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धारणा बनाम सच

एक दिन मेरे दफ्तरों में काम करने वाली सहकर्मी की बेटी ने कहा- ‘मम्मी, मुसलिम लोग अच्छे नहीं होते हैं।

Jansatta ravivari, poems, puja khillan, poetry, poems of puja khillanप्रतीकात्मक तस्वीर।

मुजतबा मन्नान

जब मैं स्कूल में पढ़ता था, तब बच्चों और शिक्षकों की धारणा थी कि ‘विज्ञान पढ़ने वाले बच्चे ज्यादा होशियार होते हैं, लड़कियां गणित नहीं सीख सकती हैं, अधिक प्रश्न पूछने वाले बच्चे कमजोर होते हैं’ आदि। उस समय मेरे परिवार और मोहल्ले के लोगों की भी कुछ धारणाएं थीं, जो अलग-अलग जातियों और महिलाओं को कमतर या फिर अपमानित करने को लेकर गढ़ी गई थीं। स्कूल की पढ़ाई के बाद मैंने दिल्ली के एक विश्वविद्यालय में दाखिला लिया तो मुझे अपने राज्य हरियाणा समेत अन्य राज्यों के लोगों के प्रति धारणाएं सुनने को मिलीं। जैसे ‘हरियाणा के लोग लड़ाकू होते हैं, वे दिमाग का कम और शरीर का ज्यादा इस्तेमाल करते हैं, कश्मीर के लोग अच्छे नहीं होते हैं, बिहारी कंजूस होते हैं और राजस्थानी परंपरावादी होते हैं’ आदि। लेकिन संयोगवश पढ़ाई के दौरान मेरी मित्रता अलग-अलग राज्यों के छात्र-छात्राओं से हुई। मित्रता से पहले मेरे मन में उनके प्रति सुनी-सुनाई बातों के आधार पर कुछ धारणाएं थीं और उनके मन में भी मुझे और मेरे राज्य को लेकर धारणाएं थीं। लेकिन उनके संपर्क में आने और उनसे बातचीत के बाद मुझे अपनी धारणाओं पर सोचने के लिए मजबूर होना पड़ा, क्योंकि मेरे मन की धारणाएं तर्क की कसौटी पर खरी नहीं उतर रही थीं और मेरे अनुभव मेरी धारणाओं को गलत सिद्ध कर रहे थे।

आमतौर पर हमें व्यक्ति, धर्म, जाति, वर्ग, राज्य, देश, स्त्री-पुरुष और स्कूली विषय आदि के प्रति धारणाएं सुनने को मिलती रहती हैं, जिनका आधार केवल सुनी-सुनाई बातें होती हैं। दरअसल, धारणाएं एक प्रक्रिया का हिस्सा हैं, जिसे बनने में वक्त लगता है। धारणा का कोई ठोस आधार हो भी सकता है और नहीं भी। यह भी संभव है कि किसी खास धारणा के पीछे पूर्वाग्रह की भावना हो। समाज में धारणाओं से संबंधित अनेक ऐसे उदाहरण मिलते हैं, जिन्हें वैज्ञानिक अध्ययनों ने गलत सिद्ध किया है, मगर चूंकि धारणाएं भावनाओं पर आधारित होती हैं, इसलिए समाज में काफी तेजी से फैलती हैं। गौर करने वाली बात यह है कि हमारे अंदर धारणाएं जन्म कैसे लेती हैं? उदाहरण के तौर पर एक प्रसंग बताता हूं।

एक दिन मेरे दफ्तरों में काम करने वाली सहकर्मी की बेटी ने कहा- ‘मम्मी, मुसलिम लोग अच्छे नहीं होते हैं। वे लोगों को मार देते हैं इसलिए मुसलिमों से दोस्ती नहीं करनी चाहिए।’ सहकर्मी की बेटी तीसरी कक्षा में पढ़ती है और उसने यह बात स्कूल में अपनी एक दोस्त से सुनी थी। अपनी बेटी की बात सुन कर वे चिंतित हो गर्इं, क्योंकि उनकी अभिन्न मित्र भी एक मुसलिम है। अपनी बेटी की बात को गंभीरता से लेते हुए उन्होंने बेटी से कहा- ‘आपकी आंटी (सहकर्मी की मित्र) भी मुसलिम हैं और अब मुझे उनसे दोस्ती तोड़नी पड़ेगी।’ बेटी ने उन्हें बीच में ही टोकते हुए कहा- ‘नहीं मम्मी, वे तो बहुत अच्छी हैं और मुझे बहुत प्यार करती हैं।’ उन्होंने फिर बेटी से पूछा- ‘लेकिन आप तो बोल रही हैं कि मुसलिमों से बच कर रहना चाहिए, क्योंकि वे लोगों को मार देते हैं?’ बेटी ने कहा- ‘औरतें नहीं, मुसलिम आदमी मारते हैं।’ उसने फिर बेटी से प्रश्न किया- ‘लेकिन आपके अंकल (महिला मित्र के पति) भी मुसलिम आदमी हैं और वे आपको जन्मदिन पर तोहफे और चॉकलेट भी देते हैं, तो क्या अब उनसे दोस्ती तोड़ लेनी चाहिए?’

महिला ने करीब दो घंटे तक अपनी बेटी से इस विषय पर प्यार से और गहन चर्चा की, अन्य समुदायों के लड़ाई-झगड़ों से संबंधित अपने अनुभव सुनाए और उन अनुभवों से जुड़े प्रश्न किए। अंत में उनकी बेटी ने कहा- ‘मम्मी, हो सकता है कि मेरी दोस्त ने मुसलिम लोगों के बारे में गलत सुना हो। मैं कल स्कूल जाकर उससे बात करूंगी।’ इस प्रसंग में देखने वाली बात यह है कि अगर सहकर्मी अपनी बेटी की बात पर उसे बच्चा समझ कर ध्यान नहीं देतीं या उनकी मुसलिमों के प्रति पहले से कोई धारणा होती, तो हो सकता है कि भविष्य में उनकी बेटी की भी मुसलिम समुदाय के प्रति एक खास धारणा बन जाती।

आमतौर पर रोजमर्रा की जिंदगी में बच्चों के अनेक ऐसे अनुभव और प्रश्न होते हैं जो वे घर-परिवार और विद्यालयों में सुनाते हैं। लेकिन अक्सर हम बच्चे समझ कर उन पर ध्यान नहीं देते हैं या डांट कर उन्हें चुप करा देते हैं। इस कारण बच्चे धीरे-धीरे प्रश्न करना ही छोड़ देते हैं। जबकि हमें बच्चे के हर प्रश्न या जिज्ञासा पर बातचीत करके उनका नजरिया जानना चाहिए। जैसे ‘बच्चा क्या सोचता है? वह ऐसा क्यों सोचता है? और उसकी क्या जिज्ञासाएं हैं, आदि। मुझे अपने अनुभवों के आधार पर लगता है कि अगर जाने-अनजाने बच्चे के अंदर कोई धारणा विकसित हो गई तो उसको तोड़ना बहुत मुश्किल काम होता है। उसके लिए उससे संबधित अनुभवों के साथ गहन चर्चा की जरूरत होती है। वह भी तब, जब वह व्यक्ति चर्चा के लिए तैयार हो।

 

 

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