना चाहिए।

इस समय बाजार ही सब कुछ हो गए हैं। आजकल हरेक व्यक्ति के घर में छोटा बाजार दिख रहा है। हर कोई कुछ न कुछ बेचना चाहता है। मेरे अपने गांव में पहले घरों के आगे लिपे-पुते चबूतरे हुआ करते थे। आंगन में एक तरफ तुलसी के पौधे, एक-दो नीम, आम या जामुन के फलदार वृक्ष भी होते थे। बाग-बगीचे थे, अमराइयां होती थीं। कितना अच्छा लगता था। लेकिन अब ठगा-सा खड़ा देखता रहता हूं कि वे चबूतरे गायब हो चुके हैं। उनकी जगह एक-एक दुकान बन गई है। मालिक मकान एक इंच जगह भी खाली नहीं छोड़ना चाहता। यही हाल शहर के बाजारों में है। पहले गज के हिसाब से जमीन मिलती थी। फिर फुट के हिसाब से मिलने लगी और अब बड़े-बड़े महानगरों में पता नहीं कैसे मिलते हैं। बाजार फैलते जा रहे हैं। समूचे गांव या शहर को निगलने को तैयार हैं। घरों, गली-कूचों में कहीं भी ‘फ्री-जोन’ नहीं बची है कि आदमी घड़ी दो घड़ी बैठ कर चैन की सांस ले सके।

पहले हम खुद तय करते थे कि बाजार से क्या लेना है, पर अब बाजार तय करता है कि आपको क्या लेना है। पहले हम न्यूनतम उपयोगिता के हिसाब से सामान लाते थे, पर अब अनुपयोगी चीजों का भी भंडार लग जाता है। बाजार चमकते हैं, अपनी छटा बिखेरते हैं। एक बाजीगर की तरह हमें आकर्षित करते रहते हैं और हम उस जादू में सब कुछ भूल जाते हैं। पिछले दिनों बेटी विदेश से आई थी। घर में जूते से लेकर कपड़े तक जरूरत से अधिक पड़े हुए हैं। लेकिन आते ही उसने बाजार जाने की जिद की। मैंने उससे पूछा कि सामान की लिस्ट बना ली क्या, तो वह हंसते हुए बोली, क्या लिस्ट बनाऊं? बाजार में तय करूंगी की क्या लेना है! इस तरह की बातें सुन कर आज के बाजार के वर्चस्व पता चलता है। कहां तक ये उपभोक्ता को प्रभावित और उस पर शासन करने लगे हैं। इसलिए शायद सदियों पहले कबीरदास ने बाजार में लाठी की आवश्यकता को बल दिया था, उसी तरह जैसे रहीम ने पानी को रेखांकित करते चेताया था- ‘रहिमन पानी राखिए…!’ हमने तो कभी सोचा नहीं था कि कल-कल बहते नीर पर भी बाजार हावी हो जाएगा और पानी ‘एक्वाफ्रेश’ के नाम से बिकने लगेगा।

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