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दुनिया मेरे आगे- अड़जी-पड़जी

कई सारी परंपराएं अपने मूल स्वरूप में अब भी बनी हुई हैं। आदिवासी भाई-बहनों में एक दिलचस्प प्रथा है अड़जी-पड़जी।

Author December 4, 2017 6:05 AM
प्रतिकात्मक चित्र।

कालू राम शर्मा

शहरी समाज में हम एक दूसरे से कितने दूर होते जा रहे हैं इसका अनुभव मुझे कई बार हुआ। एक बड़े शहर में जहां मैं रहता था, तब वहां एक ही दीवार से लगे पड़ोसी के बारे में न तो मैं जानता था और न ही वह मुझे। मैंने एक-दो बार कोशिश भी की कि चलो, कुछ तो बात हो जाए। मगर ऐसा लगा कि बातचीत में पड़ोसी की कोई दिलचस्पी नहीं है। उसने सोचा होगा कि आखिर क्यों एक दूसरे से बात करें, मेल-मिलाप तो और भी आगे के कदम होते हैं। शहरों की बसाहट और बनावट ही ऐसी हो गई है कि पड़ोसी को पता ही नहीं होता कि बगल में क्या हो रहा है। एक दूसरे को किसी से कोई लेना-देना ही नहीं है।  मेरा ज्यादातर संबंध आदिवासी इलाके सेरहा है। विंध्याचल पर्वतमाला में धार, खरगोन, झाबुआ आदि की गोद में ही पला और बड़ा हुआ। इस कारण से यहां के आदिवासियों के एक रिवाज की याद ताजा हो आई। इस पूरी पट्टी में आदिवासी न जाने कब से रहते आए हैं। आदिवासियों की कई परंपराएं हैं, जो कि अब बदलती जा रही हैं। समय के साथ बदलना भी जरूरी होता है, लेकिन उनका बदलाव कुछ और ही दिशा में हो रहा है। फिर भी, कई सारी परंपराएं अपने मूल स्वरूप में अब भी बनी हुई हैं। आदिवासी भाई-बहनों में एक दिलचस्प प्रथा है अड़जी-पड़जी। दरअसल, अड़जी-पड़जी एक विचार है जो इंसानियत का रास्ता दिखाता है। जहां एक दूसरे की मदद के लिए हाथ आगे बढ़ाए जाते हैं।

इसका अर्थ जो भी हो, इसके पीछे भावना यह है कि मिलजुल कर काम करना। काम के बदले पैसे के बजाय दूसरे के यहां जाकर काम करना। यह परंपरा समतावादी सोच को मजबूती प्रदान करती है। जो छोटे आदिवासी किसान हैं, जिनके पास खेती के सभी औजार नहीं होते, वे खेत के कामों के लिए मजदूर नहीं लगा सकते। खेती के कई सारे काम ऐसे होते हैं जो धूप, पानी जैसे मौसम के कारकों से प्रभावित होते हैं, ऐसे में ‘तुम्हारे बैल और मेरी गाड़ी’ वाली कहावत चरितार्थ होती दिखती है। खेत-खलिहानों और तमाम सामाजिक रीति-रिवाजों के कामों में एक से ज्यादा परिवारों के लोग एक साथ खड़े हो जाते हैं। जैसे कि छितर के खेत में नट्टू के घर से दो लोग आकर जुताई, बुआई या फसल की कटाई करेंगे। अब जब नट्टू के खेत में जुताई वगैरह करनी हो तो छितर के घर से दो लोग जाएंगे। यह बहुत पुराना एक मानवीय लेन-देन है। हमने आपके काम में मदद की, आप हमारे काम में मदद करेंगे। यहां कोई मालिक-मजूर का रिश्ता नहीं है। पूरी तरह बराबरी और सखा भाव है। न करने वाला किसी दवाब में या अपमान-बोध में होता है न एवजी चुकाने वाला किसी तरह के कमजोरी के भाव में। बराबर की साझीदारी। इसी तरह आदिवासी समाज सदियों से अपने सुख-दुख, हारी-बीमारी में एक-दूसरे की मदद करके जीता आया है।

दरअसल, इस विचार की जड़ें काफी गहरी हैं। आज जब हम बिखरते जा रहे हैं, ये आदिवासी भाई-बहन सामूहिकता को अपनाए हुए हैं। साथ में भोजन करना, रहना और अपनी समस्याओं तथा सपनों को साझा करना। सामूहिक भावना की बातें गांधी ने भी कही हैं। गांधी ने शहरों के कंक्रीट के जंगलों में एकाकीपन को देखते हुए शिक्षा में सामूहिकता पर काफी बल दिया है। गांधी कहते हैं कि कोई भी काम बिना सामूहिक संदर्भ के संपन्न हो ही नहीं सकता। यही वजह है कि गांधी ने नई तालीम में सामूहिक जीवन के लिए आश्रम व्यवस्था पर जोर दिया था।अड़जी-पड़जी आदिवासी परंपरा का एक ऐसा धागा है जो जात-पांत से परे उस गांव, फलिया को एक माला में बांधता है। दिलचस्प बात यह है कि यह परंपरा न केवल झाबुआ, धार और खरगोन में है बल्कि मैंने इसे मेवाड़ में भी देखा है। मेरे एक मित्र मेवाड़ में ही पले-बढ़े हैं। उनसे जब मैंने अड़जी-पड़जी की बात की तो उन्होंने बताया कि मेवाड़ के आदिवासी इलाकों में इस प्रथा को अरसी-परसी के नाम से जाना जाता है।

दक्षिणी राजस्थान में उदयपुर तहसील का आदिवासी इलाका खेरवाड़ा जो कि गुजरात की सीमा पर है, वहां आदिवासी एक साथ जब किसी के खेत में काम करते हैं तो हांडो कहते हैं। अड़जी-पड़जी, अड़सी-पड़सी या कि हांडो, भारतीय परंपराओं के हिस्से रहे हैं जिनको हमारे आदिवासी भाई-बहन और गांव के लोग सहेजे हुए हैं। आज शहरी समाज फ्लैटों में कैद होता जा रहा है। पड़ोसी की मौत हो जाती है और महीने भर बाद तब पता चलता है, जब पुलिस आकर दरवाजा तोड़ती है। लोग सालों पड़ोस में रहते है और एक-दूसरे का नाम तक नहीं जानते। कार खड़ी करने के लिए झगड़े होते हैं और कई बार तो लोग एक दूसरे को गोली तक मार देते हैं। काश, हमारे शहरी समाजों और कुछ ज्यादा सभ्य हो चुके लोगों में भी अड़जी-पड़जी की कुछ समझ आ जाती!

 

 

 

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