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दुनिया मेरे आगे: प्रेम की निधि

महिला अधिकारों पर वंदना तिवारी का लेख।
Author September 8, 2016 01:57 am
चित्र का इस्तेमाल सिर्फ प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है।

विश्व की किसी भी भाषा के शब्दकोश को उलटें, उसमें शायद सबसे खूबसूरत शब्द होगा- ‘प्रेम’! आज ‘प्रेम’ पर लिखे गए लेखों, कविताओं, उसकी व्यापक व्याख्या की कमी नहीं है। टीवी हो या अखबार, ‘प्रेम’ एक नितांत अनिवार्य कॉलम के रूप में देखा और पढ़ा जाने वाला लोकप्रिय विषय है। इतना सब कुछ होने के बावजूद क्या सचमुच हम ‘प्रेम’ को समझ पाए हैं? अगर हमारा दावा यह है कि हम पे्रम की उदात्तता को समझते हैं तो यह सुविधा का चुनाव होकर क्यों होकर रह जाता है! खासकर बेटी के प्रेम-प्रसंग की बात आते ही ऐसा लगता है मानो हमारे ऊपर विपदा पड़ जाती है। कोई लोकप्रिय धारावाहिक या सिनेमा देखते हुए हमारी उन महिला पात्रों के साथ सहानुभूति रहती है जो खुद अपने जीवन-साथी का चुनाव करती हैं। लेकिन जैसे ही हमारे घर में बेटी अपने जीवन के लिए किसी साथी का चुनाव करने की बात करती है तो वह असहनीय हो जाता है। आखिर यह दोहरापन क्यों?

बचपन से बड़े होने तक अपने प्रियजनों के मुंह से केवल एक चिंता सुनी है कि समाज क्या कहेगा! समाज हमें क्यों भयाक्रांत करता है। सच यह है कि समाज का डर हमारी जिंदगी के वास्तविक अर्थ को भुला देता है। लेकिन क्या हम इस बात से बेखबर हैं कि समाज हमसे ही बनता है? सामाजिक बदलाव और उसके नवीन स्वरूप की जिम्मेदारी हमारी भी है। जो भी समाज समय के साथ बदलता नहीं है, आखिरकार वह सड़ जाता है और नष्ट हो जाता है। दरअसल, सामाजिक कुरीतियों का संरक्षण समाज के चंद ठेकेदार करते हैं और वही लोग सफेदपोश भी बने रहते हैं। हमें इस फर्क को समझना होगा।

समाज में आज भी ‘प्रेम’ की सहज स्वीकार्यता नहीं है। प्रेम को हम कुछ इस तरह से स्वीकारते हैं कि दूसरे की बेटी मेरे बेटे की पसंद हो सकती है, लेकिन मेरी बेटी का किसी दूसरे की पसंद होना मुझे नागवार गुजरता है। इसका अर्थ है लैंगिक स्तर पर भेदभाव की खुली छूट। आज इक्कीसवीं शताब्दी में चीजें तेजी से बदल रही हैं। स्त्री सशक्तीकरण की दिशा में भी बड़े बदलाव रेखांकित किए जा सकते हैं, लेकिन छोटे शहरों और मध्यवर्गीय जीवन में आज भी लड़कियों को अपने अभिभावक के सामने प्रेम की इजाजत नहीं मिल पाती। अपने प्रेमी के संग जीवन जीने की कल्पना तो और भी कठिन है।

जबकि प्रेम मनुष्य होने की बुनियादी शर्त है, उसका नैसर्गिक स्वभाव है। कलुषित हमारे विचार होते हैं, जिसके कारण हमें अपने ही बच्चों का प्रेम प्रसंग पाप की तरह लगने लगता है। अखबारों के जरिए इस क्रूर सच से हमें बार-बार रूबरू होना पड़ता है, जब एक वयस्क बेटी किसी वयस्क पुरुष से प्रेम करती है तो लगता है कि उसके पिता की बादशाहत छीन ली गई हो और उसकी तानाशाही को चुनौती दी गई हो। इसका एक पक्ष समाज में पितृसत्ता की मजबूत पकड़ का होना भी है। पितृसत्तात्मक समाज डर पैदा करने में विश्वास करता है, लेकिन खुद सदियों से ‘पे्रम’ करने वालों से डरता रहा है। वह अपनी खोखली ताकत से भय पैदा करता है। वह थोपना और आदेश देना जानता है, अपनी ही संतान को मौलिक अधिकारों से वंचित करना जानता है। इसलिए नई पीढ़ी और पुरानी पीढ़ी के मध्य द्वंद्व है, तनाव और प्रतिकार है। कुछ अर्थों में प्रतिशोध भी।

पितृसत्ता का मूल स्वभाव ही अलोकतांत्रिक है। वह समांतर अधिकार में विश्वास नहीं करता। एक सभ्य समाज में किसी लड़की का यह स्वाभाविक अधिकार होना चाहिए कि वह अपना जीवन साथी अपने ढंग से चुने। लेकिन अपने शर्तों पर लड़की का जीवन जीना हमारे समाज में अभी भी मान्य नहीं है। उसे तुरंत ही बदचलन, आवारा, भ्रष्ट, कलंकित आदि कुत्सित संज्ञाओं से चिह्नित कर दिया जाता है। यह व्यवहार हमारे समाज का पाखंडी चेहरा उजागर करता है। जो भी समाज अपनी नई पीढ़ी के साथ संवाद कायम नहीं रखता है, वह कभी भी प्रगतिशील नहीं हो सकता है। समस्याओं पर अपनी बात रखने का मौलिक अधिकार जब तक हमारी बहू-बेटियों को नहीं दिया जाएगा, तब तक दुनिया की शक्ल पुरुषवादी ही बनी रहेगी। एक स्वस्थ्य और विकसित समाज के लिए यह बेहद जरूरी है कि लैंगिक भेद मिटा कर खुली बातचीत को जगह दी जाए। स्त्री-पुरुष समानता की एक आदर्श स्थिति यह हो सकती है कि दोनों परस्पर साथ-साथ चलें, अवसर की आजादी हो, एक दूसरे के प्रति सहयोग और सम्मान का भाव जीवंत हो।

दरअसल, प्रेम जीवन की एक सशक्त चेतना है, एक स्वस्थ्य भावना है, एक सामाजिक विश्वास है। विश्वास की इस डोर को बचाए रखना ही प्रेम को बचाए रखने के सदृश है। आज ओलंपिक में साक्षी और सिंधु जैसी तमाम महिलाओं ने अपने दम पर जो करके दिखाया है, वह उम्मीद बंधाता है कि स्त्री अधिकार के मायने और उदार होंगे। एक ऐसा समाज निर्मित होगा जहां स्त्री अपनी मर्जी से निर्भीक, स्वतंत्र, आत्मनिर्भर और सम्मान के साथ जीवन जीने में विश्वास रख सके।

 

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  1. Y
    Yogesh
    Jan 8, 2017 at 1:17 pm
    well said by writer.. to empower the country we need to empower women rights,women freedom to do anything anywhere. for this we need to support or work together
    (1)(0)
    Reply
    1. C
      chattoo
      Sep 8, 2016 at 4:49 am
      ी कहा है लेखक ने. हम बिलकुल मत हैं उनसे.
      (0)(0)
      Reply